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मेरी उड़ीसा यात्रा: कोणार्क सूर्य मंदिर की अविस्मरणीय कहानी, सूर्य के रथ पर सवार भारत की गौरवशाली विरासत, जहाँ कभी भी पूजा नहीं हुई, आखिर क्यों?

@विनोद भगत

आज भी जब उड़ीसा की यात्रा को याद करता हूँ तो अनेक दृश्य मन में एक साथ उभर आते हैं, लेकिन उनमें सबसे प्रभावशाली दृश्य है विश्व प्रसिद्ध कोणार्क के सूर्य मंदिर का। दूर से दिखाई देता इसका भव्य स्वरूप, विशाल पत्थरों पर उकेरी गई अद्भुत शिल्पकला और सदियों का इतिहास अपने भीतर समेटे यह धरोहर वास्तव में किसी भी यात्री को मंत्रमुग्ध कर देती है।

उड़ीसा को यूँ ही “मंदिरों की धरती” नहीं कहा जाता। यहाँ जहाँ भी जाइए, किसी न किसी प्राचीन मंदिर की घंटियाँ, उसकी स्थापत्य कला और उससे जुड़ी लोककथाएँ आपका स्वागत करती हैं। लेकिन यदि किसी एक मंदिर का नाम पूरे विश्व में सबसे पहले लिया जाता है तो वह निस्संदेह कोणार्क का सूर्य मंदिर है। पुरी से लगभग 35 किलोमीटर दूर, बंगाल की खाड़ी के किनारे चंद्रभागा समुद्र तट के समीप स्थित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय वास्तुकला और शिल्पकला का अनुपम उदाहरण है।

जब मैं मंदिर परिसर में पहुँचा तो सबसे पहले इसकी विशालता ने मुझे विस्मित कर दिया। दूर से ही पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी स्पष्ट दिखाई देने लगती है। ऐसा लगता है मानो पत्थरों में प्राण बस गए हों। मंदिर का प्रत्येक भाग किसी कलाकार की वर्षों की साधना का परिणाम प्रतीत होता है। यह केवल एक भवन नहीं बल्कि पत्थरों में लिखी गई एक महाकाव्यात्मक कहानी है।

इतिहास बताता है कि इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के महान शासक राजा नरसिंहदेव प्रथम ने कराया था। सूर्य देव को समर्पित यह मंदिर उनके रथ के रूप में बनाया गया है। मंदिर की संरचना इतनी अद्भुत है कि इसे देखते ही कल्पना सजीव हो उठती है। रथ के आगे सात घोड़े और दोनों ओर बारह-बारह विशाल पत्थर के पहिए बनाए गए हैं। समय की मार से घोड़ों के अधिकांश अवशेष नष्ट हो चुके हैं, लेकिन विशाल पहिए आज भी अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़े हैं। इन पहियों पर की गई महीन नक्काशी देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय के शिल्पकार कितने कुशल रहे होंगे।

इन पहियों के पास पहुँचकर मैं काफी देर तक उन्हें निहारता रहा। प्रत्येक पहिया केवल सजावट का हिस्सा नहीं, बल्कि समय, विज्ञान और कला का अद्भुत संगम है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इन पहियों की सहायता से समय का अनुमान भी लगाया जा सकता था। सचमुच, भारतीय स्थापत्य और विज्ञान का यह अनूठा मेल देखकर गर्व की अनुभूति होती है।

कोणार्क की शिल्पकला की तुलना प्रायः मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिरों से की जाती है। वास्तव में दोनों ही स्थान भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्ट परंपरा के प्रतीक हैं। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई असंख्य मूर्तियाँ उस युग के सामाजिक जीवन, संगीत, नृत्य, युद्ध, पशु-पक्षियों और मानवीय भावनाओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती हैं। हर मूर्ति मानो अपनी अलग कहानी कह रही हो।

मंदिर का मुख्य गर्भगृह अब दर्शकों के लिए खुला नहीं है। जानकारी मिली कि वर्षों पहले मंदिर की संरचना कमजोर होने लगी थी। इसके संरक्षण के लिए अंग्रेज़ी शासनकाल में गर्भगृह को भीतर से पूरी तरह भरकर बंद कर दिया गया, ताकि यह विश्व धरोहर सुरक्षित रह सके। आज भी श्रद्धालु और पर्यटक केवल बाहरी हिस्से का ही दर्शन कर पाते हैं।

वर्ष 1984 में यूनेस्को ने कोणार्क सूर्य मंदिर को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया। यह सम्मान केवल उड़ीसा या भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता की सांस्कृतिक विरासत के लिए गौरव का विषय है। दुनिया भर से हजारों पर्यटक यहाँ इसकी स्थापत्य कला और इतिहास को देखने आते हैं।

एक बात जिसने मेरा विशेष ध्यान आकर्षित किया, वह यह थी कि सूर्य देव को समर्पित होने के बावजूद यहाँ नियमित पूजा-अर्चना होती हुई दिखाई नहीं देती। श्रद्धालु आते हैं, मंदिर को निहारते हैं, उसकी भव्यता के सामने नतमस्तक होते हैं, तस्वीरें लेते हैं और इतिहास को महसूस करते हैं। यहाँ आस्था का स्वरूप पूजा से अधिक विरासत के सम्मान और सांस्कृतिक गौरव के रूप में दिखाई देता है। पूजा न होने के पीछे कहा जाता है कि जब इस मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ तो इसके मुख्य वास्तुकार ने आत्महत्या कर ली थी मंदिर की स्थापना के समय की गयी इस दुखद आत्महत्या के बाद से इस मंदिर में पूजा नहीं की जाती। यहाँ स्थित सूर्य की प्रतिमा को भी जगन्नाथ मंदिर में स्थापित कर दिया गया।

मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित चंद्रभागा समुद्र तट का शांत वातावरण इस यात्रा को और भी यादगार बना देता है। समुद्र की लहरों की आवाज़ और मंदिर की ऐतिहासिक भव्यता मिलकर ऐसा वातावरण निर्मित करती है जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। ऐसा लगता है जैसे इतिहास, प्रकृति और आध्यात्मिकता एक ही स्थान पर आकर मिल गए हों।

कोणार्क की यात्रा मेरे लिए केवल एक पर्यटन अनुभव नहीं रही, बल्कि भारतीय संस्कृति, कला, विज्ञान और इतिहास को निकट से समझने का अवसर भी बनी। जब लौट रहा था तो मन में यही विचार था कि हमारे पूर्वजों ने सीमित संसाधनों में भी ऐसी अद्भुत धरोहरों का निर्माण किया, जिन्हें आज पूरी दुनिया सम्मान की दृष्टि से देखती है। कोणार्क का सूर्य मंदिर केवल पत्थरों का एक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की सृजनशीलता, सांस्कृतिक समृद्धि और स्थापत्य प्रतिभा का अमर प्रतीक है। जो भी उड़ीसा जाए, उसे इस अद्भुत विश्व धरोहर का दर्शन अवश्य करना चाहिए।

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