@शब्द दूत ब्यूरो (28 सितंबर 2026)
रुद्रप्रयाग। केदारनाथ यात्रा मार्ग पर घोड़े-खच्चरों की लीद के निस्तारण को लेकर किए गए सरकारी दावों पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। प्रशासन और पर्यटन विभाग की ओर से दावा किया गया था कि घोड़े-खच्चरों की लीद को चीड़ के पिरूल के साथ मिलाकर फायर ब्रिक्स तैयार की जाएंगी। इन फायर ब्रिक्स का इस्तेमाल बॉयलर में ईंधन के तौर पर कर यात्रियों के लिए गर्म पानी उपलब्ध कराने की योजना थी। लेकिन यात्रा सीजन समाप्ति की ओर पहुंचने के बावजूद इस योजना का धरातल पर अपेक्षित असर दिखाई नहीं दे रहा है।
स्थिति यह है कि केदारनाथ मार्ग पर घोड़े-खच्चरों की लीद जगह-जगह जमा हो रही है। बारिश के दौरान यह गंदगी पानी के साथ बहकर मंदाकिनी नदी तक पहुंचने की आशंका बनी हुई है। ऐसे में पर्यावरण प्रदूषण और नदी की स्वच्छता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार पर्यटन विभाग ने कैबिनेट से पायलट प्रोजेक्ट को मंजूरी दिलाने के बाद 3 फरवरी 2026 को हिमालय इंस्टीट्यूट फॉर इनवायरमेंट इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट संस्था को करीब 1 करोड़ 43 लाख 61 हजार रुपये की लागत से यह काम सौंपा। योजना को लेकर उस समय बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार किया गया था। दावा था कि लीद का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण होगा और इससे तैयार ईंधन से बॉयलर चलाकर तीर्थ यात्रियों को गर्म पानी उपलब्ध कराया जाएगा।
हालांकि फरवरी से सितंबर तक करीब आठ महीने बीत जाने के बाद भी योजना के परिणाम को लेकर सवाल बने हुए हैं। आरोप है कि यात्रा मार्ग से लीद नियमित रूप से नहीं उठाई जा रही है। कई बार लीद को कट्टों में भरकर किसी किनारे छोड़ दिया जाता है और कुछ ही दिनों बाद मार्ग फिर उसी स्थिति में दिखाई देने लगता है।
प्रोजेक्ट स्थल पर बिजली और ईंधन की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि कभी बिजली की समस्या के कारण बॉयलर संचालन प्रभावित होता है तो कभी लकड़ी की उपलब्धता को लेकर दिक्कत सामने आती है। वहीं, पिरूल से तैयार फायर ब्रिक्स का इस्तेमाल किस व्यवस्था के तहत और किस प्रकार के चूल्हे या बॉयलर में किया जाना है, इसे लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
इस बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि जिस संस्था को इतना बड़ा पायलट प्रोजेक्ट दिया गया, उसके पूर्व अनुभव और चयन प्रक्रिया क्या थी। संस्था कब अस्तित्व में आई, इसके पीछे कौन लोग हैं और सरकार ने इस परियोजना के लिए इसी संस्था का चयन किन आधारों पर किया, इन सवालों के जवाब भी सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आए हैं।
जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग विशाल मिश्रा से जब परियोजना की प्रगति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसे “वर्क इन प्रोग्रेस” बताया। उनका कहना है कि लीद निस्तारण परियोजना में कार्रवाई गतिमान है और संबंधित संस्था केदारनाथ क्षेत्र में बॉयलर लगाने के प्रयास कर रही है।
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू पिछले वर्ष की व्यवस्था का है। जिला प्रशासन के आग्रह पर पतंजलि योगपीठ ने केदारनाथ यात्रा मार्ग से घोड़े-खच्चरों की लीद उठाने और उसके निस्तारण की पहल की थी। इसके लिए केदारनगरी में एक केंद्र भी स्थापित किया गया था। बताया जाता है कि भवन निर्माण सहित अन्य व्यवस्थाओं पर पतंजलि की ओर से करीब 50 लाख रुपये से अधिक खर्च किए गए थे और यह काम सेवा के रूप में किया गया था, जिसके लिए सरकार से किसी तरह की आर्थिक सहायता नहीं ली गई।
लेकिन पतंजलि योगपीठ की व्यवस्था आगे बढ़ती, उससे पहले ही 10 अप्रैल 2026 को रुद्रप्रयाग के जिला पशुपालन अधिकारी आशीष रावत की ओर से संस्था को काम न करने के आरोपों को लेकर नोटिस जारी किया गया। पतंजलि पक्ष का कहना है कि फरवरी में ही यह काम बिना पूर्व सूचना के दूसरी संस्था को सौंप दिया गया था। इसके बाद पतंजलि योगपीठ की ओर से पशुपालन विभाग और जिला प्रशासन को कानूनी नोटिस भेजे जाने तथा अपने खर्च की भरपाई की मांग किए जाने की बात सामने आई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस समस्या के समाधान के लिए पहले निजी संस्था द्वारा बिना सरकारी सहायता के काम किया जा रहा था, उसी समस्या के लिए सरकार ने करोड़ों रुपये के करीब की परियोजना स्वीकृत की, लेकिन इसके बावजूद यात्रा मार्ग पर लीद का नियमित निस्तारण सुनिश्चित क्यों नहीं हो पाया।
केदारनाथ यात्रा मार्ग पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में घोड़े-खच्चरों की आवाजाही होती है। घोड़े-खच्चरों की लीद का उचित निस्तारण न होने पर इसका सीधा असर यात्रा मार्ग की स्वच्छता के साथ-साथ जल स्रोतों पर भी पड़ सकता है। पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बारिश के दौरान सड़क और आसपास जमा जैविक कचरा बहकर नदी-नालों तक पहुंच सकता है।
घोड़े-खच्चरों की लीद से मंदाकिनी नदी के प्रदूषण और जलीय जीवों पर संभावित प्रभाव को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के स्तर पर भी उत्तराखंड सरकार और संबंधित पर्यावरणीय संस्थाओं को चिंता जताए जाने की बात सामने आती रही है।
ऐसे में अब निगाहें इस बात पर हैं कि 1 करोड़ 43 लाख 61 हजार रुपये के पायलट प्रोजेक्ट का वास्तविक परिणाम क्या रहा, अब तक कितनी लीद उठाई गई, कितनी फायर ब्रिक्स तैयार हुईं, कितने बॉयलर लगाए गए और यात्रियों को वास्तव में कितना गर्म पानी उपलब्ध कराया गया। इन सवालों का जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि योजना अपने निर्धारित उद्देश्य की दिशा में कितनी आगे बढ़ी है।
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