@विनोद भगत
उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल अंचल की लोकसंस्कृति में प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता केवल उपयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रकृति के तत्वों को सम्मान और श्रद्धा देने की परंपरा भी रही है। पहाड़ों में बहने वाली छोटी-छोटी जलधाराएं, नौले, धारे और पंदेरे कभी ग्रामीण जीवन की सबसे बड़ी जरूरत हुआ करते थे। इन्हीं प्राकृतिक जलस्रोतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाली परंपराओं में धारा पूजन और नौला पूजन का विशेष स्थान है।
पर्वतीय क्षेत्रों में पानी का महत्व मैदानी इलाकों से अलग रहा है। पहाड़ों की ढलानदार भौगोलिक संरचना और बिखरी हुई बस्तियों के कारण हर घर तक पाइप से पानी पहुंचाने की व्यवस्था बहुत बाद में विकसित हुई। इससे पहले गांवों का जीवन प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर था। किसी गांव का धारा या नौला केवल पानी लेने की जगह नहीं होता था, बल्कि वह गांव की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र होता था।
धारा सामान्यतः उस स्थान को कहा जाता है जहां पहाड़ के भीतर से प्राकृतिक रूप से पानी बाहर निकलता है और उसे पत्थर या अन्य स्थानीय सामग्री की सहायता से इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि लोग आसानी से पानी भर सकें। नौला इससे अलग पारंपरिक जल संरचना है, जिसमें भूमिगत जल को एक संरक्षित स्थान पर एकत्र किया जाता है। कई पुराने नौलों की वास्तुकला अत्यंत सुंदर रही है और उनके प्रवेश या जल निकास पर देवी-देवताओं, पशुओं या अन्य प्रतीकों की आकृतियां बनाई जाती थीं।
धारा पूजन से जुड़ी सबसे प्रमुख मान्यताओं में विवाह के बाद नवविवाहिता का अपने नए गांव के जलस्रोत पर जाना शामिल है। कुमाऊं और उत्तराखंड के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में प्रचलित इस परंपरा में नववधू विवाह के बाद परिवार की महिलाओं अथवा गांव की कन्याओं के साथ धारे या नौले पर जाती है। वहां रोली, अक्षत, पुष्प आदि से जलस्रोत का पूजन किया जाता है। इसके बाद वह जलपात्र में पानी भरकर घर लाती है। इस जल को परिवार के बड़े सदस्यों को अर्पित करने और उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा भी कई स्थानों पर बताई जाती है।
इस परंपरा का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं माना जाता। इसके पीछे एक गहरा सामाजिक संदेश भी दिखाई देता है। नववधू जब नए घर में प्रवेश करती है तो वह सबसे पहले उस गांव के प्राकृतिक जलस्रोत से परिचित होती है। वह पानी, जो आने वाले दिनों में उसके परिवार और पूरे गांव के जीवन का आधार बनने वाला है, उसके प्रति सम्मान व्यक्त करती है। इस तरह धारा पूजन नई बहू के नए परिवार और गांव से जुड़ने का प्रतीक भी बन जाता है।
पर्वतीय समाज में पानी को कभी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं माना गया। जल के साथ धार्मिक आस्था जुड़ी होने के कारण जलस्रोतों को स्वच्छ रखना भी सामाजिक जिम्मेदारी बन जाता था। धारे और नौले के आसपास गंदगी करना, जलस्रोत को दूषित करना या उसकी पवित्रता भंग करना सामाजिक रूप से अनुचित माना जाता था। इस प्रकार धार्मिक आस्था ने अप्रत्यक्ष रूप से जल संरक्षण और स्वच्छता की व्यवस्था को मजबूत किया।
कुमाऊं में नौला-धारा परंपरा का सामाजिक जीवन में विशेष महत्व रहा है। पुराने समय में महिलाएं रोजमर्रा के घरेलू काम के लिए पानी लेने धारे या नौले पर जाती थीं। यही स्थान आपसी बातचीत, समाचारों के आदान-प्रदान और सामाजिक मेलजोल का केंद्र भी बन जाता था। गांव की महिलाओं के लिए धारा केवल पानी भरने की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
गढ़वाल में भी धारे, पंदेरे और अन्य प्राकृतिक जलस्रोत ग्रामीण जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। यहां अनेक जलस्रोतों को स्थानीय देवी-देवताओं और लोकविश्वासों से जोड़ा गया। कई स्थानों पर जलस्रोत के समीप मंदिर या छोटे धार्मिक स्थल बनाए जाने की परंपरा रही है। इससे जलस्रोत को पवित्र स्थान का दर्जा मिलता था और उसके संरक्षण के लिए सामुदायिक भावना मजबूत होती थी।
धाराओं के साथ जुड़ी मान्यताएं हर गांव में बिल्कुल एक जैसी नहीं थीं। स्थानीय देवी-देवताओं, कुल परंपराओं और क्षेत्रीय लोकविश्वासों के अनुसार पूजा की विधि और उससे जुड़ी मान्यताओं में अंतर मिलता है। कहीं धारा को ग्रामदेवता की कृपा से जुड़ा माना गया तो कहीं उसे प्रकृति की देन के रूप में सम्मान दिया गया। इसलिए धारा पूजन को किसी एक निश्चित धार्मिक विधि के बजाय उत्तराखंड की विविध लोकपरंपराओं का हिस्सा समझना अधिक उचित है।
धारा और नौला वास्तुकला की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। पुराने जलस्रोतों के निर्माण में स्थानीय पत्थर, लकड़ी और पारंपरिक निर्माण तकनीक का उपयोग किया जाता था। कई स्थानों पर जल निकास को मकर, सिंह, गाय, हाथी, नाग या अन्य आकृतियों के मुख के रूप में बनाया जाता था। इस तरह उपयोगी जल संरचना को लोककला और धार्मिक प्रतीकों से भी जोड़ा गया।
इन जलस्रोतों की संरचना में पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरणीय समझ भी दिखाई देती है। कई धारे और नौले सीधे धूप से बचाए जाते थे। इससे पानी के वाष्पीकरण को कम करने और उसे अपेक्षाकृत ठंडा रखने में मदद मिलती थी। जलस्रोतों को सुरक्षित और स्वच्छ रखने के लिए आसपास का क्षेत्र भी व्यवस्थित रखा जाता था।
धारा पूजन की परंपरा जीवन के दूसरे संस्कारों से भी जुड़ी रही है। पारंपरिक ग्रामीण समाज में जन्म, विवाह और अन्य धार्मिक अवसरों पर नौले अथवा धारे का उपयोग होता था। कुछ स्थानों पर विशेष संस्कारों के लिए अलग जलस्रोत भी बनाए जाते थे। इससे स्पष्ट होता है कि पानी और जलस्रोत ग्रामीण समाज के धार्मिक जीवन में कितनी गहराई से शामिल थे।
कुमाऊं में प्राचीन नौलों की परंपरा विशेष रूप से समृद्ध रही है। ऐतिहासिक स्रोतों में अनेक पुराने नौलों का उल्लेख मिलता है और कुछ नौले अपनी स्थापत्य कला के लिए भी जाने जाते हैं। गंगोलीहाट के निकट जान्हवी नौले को उत्तराखंड के प्राचीन नौलों में गिना जाता है। इससे पता चलता है कि पहाड़ के समाज ने बहुत पहले से ही जलस्रोतों के संरक्षण और उपयोग के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीक विकसित कर ली थी।
लेकिन आधुनिक समय में धारा पूजन की यह परंपरा कई जगह कमजोर हुई है। गांवों में पाइपलाइन से पानी पहुंचने, पलायन बढ़ने और पारंपरिक जलस्रोतों के प्रति निर्भरता कम होने के कारण नई पीढ़ी का धारे और नौले से रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा। कई पुराने जलस्रोत सूख चुके हैं या उनका जलप्रवाह कम हो गया है। कुछ स्थानों पर जलस्रोतों के आसपास का पारंपरिक सामाजिक तंत्र भी समाप्त हो गया है।
जलस्रोतों का सूखना केवल पानी की समस्या नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा के कमजोर होने का संकेत भी है। जब धारा सूखती है तो उसके साथ उससे जुड़ी लोककथाएं, पूजा-पद्धतियां, सामुदायिक व्यवहार और पीढ़ियों से चला आ रहा स्थानीय ज्ञान भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। उत्तराखंड में पारंपरिक धारे-नौले इसलिए जल संरचना के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत भी हैं।
आज धारा पूजन को केवल एक धार्मिक रस्म के रूप में देखने के बजाय जल संरक्षण के संदेश से जोड़ने की जरूरत है। यदि किसी गांव में नवविवाहिता धारा पूजन के लिए जाती है तो उस अवसर पर परिवार और गांव के लोग उस जलस्रोत की सफाई, आसपास पौधरोपण, जलस्रोत के कैचमेंट क्षेत्र की सुरक्षा और नियमित रखरखाव का संकल्प भी ले सकते हैं। इस तरह सदियों पुरानी परंपरा आधुनिक जल संरक्षण अभियान का माध्यम बन सकती है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में पानी को लेकर पारंपरिक समाज ने जो संवेदनशीलता विकसित की थी, उसमें धारा पूजन एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, जल के प्रति सम्मान, नई बहू का नए समाज से जुड़ाव और सामुदायिक जिम्मेदारी—चारों बातें एक साथ दिखाई देती हैं। यही कारण है कि धारा पूजन को केवल पूजा की परंपरा मानना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा।
आज जब पहाड़ों में जलस्रोतों के संरक्षण की चुनौती बढ़ रही है, तब धारा पूजन जैसी लोकपरंपराएं हमें यह याद दिलाती हैं कि पानी केवल पाइप से घर तक पहुंचने वाली वस्तु नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का आधार है। कुमाऊं और गढ़वाल की इन परंपराओं में छिपा संदेश साफ है—**जिस जलस्रोत ने पीढ़ियों को जीवन दिया, उसकी पूजा के साथ उसकी रक्षा भी जरूरी है।**
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