@शब्द दूत ब्यूरो (24 अप्रैल 2026)
हिमालय की गोद में बसे नेपाल में इन दिनों राजनीतिक माहौल तेजी से गरमा गया है। 27 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले बालेन शाह (बालेंद्र शाह) की सरकार महज एक महीने के भीतर ही कई मोर्चों पर घिरती नजर आ रही है। जिन उम्मीदों के साथ जनता ने उन्हें सत्ता सौंपी थी, वही अब विरोध में बदलती दिख रही हैं।
सबसे बड़ा विवाद भारत से आने वाले सामान पर लगाए गए कस्टम ड्यूटी को लेकर है। सरकार ने ₹100 नेपाली रुपये से अधिक के सामान पर अनिवार्य शुल्क लागू किया है। सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले नागरिकों का कहना है कि यह फैसला उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर डाल रहा है, क्योंकि वे आवश्यक वस्तुओं के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर हैं। इस फैसले के खिलाफ कई जगहों पर प्रदर्शन हो रहे हैं।
राजनीतिक संकट को और गहरा किया है पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी ने। सरकार इसे कानून के तहत कार्रवाई बता रही है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार दे रहा है। ओली की पार्टी ने देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, जिससे सियासी माहौल और तनावपूर्ण हो गया है।
वहीं छात्र राजनीति को लेकर सरकार के फैसले भी विवादों में हैं। कैंपस में राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगाने की कोशिशों के खिलाफ छात्र संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। काठमांडू समेत कई शहरों में छात्रों के प्रदर्शन जारी हैं।
कैबिनेट में भी उठापटक ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है। गृह मंत्री पर लगे आरोपों के चलते इस्तीफा और श्रम मंत्री की बर्खास्तगी ने “जीरो टॉलरेंस” नीति के बावजूद सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भ्रष्टाचार के मामलों ने बालेन शाह की “क्लीन इमेज” को चुनौती दी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं ने बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट होने का मौका दे दिया है। देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन तेज हो रहे हैं और सरकार पर फैसले वापस लेने का दबाव बढ़ता जा रहा है।
अब प्रधानमंत्री बालेन शाह के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वे जनाक्रोश को शांत कर अपनी नीतियों को संतुलित करें या फिर बढ़ते दबाव के बीच बड़े राजनीतिक फैसले लें। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि उनकी सरकार स्थिरता की ओर बढ़ती है या राजनीतिक संकट और गहराता है।
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