@शब्द दूत ब्यूरो (25 सितंबर 2026)
काशीपुर। उत्तराखंड परिवहन निगम की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। काशीपुर डिपो की एक बस के फिटनेस प्रमाणपत्र की अवधि समाप्त होने के बावजूद उसके सड़कों पर संचालन का मामला सामने आया है। एक बस पर करीब आठ माह के दौरान 148 चालान हुए और करीब 15 लाख रुपये का जुर्माना बन चुका है। मामला सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर जांच चल रही है और इस पूरे प्रकरण में रोडवेज के कई अधिकारी और कर्मचारी भी संदेह के घेरे में बताए जा रहे हैं।
बताया गया है कि काशीपुर डिपो की बस संख्या यूके-07-पीए-4294 की फिटनेस अवधि 20 जनवरी 2026 को समाप्त हो गई थी। इसके बावजूद बस का संचालन बंद नहीं हुआ और वह सड़कों पर दौड़ती रही। परिवहन विभाग के कैमरों और ऑनलाइन एनपीआर कैमरा सिस्टम के माध्यम से बस के लगातार सड़क पर चलने की जानकारी सामने आती रही।
21 जनवरी से 22 अगस्त तक बस के कुल 148 चालान किए गए। प्रति चालान करीब 10 हजार रुपये के हिसाब से अब तक लगभग 15 लाख रुपये का जुर्माना लग चुका है। वर्तमान में भी बस पर 151 चालान लंबित बताए गए हैं। सबसे गंभीर सवाल यह है कि फिटनेस समाप्त होने के बाद भी बस को संचालन की अनुमति कैसे मिली और इतने बड़े स्तर पर चालान होने के बावजूद जिम्मेदार स्तर पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
बताया जा रहा है कि परिवहन विभाग का कैमरा सिस्टम लगातार बस की गतिविधियों को रिकॉर्ड करता रहा। काशीपुर के जगतपुर टोल प्लाजा पर लगे परिवहन विभाग के ऑनलाइन एनपीआर कैमरे ने भी बस को कई बार पकड़ा। इसके बावजूद निगम की निगरानी व्यवस्था बस का संचालन रोकने में प्रभावी साबित नहीं हुई।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब परिवहन निगम के कर्मचारियों के वेतन को लेकर भी परेशानियां बनी हुई हैं। ऐसे में निगम की एक बस पर लाखों रुपये के जुर्माने का मामला विभागीय कार्यप्रणाली और वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े कर रहा है। सवाल यह भी है कि यदि समय रहते फिटनेस समाप्त होने की जानकारी उपलब्ध थी, तो बस को सड़क पर भेजने की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई।
मामले की जांच चल रही है। जांच के दौरान यह स्पष्ट होना बाकी है कि बस को फिटनेस समाप्त होने के बाद किसकी अनुमति या लापरवाही के चलते चलाया गया, चालानों की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक कब-कब पहुंची और उसके बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इस पूरे प्रकरण में काशीपुर डिपो से जुड़े कई अधिकारी और कर्मचारी संदेह के घेरे में बताए जा रहे हैं। हालांकि जांच पूरी होने और जिम्मेदारी तय होने तक किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
अब निगाहें जांच पर हैं कि करीब 15 लाख रुपये के जुर्माने की स्थिति कैसे बनी, निगम को इससे कितना वित्तीय नुकसान हुआ और यदि लापरवाही सामने आती है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई की जाती है। मामला सिर्फ एक बस के चालानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि परिवहन निगम की बसों की फिटनेस, परमिट और चालानों की निगरानी की व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है।
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