@शब्द दूत ब्यूरो (06 सितंबर 2026)
देहरादून। हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में आगामी 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। मामला मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है और इसे सुनवाई की सूची में तीसरे नंबर पर रखा गया है। ऐसे में लंबे समय से लंबित इस मामले में 9 सितंबर को महत्वपूर्ण आदेश अथवा फैसला आने की उम्मीद जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार पिछले करीब दो माह से मामले की सुनवाई के लिए तिथियां निर्धारित होती रही हैं, लेकिन सूची में मुकदमे का क्रमांक 15 के बाद होने के कारण सुनवाई नहीं हो पा रही थी। रेलवे और उत्तराखंड सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मामले की शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किया गया था। इसके बाद अब 9 सितंबर की तारीख को मामले को प्राथमिकता के साथ सूचीबद्ध किया गया है।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए गृह विभाग ने जिला प्रशासन और पुलिस को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई वाले दिन सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखने के निर्देश दिए हैं। बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि पर कथित अतिक्रमण का मामला लंबे समय से अदालतों में विचाराधीन है और इसमें बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित होने की संभावना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी शासन स्तर पर मामले में प्रभावी कानूनी पैरवी के लिए पूर्व में अधिकारियों को दिशा-निर्देश दे चुके हैं।
बनभूलपुरा रेलवे भूमि विवाद की जड़ें कई वर्ष पुरानी हैं। रेलवे की ओर से संबंधित भूमि को अपनी संपत्ति बताया जाता रहा है, जबकि प्रभावित लोगों की ओर से लंबे समय से वहां निवास करने, नगरपालिका और अन्य सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने तथा विभिन्न प्रकार के कर और शुल्क दिए जाने का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि क्षेत्र में लंबे समय से मकान, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और अन्य सामाजिक सुविधाएं मौजूद हैं, इसलिए बिना पुनर्वास की व्यवस्था किए लोगों को हटाना उचित नहीं होगा।
जनवरी 2023 में नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने के आदेश के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल प्रस्तावित ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए कहा था कि बड़ी संख्या में लोगों को अचानक बेघर नहीं किया जा सकता। इसके बाद 24 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए प्रभावित लोगों के पुनर्वास की योजना तैयार करने पर जोर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों से यह स्पष्ट करने को कहा था कि रेलवे को कितनी भूमि की आवश्यकता है, कितने परिवार कार्रवाई से प्रभावित होंगे और उनके पुनर्वास के लिए क्या व्यवस्था की जा सकती है। इसके लिए केंद्र, रेलवे और उत्तराखंड सरकार समेत संबंधित विभागों के बीच बैठक कर पुनर्वास योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए थे।
वहीं, रेलवे ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कथित तौर पर कहा है कि उसके पास अतिक्रमणकारियों के पुनर्वास या मुआवजे के लिए कोई नीति नहीं है। रेलवे और राज्य सरकार का पक्ष रहा है कि विवादित भूमि रेलवे की है और उस पर कब्जा वैध नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर प्रभावित पक्षों का कहना है कि वे दशकों से वहां रह रहे हैं और उनके पास नगरपालिका रिकॉर्ड, टैक्स भुगतान तथा अन्य दस्तावेज मौजूद हैं।
इस मामले को अदालत तक पहुंचाने वाले याचिकाकर्ता रविशंकर जोशी के अनुसार बनभूलपुरा और गफूरबस्ती क्षेत्र में रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने का मुद्दा वर्ष 2007 से न्यायालय के समक्ष उठता रहा है। उस दौरान करीब 2400 वर्गमीटर भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया गया था। वर्ष 2013 में गौला नदी में अवैध खनन और गौला पुल से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान रेलवे भूमि पर अतिक्रमण का मामला फिर सामने आया।
9 नवंबर 2016 को हाईकोर्ट ने रेलवे को दस सप्ताह के भीतर अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद प्रभावित लोगों और प्रदेश सरकार की ओर से संबंधित भूमि को नजूल भूमि बताए जाने का प्रयास किया गया, लेकिन 10 जनवरी 2017 को हाईकोर्ट ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और प्रभावित लोगों तथा प्रदेश सरकार को अपने पक्ष हाईकोर्ट के समक्ष रखने के निर्देश दिए गए।
6 मार्च 2017 को हाईकोर्ट ने रेलवे को अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली से संबंधित कानून के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए। कार्रवाई नहीं होने पर याचिकाकर्ता की ओर से अवमानना याचिका भी दाखिल की गई। इसके बाद 21 मार्च 2022 को रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने में कथित विफलता को लेकर फिर जनहित याचिका दाखिल की गई। 18 मई 2022 को हाईकोर्ट ने प्रभावित लोगों को अपने दावे न्यायालय के सामने रखने का अवसर दिया। बाद में 20 दिसंबर 2022 को रेलवे को अतिक्रमणकारियों को नोटिस देकर कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अंतिम चरण में पहुंच चुका है। 9 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष होने वाली सुनवाई पर बनभूलपुरा ही नहीं, बल्कि रेलवे भूमि से जुड़े अतिक्रमण और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को लेकर भी महत्वपूर्ण दिशा स्पष्ट होने की संभावना है। प्रशासन ने भी संभावित संवेदनशीलता को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं।
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