@विनोद भगत
(17 नवम्बर 2012 को मेरे इस लेख को पढ़ लें, इतिहास फिर अपने आप को दोहरा रहा है। सिर्फ पात्र बदल गये हैं। विनोद भगत)
कांग्रेस की राजनीती देखकर लगता है कि एक बार फिर भारत में राजतन्त्र लागू हो गया है , लोकतंत्र के नाम पर बड़ी चतुराई से राज काज संभाल रही कांग्रेस के पास लगता है नेहरु गाँधी परिवार से अलग कुछ नहीं है , एक से विचारक और प्रखर बुद्धि वाले नेताओं के रहते मात्र दस वर्ष की राजनीति के जीवन के अनुभव के सहारे भारत की सत्ता पर काबिज़ होने की यह कहानी भारत के लिए एक दुखद त्रासदी बन रही है।
मुझे आश्चर्य होता है कि क्या कांग्रेस के पुराने और अनुभवी नेता भी सोनिया दरबार के दरबारी मात्र बन कर रह गए हैं। उनका काम सिर्फ इतना रह गया है कि जो कुछ भी सोनिया ने तय करवा दिया उस पर सिर्फ हाँ कहना है। कांग्रेस दरअसल अब एक परिवार की पार्टी बन गयी है। बाकि जो भी हैं वह एक कंपनी के कर्मचारी है। उनका काम सिर्फ इतना है कि जो आका कहें उस पर जो हुक्म है मेरे आका कि तर्ज़ पर आदेश का पालन करना है। उनकी अपनी कोई सोच नहीं है। हाँ अगर बाहर से कोई इस परिवार पर बयान देता है तो कांग्रेस के इन नेताओं में होड़ लग जाती है कि कौन अपने स्वामी के प्रति कितनी वफादारी दिखा सकता है।
यहाँ तक पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह तो इस मामले में इतने चर्चित हैं कि वह तो इसी बात का अवसर तलाशते हैं कि कब कहाँ से राहुल या सोनिया के लिए कटाक्ष आये और कब वह अपनी जुबान से स्वामी के प्रति अपनी वफादारी क़ा सबूत दे सकें। अपनी सोचने समझने की शक्ति का इस्तेमाल किये बिना अब कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी को प्रधान मंत्री का सबसे लायक उम्मेदवार घोषित करने में भी जुट गए हैं।
यह वही राहुल गाँधी हैं जिनके रहते रायबरेली में अपनी परम्परागत सीटें गवां चुकी कांग्रेस अब वहां अपने अस्तित्त्व की तलाश कर रही है। राहुल के जोशीले भाषणों पर जनता ताली तो बजा सकती है। पर वह वोट में भी तब्दील हो जाए। ऐसा तो फिल्मों में ही संभव हो सकता है।
मैंने कई बार राहुल गाँधी को भाषण देते हुए सुना है , उनके भाषण देने का अंदाज़ अमिताभ बच्चन की फिल्मों में एंग्री यंगमैन की याद दिलाता है। जो दर्शकों को मनोरंजन के लिहाज़ से तो खुश कर सकता है। पर देश चलाना सिर्फ एक मनोरंजन नहीं है। इसमे गंभीरता की जरुरत है , काश कांग्रेस के नेता यह समझ पाते। क्या कांग्रेस में आज कोई ऐसा नेता है जो अपने आकाओं की किसी बात का विरोध कर सकें यदि किसी ने किया भी तो उसका हश्र सब जानते हैं।
मुझे याद आता है सीताराम केसरी का वह वाकया जब उन्हें कांग्रेस के अध्यक्ष पद से बड़ी बेईज्ज़ती के साथ हटाया गया था। उसके बाद से नेहरु गाँधी परिवार के अलावा किसी ने हिम्मत भी नहीं की। हालांकि बीजेपी को छोड़कर किसी अन्य राजनैतिक दल में यह परम्परा नहीं है कि एक परिवार से इतर कोई पार्टी की कमान संभाल सके। कमोबेश सभी दल किसी एक परिवार की निजी संपत्ति बन गए हैं। पर यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा इस परम्परा का आरम्भ कांग्रेस से ही हुआ है।
बहरहाल 14 साल पहले का मेरा यह लेख आज भी प्रासंगिक है। घटनायें तो वही हैं पर किरदार बदल गये हैं और कुछ नयापन लिये हैं। नया नया अच्छा सबको लगता है पर हकीकत समझ आने में समय लगता है। हाँ जब मेरा यह लेख उस समय एक केन्दीय मंत्री ने पढा जो मुख्यमंत्री भी रहे थे तब काशीपुर आगमन पर उन्होंने विशेष रूप से मुझे इस लेख के लिए बधाई दी थी।
-विनोद भगत
(सत्ता पाकर कोई भी अंधा हो सकता है उसे अपने कर्म पुण्य और दूसरे के पाप लगते हैं सत्ता के मद में अंधे होकर मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों अगर इतने ही लायक होते तो तुम खुद मीडिया में ना होते जो सत्ता में होगा कमियां उसी की ढूंढी जायेगी और देश के हालात का ज़िम्मेदार भी वही होगा।
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