@शब्द दूत ब्यूरो (09 सितंबर 2026)
काशीपुर। ऐतिहासिक गोविषाण टीले पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) देहरादून की ओर से चलाए गए उत्खनन में प्राचीन ईंटों से निर्मित संरचनाएं सामने आई हैं। प्रथम दृष्टया इन संरचनाओं के गुप्त अथवा कुषाण काल से संबंधित होने का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि एएसआई अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि खुदाई से अभी तक कोई ऐसी विशेष पुरातात्विक वस्तु प्राप्त नहीं हुई है, जिसके आधार पर किसी निश्चित काल या संरचना के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सके।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग देहरादून के अधीक्षक एमसी जोशी ने बताया कि पिछले माह कुमांऊ कमिश्नर दीपक रावत द्वारा की गई शुरुआत के बाद गोविषाण टीले पर उत्खनन का काम किया गया। खुदाई के दौरान कुछ ब्रिक वॉल यानी ईंटों की दीवारें तथा एक गोलाकार संरचना सामने आई है। गोलाकार संरचना प्रथम दृष्टया कुएं जैसी दिखाई देती है, लेकिन अभी इसका पूरी तरह अध्ययन नहीं किया गया है। इसलिए फिलहाल इसे निश्चित तौर पर कुआं कहना उचित नहीं होगा।
एमसी जोशी के अनुसार यह संरचना काफी पुरानी प्रतीत होती है। प्रथम दृष्टया इसे गुप्त काल का माना जा सकता है, लेकिन इसके और भी प्राचीन होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि संरचना का निचला हिस्सा गुप्त -कुषाण काल से संबंधित होने की संभावना भी हो सकती है। हालांकि इसकी वास्तविक प्राचीनता और उपयोग के बारे में विस्तृत अध्ययन के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
बरसात के कारण फिलहाल गोविषाण टीले पर चल रहा उत्खनन कार्य रोक दिया गया है। एएसआई अधीक्षक ने बताया कि मौसम सामान्य होने के बाद करीब 15 अक्टूबर से उत्खनन कार्य दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया प्रस्तावित है। इसके बाद साइट का व्यवस्थित तरीके से अध्ययन और आगे की खुदाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि अक्टूबर के बाद सामने आए स्ट्रक्चर और अन्य पुरातात्विक अवशेषों के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाएगी।
गोविषाण टीला काशीपुर के प्राचीन इतिहास और पुरातात्विक महत्व से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। यहां हो रहे उत्खनन से सामने आ रहे प्राचीन निर्माण अवशेष इस क्षेत्र के पुराने इतिहास और यहां विकसित रही सभ्यता के बारे में नई जानकारी सामने आने की उम्मीद जगा रहे हैं। फिलहाल एएसआई की टीम संरचनाओं का अध्ययन कर रही है और आगे की खुदाई के बाद ही इनके कालखंड तथा वास्तविक स्वरूप को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आ सकेगी।
आपको बता दें कि उत्तराखंड में एएसआई की ओर से संरक्षण और जीर्णोद्धार कार्यों तमाम जगह किये जा रहे हैं। का भी उल्लेख किया। जिनमें देहरादून क्षेत्र के मंदिरों के साथ-साथ पालासर मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है। इसके अलावा गोपेश्वर , आदि बद्री और चतुरगढ़ी सहित विभिन्न स्थानों पर भी संरक्षण और रिस्टोरेशन का काम किया जा रहा है। फिलहाल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्तराखंड में ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण के लिए लगातार कार्य कर रहा है। जिससे हमें प्राचीन बहूमूल्य सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों की उपयोगिता और उस काल के रहन सहन जीवनचर्या व व्यापारिक धार्मिक इतिहास का ज्ञान होता है।
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