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भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना, आंकड़े यह भी कहते हैं कि 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन दिया जाता है,ये कैसा विरोधाभास?एक विश्लेषण

@शब्द दूत ब्यूरो (23 जून 2025)

नई दिल्ली। भारत ने वैश्विक आर्थिक मानचित्र पर एक और मील का पत्थर छूते हुए अब विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल कर लिया है। यह उपलब्धि देश की आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विकास और वैश्विक निवेश में बढ़ोतरी का संकेत देती है। परंतु इस आर्थिक चमक के समानांतर एक ऐसा आंकड़ा भी सामने आता है जो चिंता और गहन विचार की मांग करता है—देश में अब भी 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन की आवश्यकता पड़ रही है।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत केंद्र सरकार वर्षों से जरूरतमंदों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध करा रही है। सरकार का दावा है कि यह योजना देश के कमजोर वर्ग को खाद्य सुरक्षा देने के साथ-साथ सामाजिक संतुलन बनाए रखने में सहायक है। लेकिन जब एक ओर भारत खुद को आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, और दूसरी ओर आधी से अधिक आबादी को दो वक्त की रोटी भी सब्सिडी पर दी जाती है, तो यह विकास की मौजूदा परिभाषा पर सवाल उठाता है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि GDP और आर्थिक रैंकिंग की ऊँचाई का सीधा लाभ अगर समाज के निचले तबके तक नहीं पहुँचता, तो वह विकास असमान और खोखला माना जाएगा। यह विरोधाभास न केवल हमारी सामाजिक संरचना की जटिलता को दर्शाता है, बल्कि इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि समावेशी विकास की दिशा में अब भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

सरकार की ओर से एक ओर आत्मनिर्भर भारत, डिजिटल इंडिया, और वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की कोशिशें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर राशन की लाइन में खड़े करोड़ों चेहरे यह पूछते हैं—क्या विकास का स्वाद सबको समान रूप से मिल पा रहा है?

भारत की आर्थिक ताकत निस्संदेह बढ़ी है, लेकिन अगर यह ताकत देश के अंतिम व्यक्ति के जीवन स्तर में बदलाव नहीं ला पा रही, तो यह केवल आंकड़ों की जीत है, ज़मीनी सच्चाई की नहीं। अब समय आ गया है कि “विकास” को केवल जीडीपी ग्रोथ से नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, समान अवसर और बुनियादी आवश्यकताओं की सहज उपलब्धता से भी मापा जाए।

 

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