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अपराधी की जाति-धर्म और नेता की पार्टी देखकर तय होगी कार्रवाई?कानून हालांकि निष्पक्ष पर बेबसी भी हावी

@शब्द दूत ब्यूरो (23 सितंबर 2026)

कानून की नजर में अपराधी की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता और किसी राजनीतिक दल की सदस्यता भी उसके अपराध की गंभीरता को कम या ज्यादा नहीं करती। संविधान और कानून का मूल सिद्धांत यही है कि अपराध की जांच और कार्रवाई व्यक्ति के प्रभाव, पहचान या राजनीतिक संबंध के आधार पर नहीं, बल्कि अपराध की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन जब आम आदमी को अपने आसपास होने वाली घटनाओं में कार्रवाई के अलग-अलग पैमाने दिखाई देने लगें तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या कानून का इस्तेमाल वास्तव में समान रूप से हो रहा है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि पुलिस किस अपराध पर तत्काल सक्रिय होती है और किस अपराध को अपनी आंखों के सामने होते हुए भी नजरअंदाज करती दिखाई देती है? क्या हर शिकायत पर समान तत्परता दिखाई जाती है? क्या प्रभावशाली व्यक्ति और सामान्य नागरिक के मामले में पुलिस की गति एक जैसी रहती है? और क्या किसी राजनीतिक दल से जुड़े व्यक्ति के मामले में पुलिस और प्रशासन का रवैया बदल जाता है?

यह सवाल किसी एक पार्टी, सरकार या समुदाय तक सीमित नहीं है। सत्ता बदलती रहती है, राजनीतिक दल बदलते रहते हैं और सत्ता के समीकरण भी बदलते रहते हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब पुलिस की कार्रवाई राजनीतिक पहचान से स्वतंत्र दिखाई दे।

किसी घटना के बाद सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए कि अपराध क्या है। उसके बाद यह देखा जाना चाहिए कि अपराध के संबंध में क्या साक्ष्य उपलब्ध हैं, कौन-कौन से कानूनी प्रावधान लागू होते हैं और जांच की प्रक्रिया क्या कहती है। इसके विपरीत यदि कार्रवाई से पहले यह देखा जाने लगे कि आरोपी किस जाति से है, उसका धर्म क्या है, उसका सामाजिक प्रभाव कितना है या वह किस राजनीतिक दल से जुड़ा है, तो कानून के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।

समस्या केवल कार्रवाई होने या न होने की नहीं है। समस्या कार्रवाई की गति और उसके तरीके की भी है। एक सामान्य व्यक्ति के खिलाफ मामूली विवाद में पुलिस तेजी से पहुंच जाए, लेकिन प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़े गंभीर आरोपों में शिकायत लंबे समय तक जांच, आवेदन और पूछताछ के बीच घूमती रहे, तो जनता सवाल पूछेगी ही। दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगते ही बिना पर्याप्त जांच के उसे सार्वजनिक रूप से अपराधी मान लिया जाए, तो यह भी न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

यही कारण है कि पुलिस के लिए दोनों स्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं—अपराध होने पर तत्काल और निष्पक्ष कार्रवाई करना तथा किसी निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर अपराधी न मान लेना।

कई बार पुलिस पर राजनीतिक दबाव के आरोप लगते हैं। ऐसे आरोपों की वास्तविकता हर मामले में अलग-अलग जांच का विषय है और बिना प्रमाण किसी अधिकारी या राजनीतिक व्यक्ति पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पुलिस की निष्पक्षता केवल निष्पक्ष होने से नहीं, बल्कि निष्पक्ष दिखाई देने से भी मजबूत होती है। जनता को यह भरोसा होना चाहिए कि शिकायतकर्ता और आरोपी की पहचान चाहे जो हो, प्रक्रिया एक जैसी रहेगी।

सवाल यह भी है कि पुलिस के सामने अपराध हो और कार्रवाई न हो तो जिम्मेदारी किसकी होगी? यदि कोई घटना सार्वजनिक स्थान पर होती है, पुलिसकर्मी मौजूद हैं, वीडियो उपलब्ध है, प्रत्यक्षदर्शी मौजूद हैं और फिर भी कार्रवाई में असामान्य देरी होती है, तो उस देरी का कारण स्पष्ट होना चाहिए। हर मामले में पुलिस की निष्क्रियता मान लेना भी सही नहीं है, क्योंकि कई बार कानूनन कार्रवाई के लिए प्रारंभिक जांच, अधिकार क्षेत्र, साक्ष्य जुटाने और अन्य प्रक्रियाएं जरूरी होती हैं। लेकिन जहां कार्रवाई में देरी हुई है, वहां उसका कारण पारदर्शी तरीके से बताया जाना चाहिए।

लोकतंत्र में पुलिस किसी सरकार या राजनीतिक दल की निजी संस्था नहीं होती। पुलिस का दायित्व कानून लागू करना है। सरकारें पुलिस को प्रशासनिक दिशा दे सकती हैं, लेकिन किसी अपराध की गंभीरता का निर्धारण राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं होना चाहिए।

इसी तरह विपक्षी दलों की भी जिम्मेदारी है। यदि उनके किसी नेता या समर्थक पर गंभीर आरोप लगते हैं तो केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण हर कार्रवाई को साजिश कहना भी उचित नहीं है। और यदि सत्तारूढ़ दल से जुड़े व्यक्ति पर आरोप लगे तो केवल राजनीतिक संरक्षण के नाम पर जांच की मांग करना भी पर्याप्त नहीं होना चाहिए। दोनों परिस्थितियों में प्रमाण, कानून और जांच की प्रक्रिया को केंद्र में रखना जरूरी है।

आज सोशल मीडिया ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। किसी घटना का वीडियो कुछ मिनटों में वायरल हो जाता है और उसके बाद लोग आरोपी की पहचान, जाति, धर्म और राजनीतिक संबंध के आधार पर अपने-अपने निष्कर्ष निकालने लगते हैं। कई बार जांच पूरी होने से पहले ही सोशल मीडिया अदालत लगा देता है। पुलिस पर भी तत्काल कार्रवाई का दबाव बनता है। लेकिन कानून की प्रक्रिया भीड़ की धारणा के अनुसार नहीं चल सकती।

इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस को धीमा होना चाहिए। बल्कि जरूरत इस बात की है कि पुलिस तेज भी हो और निष्पक्ष भी। शिकायत मिलने पर समयबद्ध प्रारंभिक कार्रवाई हो, गंभीर मामलों में तत्काल साक्ष्य सुरक्षित किए जाएं, आरोपों की जांच हो, पीड़ित को सुरक्षा और कानूनी सहायता मिले तथा आरोपी के अधिकारों का भी संरक्षण हो।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—क्या कानून का पैमाना व्यक्ति देखकर बदल सकता है?

यदि कोई अपराध सामान्य नागरिक करता है तो वही कानून उसके लिए लागू होना चाहिए जो किसी राजनीतिक कार्यकर्ता, नेता, कारोबारी, अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति पर लागू होता है। इसी तरह किसी व्यक्ति की जाति या धर्म अपराध का प्रमाण नहीं हो सकता। अपराध व्यक्ति का कृत्य है, उसकी पहचान नहीं।

पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठना केवल पुलिस की छवि का संकट नहीं है। यह पूरे न्याय तंत्र में जनता के विश्वास का सवाल है। यदि लोगों को लगने लगे कि कार्रवाई अपराध देखकर नहीं बल्कि आरोपी की पहचान देखकर होती है, तो कानून के प्रति सम्मान कमजोर पड़ सकता है। और जब कानून पर भरोसा कमजोर होता है तो समाज में न्याय की जगह प्रभाव, दबाव और भीड़ की मानसिकता मजबूत होने लगती है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आरोपी कौन है, किस जाति का है, किस धर्म का है या किस पार्टी से जुड़ा है। असली सवाल होना चाहिए—अपराध क्या हुआ, उसके प्रमाण क्या हैं और कानून उसके बारे में क्या कहता है?

पुलिस की सफलता यह नहीं है कि उसने किसी एक पक्ष के खिलाफ कार्रवाई कर दी। पुलिस की असली सफलता तब है जब पीड़ित को न्याय की उम्मीद हो, आरोपी को निष्पक्ष जांच का अधिकार मिले और समाज को यह भरोसा रहे कि कानून सबके लिए एक जैसा है।

लोकतंत्र में पुलिस की आंखें किसी राजनीतिक पहचान के सामने बंद नहीं होनी चाहिए और उसके कान किसी प्रभावशाली व्यक्ति की आवाज के कारण बंद नहीं होने चाहिए। कानून की ताकत तभी दिखाई देती है जब वह कमजोर और शक्तिशाली—दोनों के लिए एक ही पैमाने से काम करे।

क्योंकि अंततः सवाल किसी अपराधी की जाति या धर्म का नहीं है। सवाल किसी नेता की पार्टी का भी नहीं है। सवाल सिर्फ इतना है—क्या कानून सचमुच कानून है, या उसकी धार व्यक्ति देखकर बदल जाती है?

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