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यात्रा वृतांत :”जगन्नाथ पुरी : आस्था, रहस्य और एक अविस्मरणीय यात्रा”रोचक और विलक्षण अनुभव

@विनोद भगत

उड़ीसा यात्रा का नाम लेते ही मन में सबसे पहले जो स्थान उभरता है, वह है — भगवान श्री जगन्नाथ जी का दिव्य मंदिर। और मेरी इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य भी पुरी स्थित इस विश्वविख्यात मंदिर के दर्शन करना ही था।

जब हम मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुँचे, तो पहली नजर में वह एक सामान्य मंदिर जैसा ही प्रतीत हुआ। लेकिन जैसे ही हमने प्रवेश द्वार के बाईं ओर बने काउंटर पर जूते-चप्पल और मोबाइल जमा कर मंदिर प्रांगण में कदम रखा — हम चमत्कृत रह गए।

भीतर का दृश्य अत्यंत विशाल और भव्य था। ऐसा लगा मानो किसी दैवीय लोक में प्रवेश कर लिया हो। चारों ओर दर्जनों छोटे-बड़े मंदिर, उत्कृष्ट नक्काशी, और स्थापत्य कला का बेजोड़ संगम! हमें बताया गया कि इस एक परिसर में लगभग 30 मंदिर स्थित हैं — हर एक की अपनी अनूठी पहचान, कहानी और आस्था जुड़ी हुई है।

लेकिन साथ ही, यह अनुभव कुछ कटु भी रहा। महालक्ष्मी मंदिर में एक पुजारी ने दर्शन और पूजा के नाम पर  रुपये की मांग की — जिसे हमने विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। यह अनुभव इस बात की याद दिला गया कि धर्म और व्यवसाय के बीच की रेखा अब धुंधली होती जा रही है। यहाँ इस बात का उल्लेख जरूर कर दूं कि ईश्वर और धर्म की महत्ता पर ऐसी बातों का कोई असर नहीं। ये सब मानवीय स्वभाव है।

यह मंदिर केवल श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि अनगिनत रहस्यों और ऐतिहासिक कथाओं का जीता-जागता प्रमाण भी है। सदियों से विदेशी और भारतीय इतिहासकार जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा — इन तीन देवताओं के रहस्य को सुलझाने का प्रयास करते आ रहे हैं, लेकिन आज भी यह रहस्य धुंधलकों में छिपा हुआ है।

पारंपरिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ मानव सभ्यता जितने ही प्राचीन हैं। ऋग्वेद, स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, नारद पुराण तक में इनका उल्लेख मिलता है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत काल में पांडवों ने भी यहां पूजा की थी। कुछ विद्वान तो यहाँ तक मानते हैं कि ईसा मसीह और मोहम्मद साहब ने भी पुरी का दौरा किया था।

इस मंदिर में मुख्यतः भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा की पूजा होती है। ये तीनों मिलकर एक ऐसी त्रिमूर्ति बनाते हैं जो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ शक्ति का प्रतीक मानी जाती है। इनके साथ सुदर्शन चक्र, और गर्भगृह में विराजमान माधव, श्रीदेवी, भूदेवी — इस स्थान को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं।

विज्ञान के भी आगे भी इस मंदिर के कुछ चमत्कारी तथ्य भी हैं। ये ही तथ्य ईश्वर के प्रति आस्था को कायम रखते हैं। पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर केवल आध्यात्मिक स्थल नहीं, बल्कि विज्ञान को चुनौती देने वाला आश्चर्य भी है।मंदिर के ऊपर लगा ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।मंदिर की 215 फीट ऊँची शिखर पर प्रतिदिन एक पुजारी चढ़कर ध्वज बदलता है — यह परंपरा पिछले 1800 वर्षों से अनवरत चल रही है।सामान्य भौगोलिक नियमों के विपरीत, दिन में हवा समुद्र से धरती की ओर नहीं, बल्कि उल्टी दिशा में बहती है।सबसे अद्भुत बात — मंदिर के मुख्य गुंबद की छाया कभी भी धरती पर नहीं दिखती! और अब तक, किसी पक्षी या विमान को मंदिर के ऊपर उड़ते हुए नहीं देखा गया है — यह सब एक चमत्कार नहीं तो और क्या है?

हम जिस दिन पुरी पहुँचे, उस दिन भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा पहले ही आरंभ हो चुकी थी और भगवान अपनी मौसी के घर पहुँच चुके थे। ऐसे में हम भी वहीं पहुंचे — विस्मित भाव से सजे-धजे रथ, श्रद्धालुओं की आस्था की लहरें, और एक अनुपम आध्यात्मिक वातावरण — यह अनुभव जीवन भर की पूँजी बन गया।

हर वर्ष के रथ के लिए नए रथ बनाना, विशाल जनसमूह के साथ देवताओं का रथ खींचना — यह सब देखना ऐसा था जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया हो।

पुरी की यह यात्रा श्रद्धा, रोमांच और रहस्य से भरपूर रही। जहाँ एक ओर हमें मंदिर की भव्यता और आध्यात्मिक ऊर्जा ने भावविभोर किया, वहीं पुजारियों की धनलोलुपता ने यह सोचने पर मजबूर किया कि धर्म की व्याख्या अब भी परिवर्तन के दौर में है।

पर एक बात स्पष्ट है — श्री जगन्नाथ पुरी केवल एक मंदिर नहीं, हजारों वर्षों की आस्था, संस्कृति और अद्भुत रहस्यों का पुंज है। यह यात्रा मेरे जीवन की सबसे रोचक, विलक्षण और आत्मसंतोष से भरी हुई स्मृति बन गई है।

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