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फिल्टर वाली झूठी दुनिया में कुछ नहीं रखा, झुर्रियों में उम्र ढलती नहीं, संवरती है: उर्वशी दत्त बाली

@शब्द दूत ब्यूरो (07 अक्टूबर 2026)

काशीपुर। समाजसेविका एवं डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली ने महिलाओं में बढ़ती कॉस्मेटिक उपचारों और सोशल मीडिया के फिल्टर आधारित सौंदर्य के प्रति बढ़ती होड़ पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ना कोई कमी या अपराध नहीं है, बल्कि जीवन के अनुभव, संघर्ष, आत्मविश्वास और परिपक्वता की निशानी है। उनके अनुसार चेहरे की झुर्रियां जीवन के उन पड़ावों की गवाही देती हैं, जिनसे गुजरकर इंसान आज यहां तक पहुंचा है।

उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि आज का दौर एक ऐसी अंधी दौड़ में फंसता दिखाई दे रहा है, जिसमें महिलाएं अपने ही चेहरे पर सुइयों, केमिकल्स और दवाइयों के जरिए बदलाव करने के लिए क्लीनिकों के चक्कर लगा रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब रोजमर्रा की जिंदगी में अस्पतालों और दवाइयों से जुड़े तनाव पहले ही कम नहीं हैं, तो फिर केवल खूबसूरत दिखने के दबाव में खुद को दर्द देने वाले कॉस्मेटिक प्रयोगों की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के फिल्टरों ने बेदाग त्वचा और हमेशा युवा दिखने की एक ऐसी कृत्रिम दुनिया बना दी है, जिसमें 40 और 50 वर्ष की उम्र में भी 20 वर्ष का दिखने की होड़ दिखाई देती है। सुंदरता का पैमाना चेहरे की कसावट और बेदाग त्वचा तक सीमित होता जा रहा है, जबकि वास्तविक सुंदरता व्यक्ति की सोच, व्यवहार, शालीनता, आत्मविश्वास और सादगी में होती है।

उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि महिलाओं को इस सामाजिक दबाव पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि उम्र बढ़ने को लेकर असुरक्षा का बोझ मुख्य रूप से महिलाओं पर ही क्यों डाला जाता है। उन्होंने सवाल किया कि पुरुषों को अपने सफेद बालों और चेहरे की झुर्रियों को परिपक्वता, अनुभव और रुतबे की निशानी मानकर स्वीकार करने की सहजता क्यों मिलती है, जबकि महिलाओं को अपनी उम्र छिपाने और हर समय युवा दिखने के लिए प्रेरित किया जाता है।

उन्होंने कहा कि बचपन से ही महिलाओं के मन में यह धारणा बैठा दी जाती है कि उनका आकर्षण और सम्मान उनकी जवानी तथा बेदाग त्वचा से जुड़ा है। यही सोच आगे चलकर हीन भावना और सामाजिक दबाव का रूप ले लेती है। महिलाएं परफेक्ट दिखने की कोशिश में मानसिक तनाव का सामना करती हैं और कई बार महंगे कॉस्मेटिक उपचारों पर पैसा खर्च करती हैं।

उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि बनावटी खूबसूरती से मिलने वाली कुछ पलों की तारीफ के लिए अपनी सहजता, स्वास्थ्य, सुकून और आत्मसम्मान को दांव पर लगाना समझदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज को महिलाओं के सामने सौंदर्य का ऐसा आदर्श रखने की जरूरत है जिसमें उम्र को छिपाने के बजाय उसे गरिमा के साथ स्वीकार किया जाए।

उन्होंने कहा कि 80-90 वर्ष की उम्र तक भी सार्वजनिक जीवन और ग्लैमर की दुनिया में अपनी पहचान बनाए रखने वाली कई अभिनेत्रियों को देखकर यह समझा जा सकता है कि उम्र अपने आप में सुंदरता की दुश्मन नहीं है। उन्होंने सोशल मीडिया पर मिलने वाली चंद लाइक्स और फॉलोअर्स की आभासी दुनिया के लिए वास्तविक जीवन का सुकून खोने पर भी सवाल उठाया।

उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि महिलाओं को कभी ठहरकर यह भी सोचना चाहिए कि क्या वास्तव में 20 वर्ष की उम्र ही जीवन का सबसे मुकम्मल पड़ाव था। उस उम्र में ऊर्जा और उत्साह जरूर था, लेकिन जीवन का अनुभव कम था। कौन अपना है, कौन पराया है, कौन साथ निभाएगा और जीवन के संघर्षों का सामना कैसे करना है, इसकी समझ समय के साथ ही विकसित होती है।

उन्होंने कहा कि आज उम्र के जिस पड़ाव पर महिलाएं खड़ी हैं, वहां उनके पास वह जीवन अनुभव है जो युवा अवस्था में नहीं था। जीवन के विभिन्न मोर्चों से लड़कर हासिल किया गया आत्मविश्वास, परिस्थितियों को समझने की क्षमता और भीतर का ठहराव ही चेहरे का वास्तविक नूर है। इसे कोई कॉस्मेटिक क्लिनिक, इंजेक्शन या फिल्टर नहीं दे सकता।

उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि धूप-छांव से गुजरकर मिले जीवन के निशानों को किसी केमिकल या कृत्रिम उपाय के पीछे छिपाने की आखिर जरूरत क्या है। बालों में आई चांदी ढलती उम्र की मजबूरी नहीं, बल्कि जिंदगी के अनुभवों का मुकुट है। इसे छिपाने के बजाय गर्व के साथ स्वीकार करना चाहिए।
उन्होंने महिलाओं से आह्वान किया कि वे आईने के सामने खड़े होकर वर्षों को गिनना बंद करें और हर उम्र की अपनी सुंदरता, गरिमा और आत्मसम्मान को पहचानें। उनका कहना है कि जिंदगी किसी बनावटी मुखौटे की मोहताज नहीं है। सादगी, स्वाभिमान और आत्मविश्वास के साथ जीवन के हर पड़ाव को खुलकर जीना ही वास्तविक सुंदरता है।

उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि जिंदगी ढल नहीं रही, बल्कि अनुभवों के साथ अपने सबसे परिपक्व, सशक्त और खूबसूरत रूप में खिल रही है। जरूरत इस बात की है कि महिलाएं फिल्टर वाली झूठी दुनिया के पीछे भागने के बजाय जिंदगी की वास्तविक खूबसूरती को स्वीकार करें और उसे पूरे आत्मसम्मान के साथ जिएं।

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