@विनोद भगत
रात का सन्नाटा, चारों तरफ फैली हरियाली और खेतों के बीच से आती मेंढकों की टर्र-टर्र। पहली नजर में यह महज एक सामान्य प्राकृतिक आवाज लग सकती है, लेकिन गांव और खेतों की जिंदगी को करीब से जानने वालों के लिए यह प्रकृति का अपना संगीत है।
कभी गांवों की रातें इसी संगीत से गुलजार हुआ करती थीं। मेंढकों की आवाज, झींगुरों की झंकार और रात में सक्रिय दूसरे कीट-पतंगों की आवाजें वातावरण में एक अलग ही लय पैदा करती थीं। बुजुर्ग ग्रामीण इन आवाजों को केवल सुनते नहीं थे, बल्कि इनके माध्यम से मौसम और खेती के बारे में भी अनुमान लगाया करते थे।
एक ग्रामीण सुरेश चंद जोशी के साथ हुई बातचीत में जब रात के इस प्राकृतिक संगीत का जिक्र हुआ तो बात केवल मेंढकों की आवाज तक सीमित नहीं रही। ग्रामीण मान्यता के अनुसार मेंढकों की अधिक आवाज को अच्छी बारिश और अच्छी फसल की संभावना से जोड़कर देखा जाता रहा है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी बारिश और नमी बढ़ने के बाद मेंढकों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक है। यही वजह है कि ग्रामीण जीवन में पीढ़ियों से इन आवाजों और बारिश के बीच संबंध महसूस किया जाता रहा है।
दरअसल, रात में सुनाई देने वाली ये आवाजें प्रकृति के उस संसार की निशानी हैं, जिसमें खेत, पानी, घास, पेड़-पौधे, कीट-पतंगे, मेंढक और इंसान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ये जीव अपनी आवाजों के माध्यम से एक-दूसरे से संपर्क करते हैं और अपना जीवन चक्र आगे बढ़ाते हैं। लेकिन शहरों के लगातार फैलते दायरे ने इस प्राकृतिक संसार को तेजी से छोटा कर दिया है।
आज शहरों में रहने वाले लोगों को ऐसी प्राकृतिक आवाजें पहले की तुलना में कम सुनाई देती हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि जहां कभी खुले खेत और घास के मैदान हुआ करते थे, वहां अब मकान और बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो रही हैं। दस-दस मंजिल की इमारतों से घिरे इलाकों में वह प्राकृतिक वातावरण कहां से आएगा, जहां मेंढक और कीट-पतंगे अपना आश्रय बना सकें? प्रकृति से इंसान जितना दूर होता जा रहा है, उतना ही प्रकृति का यह संगीत भी उसकी जिंदगी से दूर होता जा रहा है।
यही बातचीत आगे बढ़ते-बढ़ते एक और गंभीर सवाल तक पहुंचती है—क्या आने वाले समय में खेत ही खत्म हो जाएंगे?
तराई क्षेत्र को कभी कृषि की दृष्टि से बेहद उपजाऊ माना जाता था। यहां दूर-दूर तक खेत दिखाई देते थे और उनमें धान, गेहूं तथा दूसरी फसलें लहलहाती थीं। लेकिन अब तेजी से बदलते परिदृश्य में कई स्थानों पर उन्हीं खेतों की जमीन पर शेड, पार्किंग, व्यावसायिक गतिविधियां और दूसरे निर्माण दिखाई देने लगे हैं।
गदरपुर से दिनेशपुर होते हुए मतकोटा मोड़ की ओर जाने वाले क्षेत्र का उदाहरण बातचीत में सामने आया, जहां कई स्थानों पर कृषि भूमि का इस्तेमाल अब दूसरे कार्यों के लिए होता दिखाई देता है। जिन खेतों में कभी फसल उगती थी, वहां बड़े वाहनों के शेड और पार्किंग जैसी गतिविधियां होने लगी हैं। किसी जमीन के मालिक के लिए यह तत्काल आर्थिक लाभ का रास्ता हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि इसका असर लंबे समय में समाज और खाद्य सुरक्षा पर क्या पड़ेगा?
कृषि भूमि जब व्यावसायिक उपयोग में चली जाती है तो उस जमीन पर अन्न उत्पादन बंद हो जाता है। एक-दो खेतों की बात हो तो शायद इसका असर दिखाई न दे, लेकिन जब बड़ी संख्या में खेत धीरे-धीरे खेती से बाहर होते जाएं तो स्थिति गंभीर हो सकती है। स्थानीय स्तर पर खाद्यान्न उत्पादन कम होने पर दूसरे राज्यों से अनाज मंगाने की जरूरत बढ़ सकती है। इसके साथ परिवहन और आपूर्ति की अतिरिक्त लागत जुड़ती है, जिसका प्रभाव अंततः बाजार और आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है।
बातचीत के दौरान गेहूं की कीमतों का उदाहरण भी सामने आया। वक्ताओं के अनुसार कुछ समय पहले लगभग 600-700 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास मिलने वाला गेहूं आज लगभग 2700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। निश्चित रूप से गेहूं की कीमत बढ़ने के पीछे केवल खेती की जमीन का कम होना जिम्मेदार नहीं है। मौसम, उत्पादन लागत, मांग-आपूर्ति, सरकारी नीतियां, बाजार व्यवस्था और परिवहन सहित अनेक कारण कीमतों को प्रभावित करते हैं। फिर भी कृषि भूमि का लगातार घटना खाद्य उत्पादन के भविष्य को लेकर चिंता पैदा करता है।
इस पूरी स्थिति में एक और चिंता इससे भी बड़ी है—आखिर भविष्य में खेती करेगा कौन? गांवों में कभी युवा खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे। खेतों में परिवार के सभी सदस्य काम करते थे और खेती केवल रोजगार नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा हुआ करती थी। लेकिन बदलते समय के साथ गांवों के युवा निजी कंपनियों, कारखानों, कारोबार, आईटी और दूसरे रोजगारों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। खेती में मेहनत अधिक होने, आय की अनिश्चितता और दूसरे क्षेत्रों में बेहतर अवसर मिलने के कारण युवा पीढ़ी का खेती से जुड़ाव कमजोर हो रहा है।
पुराने किसान आज भी खेत संभाल रहे हैं, लेकिन अगर नई पीढ़ी खेती की ओर नहीं लौटी तो आने वाले समय में किसानों की संख्या और कृषि गतिविधियां दोनों प्रभावित हो सकती हैं। बातचीत में यह आशंका भी जताई गई कि आने वाले पांच वर्षों में किसानों की संख्या बेहद कम रह सकती है। यह आंकड़ा भले ही एक अनुमान हो, लेकिन इसके पीछे छिपी चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विकास जरूरी है। लोगों को घर चाहिए, सड़क चाहिए, उद्योग चाहिए और रोजगार भी चाहिए। लेकिन विकास और कृषि भूमि संरक्षण के बीच संतुलन भी उतना ही जरूरी है। कंक्रीट का जंगल इंसानों को रहने की जगह दे सकता है, लेकिन वह गेहूं, धान और सब्जियां पैदा नहीं कर सकता। जिस खेत को एक बार पूरी तरह कंक्रीट में बदल दिया गया, उसे दोबारा उपजाऊ कृषि भूमि में बदलना आसान नहीं होता।
दरअसल, खेत केवल अन्न पैदा करने की जगह नहीं हैं। वे एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। खेतों में पानी रुकता है, मिट्टी जीवित रहती है, कीट-पतंगों को आवास मिलता है और मेंढकों जैसे जीवों को अपना प्राकृतिक वातावरण मिलता है। खेत खत्म होने का अर्थ केवल फसल का खत्म होना नहीं है, बल्कि प्रकृति की एक पूरी श्रृंखला का कमजोर होना भी है।
रात के अंधेरे में सुनाई देने वाली मेंढकों की टर्र-टर्र इसलिए सिर्फ एक आवाज नहीं है। यह उस प्रकृति की धुन है, जिसके बीच इंसान सदियों से रहता आया है। यह हमें याद दिलाती है कि खेत, किसान, बारिश, पानी, जीव-जंतु और भोजन एक-दूसरे से कितने गहरे जुड़े हुए हैं।
आज खेतों के बीच खड़े होकर मेंढकों की आवाज सुनना सामान्य लग सकता है, लेकिन जिस तेजी से कृषि भूमि कंक्रीट में बदल रही है, संभव है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह आवाज भी किसी पुरानी कहानी का हिस्सा बन जाए।
सवाल इसलिए सिर्फ यह नहीं है कि मेंढक क्यों बोल रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या हम वह वातावरण बचा पाएंगे जिसमें मेंढक बोल सकें, खेत लहलहा सकें और किसान अपनी अगली पीढ़ी को खेती की विरासत सौंप सकें?
क्योंकि अगर खेत ही नहीं बचेंगे, तो आखिर अन्न कौन उगाएगा?
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