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मुफ्त पैसा या रोजगार? सरकार जनता के खाते में रकम डाले या रोजगार पैदा करे, देश के सामने बड़ा सवाल

@विनोद भगत

भारत में पिछले कुछ वर्षों में गरीबों, महिलाओं, किसानों, बुजुर्गों और अन्य जरूरतमंद वर्गों के लिए आर्थिक सहायता देने वाली योजनाओं का दायरा बढ़ा है। कई राज्यों में महिलाओं को हर महीने सीधे बैंक खाते में रकम दी जा रही है, किसानों को साल में कई किस्तों में आर्थिक सहायता मिल रही है और बुजुर्गों, विधवाओं तथा दिव्यांगों के लिए पेंशन की व्यवस्था है। केंद्र सरकार की ओर से भी खाद्य सुरक्षा, DBT और विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से करोड़ों परिवारों को सहायता दी जाती है। ऐसे में देश के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो रहा है—क्या सरकार को जनता के खाते में लगातार पैसा डालते रहना चाहिए या इस पैसे का इस्तेमाल स्थायी रोजगार और आय के अवसर पैदा करने में किया जाना चाहिए?

इस सवाल का सीधा जवाब आसान नहीं है। गरीब परिवार के लिए महीने में मिलने वाली कुछ हजार रुपये की सहायता बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे घर का राशन, बच्चों की पढ़ाई, दवा, बिजली का बिल या दूसरी जरूरी जरूरतें पूरी हो सकती हैं। आर्थिक संकट के समय नकद सहायता परिवार को कर्ज लेने से भी बचा सकती है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 ने भी माना था कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और DBT जैसी व्यवस्थाओं ने कम आय वाले परिवारों की खपत और आय-सृजन गतिविधियों को सहारा दिया तथा जीवन स्तर सुधारने में मदद की।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब अस्थायी राहत को स्थायी आर्थिक व्यवस्था का विकल्प बना दिया जाए। किसी परिवार को हर महीने 1,000, 2,000 या 3,000 रुपये मिलना तत्काल राहत दे सकता है, लेकिन इससे परिवार की कमाई की क्षमता अपने आप नहीं बढ़ती। यदि परिवार के सदस्य के पास स्थायी रोजगार, बेहतर कौशल या छोटा कारोबार खड़ा करने का अवसर नहीं है तो सरकारी सहायता बंद होने के बाद उसकी आर्थिक स्थिति फिर पहले जैसी हो सकती है।

यही कारण है कि सरकार के सामने अब “कैश ट्रांसफर बनाम रोजगार” के बजाय “कैश ट्रांसफर के साथ रोजगार” का मॉडल अधिक उपयोगी दिखाई देता है। जरूरतमंद परिवार को तत्काल सहायता मिले, लेकिन साथ ही उसे ऐसी शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य, परिवहन, ऋण और बाजार की सुविधा भी मिले जिससे वह भविष्य में अपनी आय खुद बढ़ा सके।

सरकारी सहायता का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि यह आर्थिक संकट के समय कमजोर परिवारों को सुरक्षा देती है। किसी बुजुर्ग व्यक्ति के पास कमाई का साधन नहीं है तो पेंशन उसके लिए बेहद जरूरी हो सकती है। किसी विधवा महिला या दिव्यांग व्यक्ति के लिए नियमित आर्थिक सहायता सम्मानजनक जीवन का आधार बन सकती है। गरीब परिवार को खाद्यान्न सहायता मिलने से उसकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होने से बच सकता है। ऐसे मामलों में सरकारी सहायता को केवल “मुफ्त पैसा” कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था है।

महिलाओं को मिलने वाली नकद सहायता का प्रभाव भी केवल घरेलू खर्च तक सीमित नहीं रह सकता। अगर महिला के खाते में सीधे पैसा आता है तो उसके पास घरेलू फैसलों में अधिक आर्थिक भूमिका हो सकती है। इससे स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा और घरेलू जरूरतों पर खर्च बढ़ सकता है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। यदि महिला को मिलने वाली सहायता के साथ उसके लिए रोजगार, कौशल प्रशिक्षण, सुरक्षित परिवहन और काम के अवसर नहीं बढ़ते तो वह सरकारी भुगतान पर निर्भर रह सकती है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में महिला श्रमबल भागीदारी दर में सुधार का उल्लेख किया गया है। सर्वेक्षण के अनुसार 2017-18 में महिला श्रमबल भागीदारी दर 23.3 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में बढ़कर 41.7 प्रतिशत हुई। लेकिन सर्वेक्षण यह भी बताता है कि महिलाओं के सामने आवागमन, बच्चों की देखभाल, आवास और काम की लचीली व्यवस्था जैसी बाधाएं अभी मौजूद हैं।

इसका अर्थ यह है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए केवल नकद सहायता पर्याप्त नहीं है। यदि सरकार उसी महिला के लिए कौशल प्रशिक्षण, स्वरोजगार के लिए सस्ता ऋण, स्थानीय बाजार, क्रेच, सुरक्षित परिवहन और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए तो सहायता राशि भविष्य में आत्मनिर्भरता का माध्यम बन सकती है।

सबसे बड़ी चिंता राज्यों के वित्त पर पड़ने वाले असर को लेकर है। 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 21 राज्यों में सब्सिडी और ट्रांसफर का कुल खर्च 2018-19 में 3.86 लाख करोड़ रुपये था, जो 2025-26 के बजट अनुमान में बढ़कर 9.73 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसी अवधि में इन राज्यों के कुल राजस्व व्यय में सब्सिडी और ट्रांसफर की हिस्सेदारी भी बढ़ी। आयोग ने बड़े पैमाने पर बिना अतिरिक्त शर्त वाले नकद हस्तांतरण को लेकर राजकोषीय स्थिरता और विकास पर संभावित असर की चिंता जताई है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी इस बहस के महत्वपूर्ण पक्ष को सामने रखा है। सर्वेक्षण के अनुसार राज्यों में महिलाओं के लिए चलने वाली कई बिना शर्त नकद हस्तांतरण योजनाओं पर 2025-26 में लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था। सर्वेक्षण का निष्कर्ष यह है कि नकद सहायता तत्काल आर्थिक बाधाओं को कम कर सकती है, लेकिन यदि इसे रोजगार, कौशल और मानव पूंजी में निवेश के साथ नहीं जोड़ा गया तो लंबे समय में विकास की क्षमता सीमित हो सकती है।

यहां सवाल उठता है कि अगर सरकार के पास 1 लाख करोड़ रुपये हैं तो वह क्या करे? क्या वह इसे करोड़ों लोगों में बांट दे या इसका इस्तेमाल रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाओं में करे?

व्यावहारिक उत्तर दोनों के बीच है। गरीब परिवारों और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों के लिए आवश्यक सहायता बंद नहीं की जा सकती। लेकिन हर सरकारी खर्च का एक हिस्सा ऐसी गतिविधियों में जाना चाहिए जो भविष्य में आय पैदा करें। सड़क, सिंचाई, रेलवे, बिजली, औद्योगिक क्षेत्र, ग्रामीण भंडारण, कृषि प्रसंस्करण, डिजिटल बुनियादी ढांचा और शहरी सार्वजनिक परिवहन जैसी परियोजनाएं केवल सरकारी संपत्ति नहीं बनातीं, बल्कि निर्माण के दौरान रोजगार और बाद में आर्थिक गतिविधियों के अवसर भी पैदा करती हैं।

इसी तरह यदि किसी बेरोजगार युवा को केवल कुछ महीनों के लिए बेरोजगारी भत्ता देने के बजाय कौशल प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप, उपकरण खरीदने के लिए सहायता और बाजार से जोड़ने की सुविधा दी जाए तो सरकारी खर्च का असर लंबे समय तक रह सकता है। एक युवा को हर महीने कुछ हजार रुपये देने की तुलना में उसे ऐसा हुनर और अवसर देना अधिक उपयोगी हो सकता है जिससे वह हर महीने खुद 15 या 20 हजार रुपये कमा सके।

किसानों के मामले में भी यही बात लागू होती है। आय सहायता किसान के लिए संकट के समय उपयोगी है, लेकिन केवल नकद राशि से खेती की उत्पादकता नहीं बढ़ती। सिंचाई, बेहतर बीज, भंडारण, कृषि प्रसंस्करण, सस्ती बिजली, बाजार तक पहुंच, फसल बीमा और स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन जैसे उपाय किसान की स्थायी आय बढ़ा सकते हैं।

सरकार को यह भी देखना होगा कि सहायता किसे मिल रही है। यदि वास्तव में जरूरतमंद परिवारों को लक्षित सहायता मिलती है तो सीमित सरकारी संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। 16वें वित्त आयोग ने भी राज्यों से सब्सिडी की समीक्षा और स्पष्ट पात्रता एवं अपवर्जन मानदंड तय करने की जरूरत पर जोर दिया है। आयोग ने सब्सिडी और ट्रांसफर की एक समान तरीके से गणना और पारदर्शी जानकारी देने की आवश्यकता भी बताई है।

एक और बड़ा सवाल है—क्या सरकारी पैसा जनता तक पहुंचने के बाद अर्थव्यवस्था में वापस आता है? इसका उत्तर काफी हद तक हां है। गरीब परिवार को पैसा मिलता है तो वह अक्सर उसे भोजन, कपड़े, दवा, शिक्षा और स्थानीय बाजार की दूसरी जरूरतों पर खर्च करता है। इससे दुकानदार, छोटे व्यापारी, परिवहन और स्थानीय सेवा क्षेत्र को भी आर्थिक गतिविधि मिलती है। इसलिए नकद सहायता का अर्थ यह नहीं कि पैसा पूरी तरह अर्थव्यवस्था से बाहर चला गया।

लेकिन लंबे समय में अर्थव्यवस्था को केवल उपभोग से नहीं, उत्पादन और निवेश से भी मजबूती मिलती है। अगर सरकार का अधिकांश पैसा केवल वर्तमान खर्च में चला जाए और स्कूल, अस्पताल, सड़क, सिंचाई, उद्योग तथा रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाओं के लिए कम संसाधन बचें तो आने वाले वर्षों में इसका असर दिखाई दे सकता है।

यही वह बिंदु है जहां “मुफ्त पैसा” और “रोजगार” की बहस राजनीतिक न होकर आर्थिक बहस बन जाती है। जनता को आज भी राहत चाहिए और भविष्य के लिए कमाई का अवसर भी। गरीब परिवार को यह नहीं कहा जा सकता कि रोजगार आने तक वह भूखा रहे। लेकिन यह भी सही नहीं होगा कि उसे हमेशा सहायता पर निर्भर रखा जाए और उसकी कमाई की क्षमता बढ़ाने पर पर्याप्त निवेश न किया जाए।

एक बेहतर मॉडल यह हो सकता है कि सरकार आर्थिक सहायता को तीन स्तरों में बांटे। पहला, अत्यंत जरूरतमंद और कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा, जिसे बंद नहीं किया जाना चाहिए। दूसरा, काम करने में सक्षम लोगों के लिए सहायता को कौशल, रोजगार या स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ा जाए। तीसरा, सरकारी खर्च का बड़ा हिस्सा ऐसी सार्वजनिक परियोजनाओं में लगाया जाए जो भविष्य में रोजगार, उत्पादकता और निजी निवेश को बढ़ावा दें।

इसमें एक और महत्वपूर्ण पहलू है—महिलाओं की unpaid care work यानी बिना वेतन वाले घरेलू और देखभाल के काम को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महिलाओं को मिलने वाली आर्थिक सहायता उनके परिवार और स्वयं की जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकती है। लेकिन यदि महिलाओं को रोजगार देना है तो बच्चों की देखभाल, सुरक्षित परिवहन, लचीले कार्य घंटे और कौशल विकास जैसी सुविधाओं पर भी निवेश करना होगा। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी महिलाओं की रोजगार भागीदारी बढ़ाने के लिए ऐसे बहुआयामी उपायों की जरूरत पर जोर दिया है।

इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है कि सरकार को जनता के सामने “मुफ्त पैसा या रोजगार” में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है। सही नीति दोनों को संतुलित कर सकती है। जरूरतमंद को आज सहायता मिले और सक्षम व्यक्ति को कल अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिले।

सरकार की किसी भी योजना को सफल मानने का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने लोगों के बैंक खाते में पैसा पहुंचा। असली सवाल यह होना चाहिए कि पांच या दस साल बाद उन परिवारों की आय कितनी बढ़ी, कितने लोग गरीबी से बाहर आए, कितनी महिलाओं को रोजगार मिला, कितने युवाओं ने अपना कारोबार शुरू किया और सरकारी खर्च से कितनी स्थायी आर्थिक संपत्ति बनी।

आखिरकार जनता को केवल आज का सहारा नहीं, कल की ताकत भी चाहिए। सरकार यदि दोनों दे सके—जरूरत के समय आर्थिक सुरक्षा और लंबे समय के लिए रोजगार एवं आय का अवसर—तो सरकारी कल्याणकारी योजनाएं बोझ नहीं बल्कि देश की आर्थिक ताकत बन सकती हैं। लेकिन यदि सहायता योजनाएं रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्पादक निवेश की कीमत पर लगातार बढ़ती जाती हैं, तो आने वाली पीढ़ियों पर वित्तीय बोझ बढ़ने का खतरा रहेगा।

इसलिए बहस “मुफ्त पैसा देना चाहिए या नहीं” पर खत्म नहीं होनी चाहिए। असली सवाल होना चाहिए—सरकार का हर रुपया जनता को कितनी राहत और कितनी स्थायी कमाई की क्षमता दे रहा है? यही वह कसौटी है जिस पर भविष्य की कल्याणकारी योजनाओं को परखा जाना चाहिए।

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