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जब इंदिरा गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी के सिर पर तान दिया था छाता, राजनीतिक मतभेद थे आज की तरह व्यक्तिगत शत्रुता नहीं, क्या है इस तस्वीर की पूरी कहानी?

@विनोद भगत

भारतीय राजनीति का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन, चुनावी संघर्ष और राजनीतिक विरोध का इतिहास नहीं है। इसके पन्नों में ऐसे अनेक प्रसंग भी दर्ज हैं, जब विचारधाराएं अलग थीं, राजनीतिक मतभेद गहरे थे और संसद में एक-दूसरे की नीतियों पर तीखे हमले होते थे, लेकिन व्यक्तिगत संबंधों में संवाद और सम्मान की गुंजाइश बनी रहती थी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और भारतीय जनसंघ के प्रमुख नेता अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ी छाते वाली तस्वीर इसी राजनीतिक संस्कृति की एक यादगार मिसाल मानी जाती है।

यह प्रसंग वर्ष 1972 का बताया जाता है। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने के लिए 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौता हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते को लेकर विपक्ष में कई तरह की आपत्तियां थीं और जनसंघ भी इसकी कुछ शर्तों को लेकर संतुष्ट नहीं था।

अटल बिहारी वाजपेयी उस समय जनसंघ के प्रमुख नेताओं में थे। संसद में उन्होंने सरकार की नीतियों और शिमला समझौते को लेकर अपनी आपत्तियां खुलकर रखीं। राजनीतिक रूप से वे इंदिरा गांधी की सरकार के विरोधी थे, लेकिन यही राजनीतिक विरोध दोनों के बीच संवाद की राह में बाधा नहीं बना।

बताया जाता है कि इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में इंदिरा गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को बातचीत के लिए बुलाया। दोनों ने कमरे में बैठकर बातचीत करने के बजाय बाहर टहलते हुए बात करने का निर्णय लिया। बातचीत के दौरान अचानक हल्की बारिश शुरू हो गई।

किसी ने इंदिरा गांधी को छाता लाकर दिया। इसके बाद जो दृश्य सामने आया, वही आगे चलकर भारतीय राजनीति की चर्चित तस्वीर बन गया।

इंदिरा गांधी ने छाता अपने ऊपर रखने के बजाय उसे अटल बिहारी वाजपेयी के सिर के ऊपर कर दिया। वाजपेयी बातचीत करते रहे और इंदिरा गांधी उनके ऊपर छाता थामे रहीं।

एक तरफ देश की प्रधानमंत्री थीं और दूसरी तरफ विपक्ष के प्रमुख नेताओं में से एक। दोनों के बीच नीतियों और विचारधारा को लेकर गहरे मतभेद थे, लेकिन उस क्षण में राजनीतिक विरोध के बजाय व्यक्तिगत सम्मान और मानवीय संवेदना दिखाई दी।

इस तस्वीर की कहानी को वरिष्ठ भाजपा नेता और लेखक एस. शेषाद्रि चारी ने बाद में सार्वजनिक रूप से साझा किया था। एनडीटीवी के एक कार्यक्रम में चारी ने बताया था कि उन्होंने इस तस्वीर के बारे में स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी से पूछा था। अटल जी ने उन्हें इस घटना का संदर्भ बताते हुए कहा था कि शिमला समझौते को लेकर जनसंघ की अपनी आपत्तियां थीं, लेकिन इंदिरा गांधी ने उन्हें बातचीत के लिए बुलाया था।

चारी के अनुसार, बातचीत के दौरान जब बारिश शुरू हुई तो इंदिरा गांधी को छाता दिया गया और उन्होंने वह छाता वाजपेयी के ऊपर कर दिया। यही वह क्षण था, जिसे कैमरे ने हमेशा के लिए कैद कर लिया।

इस प्रसंग की खासियत सिर्फ यह नहीं है कि एक प्रधानमंत्री विपक्ष के नेता के ऊपर छाता थामे दिखाई दे रही हैं। असली महत्व उस राजनीतिक वातावरण का है जिसमें यह घटना हुई। उस दौर में सत्ता और विपक्ष के बीच राजनीतिक संघर्ष जरूर था, लेकिन व्यक्तिगत संवाद और संसदीय मर्यादा के लिए भी जगह थी।

अटल बिहारी वाजपेयी अपनी बेबाक वक्तृत्व शैली और सरकार की नीतियों की आलोचना के लिए जाने जाते थे। इंदिरा गांधी भी उनके राजनीतिक विरोध से अनजान नहीं थीं। बावजूद इसके दोनों के बीच बातचीत होती थी। यही लोकतांत्रिक राजनीति की खूबसूरती है—नीतियों का विरोध किया जा सकता है, लेकिन व्यक्ति का सम्मान बरकरार रखा जा सकता है।

आज जब राजनीतिक बहस कई बार व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंच जाती है, तब इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी की यह तस्वीर पुराने राजनीतिक दौर की याद दिलाती है। यह तस्वीर मानो कहती है कि लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन असहमति को दुश्मनी में बदलना जरूरी नहीं।

इस तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया पर समय-समय पर कई तरह के दावे भी सामने आते रहे हैं। इसलिए इसके साथ जुड़े प्रसंग को बताते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि घटना का विवरण मुख्य रूप से एस. शेषाद्रि चारी द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी से हुई बातचीत के हवाले से सामने आया है। तस्वीर की सटीक तारीख और स्थान का स्वतंत्र आधिकारिक फोटो-कैप्शन उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे 1972 के शिमला समझौते के बाद का प्रसंग बताते हुए प्रकाशित करना अधिक उपयुक्त है, बजाय किसी निश्चित दिन या स्थान का दावा करने के।

इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति की दो अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के प्रतिनिधि थे। दोनों ने एक-दूसरे की राजनीति का विरोध किया, लेकिन इस तस्वीर में नजर आने वाला छोटा-सा मानवीय क्षण राजनीतिक इतिहास की बड़ी सीख बन गया।

बारिश कुछ देर की थी, बातचीत भी शायद कुछ समय की रही होगी, लेकिन कैमरे में कैद वह दृश्य दशकों बाद भी लोगों को याद है।

क्योंकि राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, विचारों की लड़ाई हो सकती है, सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हो सकते हैं—लेकिन सम्मान और इंसानियत के लिए हमेशा जगह रहनी चाहिए।

इंदिरा गांधी के हाथ में थमा वह छाता इसलिए सिर्फ बारिश से बचाने वाला छाता नहीं रह गया। वह भारतीय लोकतंत्र के उस दौर की प्रतीकात्मक तस्वीर बन गया, जब राजनीतिक विरोध के बीच भी व्यक्तिगत सम्मान और संवाद की परंपरा दिखाई देती थी।

शायद यही इस तस्वीर का सबसे बड़ा संदेश है—विचार अलग हो सकते हैं, रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र में सम्मान की छतरी सबके लिए होनी चाहिए।

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