@शब्द दूत ब्यूरो (14 अगस्त 2026)
कुमाऊँ के इतिहास में कत्यूरी राजवंश का स्थान सबसे महत्वपूर्ण और सबसे अधिक चर्चा का विषय रहा है। पंडित बद्री दत्त पांडे की प्रसिद्ध पुस्तक कुमाऊँ का इतिहास में कत्यूरी शासन को कुमाऊँ के प्राचीन राजनीतिक इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हालांकि कत्यूरी इतिहास के प्रारंभिक काल की तिथियों और उनकी राज्य-सीमा को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, पांडे जी ने उपलब्ध शिलालेखों, ताम्रपत्रों, स्थानीय परंपराओं और तत्कालीन इतिहास-लेखकों के विवरणों के आधार पर इसकी एक विस्तृत तस्वीर सामने रखी है। इसलिए कत्यूरी इतिहास को समझते समय पांडे जी के विवरण और आधुनिक ऐतिहासिक शोध के बीच अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है।
पांडे जी के अनुसार कुमाऊँ में कत्यूरी सत्ता का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता था। उन्होंने इसकी शुरुआत ईसा से लगभग 2500 वर्ष पूर्व तक पीछे ले जाने का प्रयास किया और लगभग 700 ईस्वी तक के काल को कत्यूरी शासन से जोड़ा। आधुनिक इतिहासलेखन इस अत्यंत प्राचीन काल-निर्धारण को निर्विवाद तथ्य नहीं मानता, लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि पांडे जी कुमाऊँ की राजनीतिक परंपरा को अत्यंत प्राचीन मानते थे। कत्यूरी इतिहास के अधिक ठोस प्रमाण हमें बाद के काल के ताम्रपत्रों और शिलालेखों से मिलते हैं।
कत्यूरी राजाओं के उदय से पहले कुमाऊँ में कौन शासन करता था, इस प्रश्न का निश्चित उत्तर आज भी आसान नहीं है। पांडे जी ने खसों और अन्य प्राचीन समुदायों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार यह निश्चित रूप से कहना कठिन था कि कत्यूरी राजा खस शासकों से पहले इस क्षेत्र में थे अथवा उन्होंने खस शासकों को पराजित करके अपना साम्राज्य बनाया। यही अनिश्चितता कुमाऊँ के प्राचीन इतिहास की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है। लिखित प्रमाण कम हैं और लोकस्मृति तथा बाद के अभिलेख कई बार एक-दूसरे से अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
कत्यूरी राजाओं की उत्पत्ति और उनके मूल स्थान को लेकर भी अनेक मत रहे हैं। कुछ पुराने विद्वानों ने माना कि कत्यूरी राजा पहले जोशीमठ या ज्योतिर्धाम क्षेत्र में रहते थे और वहां से कत्यूर की ओर आए। लेकिन पांडे जी इस मत को स्वीकार करने में सावधानी बरतते हैं। उनका तर्क था कि उपलब्ध कत्यूरी ताम्रपत्रों में राजधानी कार्तिकेयपुर का उल्लेख मिलता है और ये ताम्रपत्र कार्तिकेयपुर से जारी हुए हैं; जोशीमठ से ऐसा कोई ताम्रपत्र नहीं मिला जिससे यह निश्चित रूप से सिद्ध हो कि कत्यूरी राजाओं की राजधानी पहले जोशीमठ थी।
कत्यूरी इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण नाम है कार्तिकेयपुर। आज का कत्यूर क्षेत्र, विशेषकर बैजनाथ के आसपास का भूभाग, इस प्राचीन राजनीतिक केंद्र की स्मृति को अपने भीतर संजोए हुए है। पुराने अभिलेखों में कार्तिकेयपुर को राजधानी के रूप में दर्ज किया गया है। यही कारण है कि कत्यूर और कार्तिकेयपुर का नाम कत्यूरी राजाओं की राजनीतिक पहचान से गहराई से जुड़ गया।
कत्यूरी सत्ता का प्रभाव केवल आज के कुमाऊँ तक सीमित नहीं माना जाता। उनके अभिलेखों में खस, कलिंग, हूण, गौड़, मेद्र, चांडाल, किरात, द्रविंग, उड्र, मालव, कर्नाटक, भोट आदि विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के नाम मिलते हैं। कुछ अभिलेखों में राजाओं की प्रभुता बहुत दूर-दूर तक बताई गई है। लेकिन इन उल्लेखों को आधुनिक इतिहासकारों द्वारा सीधे-सीधे इतने विशाल साम्राज्य की वास्तविक राजनीतिक सीमा का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। संभव है कि इनमें सैन्य विजय, राजनीतिक प्रभाव, अधीनता, संपर्क अथवा तत्कालीन राजकीय प्रशस्ति—इनमें से अलग-अलग अर्थ निहित हों। स्वयं पांडे जी ने भी ऐसे प्रसंगों को लेकर पुराने विद्वानों के मतों पर चर्चा की और कुछ दावों को अनुमान की श्रेणी में रखा।
कत्यूरी राजाओं के बारे में हमारी जानकारी का सबसे मजबूत आधार उनके ताम्रपत्र और शिलालेख हैं। जागेश्वर, बैजनाथ, बागेश्वर, बद्रीनाथ और पांडुकेश्वर जैसे स्थानों से प्राप्त अभिलेखों ने इस राजवंश के अस्तित्व और उसके राजनीतिक प्रभाव की महत्वपूर्ण जानकारी दी है। इन अभिलेखों में राजाओं के नाम, उनकी वंशावली, भूमि-दान, धार्मिक संस्थानों को दिए गए अधिकार और उनके अधीन क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है। पांडे जी ने इन अभिलेखों को कत्यूरी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में माना।
एक ताम्रपत्र में सलोणादित्यदेव, उनके पुत्र इच्छटदेव और उनके पुत्र दैशटदेव का उल्लेख मिलता है। दैशटदेव के बारे में अभिलेखीय विवरण में उनके राज्य की शक्ति और विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभुता का वर्णन मिलता है। आगे के अभिलेखों में पद्मटदेव और सुभिक्षराजदेव जैसे शासकों के नाम सामने आते हैं। इससे पता चलता है कि कत्यूरी राजवंश में सत्ता कई पीढ़ियों तक चली और राजकीय प्रशासन तथा धार्मिक दान की परंपरा विकसित थी।
कत्यूरी शासन की एक महत्वपूर्ण विशेषता भूमि-दान की व्यवस्था थी। राजाओं द्वारा मंदिरों, ब्राह्मणों और धार्मिक संस्थानों को गांव तथा कृषि भूमि दान में दिए जाने के अनेक प्रमाण मिलते हैं। ललितसूरदेव के समय के अभिलेखों में भी भूमि-दान का उल्लेख है। कहीं बदरिकाश्रम को भूमि दी गई, कहीं मंदिरों के पूजन और साधु-संतों की सेवा के लिए जमीन दी गई। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि धार्मिक संस्थाएं उस समय की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।
इन ताम्रपत्रों की भाषा और शैली भी उस समय के समाज की झलक देती है। राजाओं के साथ उनकी रानियों के नाम भी अभिलेखों में दर्ज मिलते हैं। पांडे जी ने इस तथ्य को विशेष रूप से रेखांकित किया और इससे तत्कालीन राजपरिवार तथा सामाजिक जीवन के बारे में निष्कर्ष निकालने का प्रयास किया। अभिलेखों में राजाओं को विद्वानों का संरक्षक, दानी, धर्मपरायण, वीर और प्रजा का हितैषी बताया गया है। हालांकि राजकीय प्रशस्तियों में राजा की प्रशंसा सामान्य बात थी, इसलिए इन विशेषणों को इतिहास के प्रमाण के बजाय तत्कालीन राजकीय भाषा के हिस्से के रूप में भी देखना चाहिए।
कत्यूरी शासकों के धार्मिक जीवन में शिव और विष्णु दोनों की परंपराओं के प्रमाण मिलते हैं। भूमि-दान और मंदिरों से जुड़े अभिलेखों में विभिन्न देवताओं का उल्लेख मिलता है। व्याघ्रेश्वर, भैरव, नारायण और अन्य देवस्थानों के लिए भूमि दान किए जाने की जानकारी सामने आती है। इससे पता चलता है कि धार्मिक जीवन बहुआयामी था और अलग-अलग देवपरंपराएं उस समय समाज में सक्रिय थीं।
कत्यूरी राजाओं और बौद्ध धर्म के संबंध को लेकर भी पांडे जी ने अपने समय के प्रमाणों के आधार पर चर्चा की है। कुछ अभिलेखों में ऐसे शासकों का वर्णन मिलता है जिन्हें बौद्ध मत के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पांडे जी ने अनुमान लगाया कि संभवतः उस समय कुमाऊँ में बौद्ध प्रभाव घट रहा था और ब्राह्मणवाद धार्मिक परंपराओं का पुनरुत्थान हो रहा था। लेकिन इसे भी निश्चित ऐतिहासिक निष्कर्ष की बजाय उस समय उपलब्ध अभिलेखों की व्याख्या के रूप में देखना उचित होगा।
कत्यूरी सत्ता की राजधानी कार्तिकेयपुर थी, लेकिन इसके अतिरिक्त लखनपुर और ब्रह्मपुर जैसे स्थानों को लेकर भी इतिहासकारों में चर्चा हुई है। पुराने इतिहासकार कनिंघम ने लखनपुर और ब्रह्मपुर को कुमाऊँ के राजनीतिक भूगोल से जोड़ने का प्रयास किया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरणों में ब्रह्मपुर और लखनपुर का उल्लेख मिलता है। पांडे जी ने इन विवरणों के आधार पर यह संभावना व्यक्त की कि इनका संबंध कुमाऊँ के प्राचीन राजनीतिक केंद्रों से हो सकता है। हालांकि इन स्थानों की निश्चित पहचान को लेकर भी मतभेद रहे हैं।
कत्यूरी शासन का प्रभाव तराई-भाबर और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच भी दिखाई देता था। पांडे जी ने एक पुराने विवरण का उल्लेख करते हुए कुमाऊँ के राजा और मैदान के एक शक्तिशाली राजा के बीच संघर्ष की कथा भी दर्ज की है। उसमें कुमाऊँ के राजा द्वारा मैदानी सत्ता का विरोध करने और युद्ध के बाद पहाड़ की ओर लौटने की बात कही गई है। पांडे जी ने संभावना व्यक्त की कि यह घटना कत्यूरी राजाओं से संबंधित हो सकती है, लेकिन उन्होंने इसे निश्चित प्रमाण के रूप में स्थापित नहीं किया। इस तरह के प्रसंग बताते हैं कि कुमाऊँ के राजाओं का मैदानों की राजनीति से संपर्क और संघर्ष रहा होगा।
कत्यूरी शासन में केवल एक केंद्रीकृत राजधानी ही नहीं थी, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थानीय शासक और मांडलिक भी रहे होंगे। बाद की परंपराओं में अनेक छोटे-छोटे स्थानीय राजाओं का उल्लेख मिलता है, जो बड़ी सत्ता के अधीन रहते थे। चंदकालीन विवरणों में भी कई ऐसे स्थानीय राज्यों और किलों की चर्चा आती है जिन्हें पहले कत्यूरी सत्ता से जोड़ा गया है। अल्मोड़ा के आसपास बैचलदेव या बैजलदेव जैसे कत्यूरी शासकों की परंपरा इसका एक उदाहरण है।
कटारमल का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर भी कत्यूरी इतिहास की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जाता है। पांडे जी के विवरण में इसे कत्यूरी राजा कटारमल्ल देव से संबंधित बताया गया है। यह मंदिर कुमाऊँ की स्थापत्य परंपरा की एक महत्वपूर्ण धरोहर है और यह इस बात की ओर संकेत करता है कि कत्यूरी काल में धार्मिक स्थापत्य और सूर्योपासना की भी महत्वपूर्ण परंपरा रही होगी।
कत्यूरी राजाओं की शक्ति केवल युद्धों से नहीं बनी थी। उनके शासन की वास्तविक ताकत प्रशासन, कृषि भूमि पर नियंत्रण, धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण, स्थानीय शासकों पर प्रभुत्व और पहाड़ तथा मैदान के बीच संपर्क में भी रही होगी। ताम्रपत्रों में गांवों, खेतों, सीमाओं और स्थानीय अधिकारियों के उल्लेख से यह स्पष्ट होता है कि शासन व्यवस्था केवल राजदरबार तक सीमित नहीं थी। राजा के आदेशों को स्थानीय अधिकारियों तक पहुंचाने की व्यवस्था थी और भूमि-दान के बाद उसके अधिकारों की रक्षा करने की प्रशासनिक परंपरा भी थी।
लेकिन इतनी बड़ी राजनीतिक शक्ति हमेशा के लिए एकजुट नहीं रही। कत्यूरी साम्राज्य के कमजोर पड़ने के साथ उसका विशाल राजनीतिक ढांचा धीरे-धीरे छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित होने लगा। स्थानीय सत्ता-केंद्र मजबूत हुए और कत्यूर की केंद्रीय शक्ति कमजोर हुई। पांडे जी के अनुसार एक समय का विस्तृत कत्यूरी राज्य बाद में अनेक छोटे राज्यों में बंट गया। आगे चलकर इन्हीं बिखरी हुई राजनीतिक शक्तियों को चंद शासकों ने अपने प्रभाव में लेकर एक नई राजनीतिक व्यवस्था खड़ी की।
कत्यूरी सत्ता के पतन को किसी एक युद्ध या किसी एक राजा की हार से समझना उचित नहीं होगा। लंबे समय तक चलने वाले राजवंशों में अक्सर केंद्रीय सत्ता धीरे-धीरे कमजोर होती है, स्थानीय शासक स्वतंत्र होते जाते हैं और नए राजनीतिक केंद्र उभरने लगते हैं। कुमाऊँ में भी यही प्रक्रिया दिखाई देती है। कत्यूरी सत्ता के कमजोर होने के बाद कुमाऊँ में अनेक स्थानीय राजघराने और छोटे-छोटे राज्य उभरे और अंततः चंद राजवंश के लिए विस्तार का रास्ता तैयार हुआ।
यही वह मोड़ था जहां कुमाऊँ के इतिहास का अगला बड़ा अध्याय शुरू होता है।
कत्यूरी राजवंश ने कुमाऊँ की राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान पर गहरी छाप छोड़ी। कार्तिकेयपुर की स्मृति, बैजनाथ के मंदिर, कटारमल का सूर्य मंदिर, ताम्रपत्रों में दर्ज राजाओं के नाम, भूमि-दान की परंपरा और अनेक स्थानीय लोककथाएं आज भी उस युग को जीवित रखती हैं। कत्यूरी इतिहास में इतिहास और किंवदंती का मेल भी है, इसलिए इसे पढ़ते समय प्रमाणित अभिलेखों और लोकपरंपराओं के बीच अंतर करना जरूरी है।
फिर भी एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि कत्यूरी युग ने कुमाऊँ के इतिहास को एक मजबूत राजनीतिक आधार दिया। इस राजवंश ने हिमालयी भूभाग में एक ऐसी सत्ता का निर्माण किया जिसकी स्मृति सदियों बाद भी लोकजीवन में बनी रही। उनके शासन से जुड़े अभिलेख हमें बताते हैं कि कुमाऊँ उस समय अलग-थलग पहाड़ी क्षेत्र नहीं था, बल्कि उत्तर भारत के व्यापक राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संसार से जुड़ा हुआ था।
और जब यह विशाल कत्यूरी सत्ता धीरे-धीरे बिखरी, तो उसके पीछे केवल खंडहर नहीं बचे। उसके पीछे एक राजनीतिक विरासत, मंदिरों की परंपरा, भूमि-दान की व्यवस्था, स्थानीय राजघरानों की स्मृतियां और एक ऐसा ऐतिहासिक भूगोल बचा, जिस पर आगे चलकर चंद राजवंश ने अपनी सत्ता का निर्माण किया।
इस प्रकार कुमाऊँ की कहानी में कत्यूरी राजवंश केवल एक बीता हुआ राजघराना नहीं है। वह उस लंबे ऐतिहासिक संक्रमण का नाम है जिसमें प्राचीन पहाड़ी सत्ता ने एक व्यापक राजनीतिक रूप ग्रहण किया, कार्तिकेयपुर जैसे केंद्र विकसित हुए, धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को संरक्षण मिला, दूर-दूर तक राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने के प्रयास हुए और अंततः वही विशाल सत्ता छोटे-छोटे राज्यों में बिखर गई।
कत्यूरी युग के अवसान के बाद कुमाऊँ खाली नहीं हुआ था। वहां सत्ता के अनेक केंद्र जीवित थे। इन्हीं परिस्थितियों में एक नया राजवंश उभरने वाला था—चंद वंश। उसकी शुरुआत, सोमचंद के कुमाऊँ आगमन की परंपरा और कत्यूरी सत्ता के बाद चंदों के धीरे-धीरे शक्तिशाली बनने की कहानी कुमाऊँ के इतिहास का अगला बड़ा अध्याय है।
डिस्क्लेमर – यह लेख पं. बद्री दत्त पांडे की ‘कुमाऊँ का इतिहास’ में दिए गए विवरण को आधार बनाकर तैयार किया गया है। कत्यूरी काल की प्राचीन तिथियों, राजधानी तथा राज्य-विस्तार से जुड़े कुछ दावों पर आधुनिक इतिहासलेखन में मतभेद हैं; इसलिए लेख में जहां आवश्यक है, वहां पांडे जी के मत और ऐतिहासिक प्रमाण के बीच अंतर स्पष्ट रखा गया है।
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