@विनोद भगत
भारत की संसद लोकतंत्र का वह सर्वोच्च मंच है, जहां सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, नीतियों पर बहस होती है, कानून बनाए जाते हैं और जनता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार को जवाब देना पड़ता है। लेकिन पिछले छह दशकों में भारतीय संसदीय राजनीति का एक दूसरा चेहरा भी लगातार सामने आया है। यह चेहरा है—नारेबाजी, आसन के सामने आकर विरोध, वेल में जाना, पोस्टर और तख्तियां दिखाना, कागज फाड़ना और अंततः सदन की कार्यवाही को बार-बार स्थगित करने की स्थिति पैदा करना। सवाल यह है कि भारत में सदन को हंगामे के कारण ठप करने की यह परंपरा आखिर कब शुरू हुई और यह धीरे-धीरे इतनी सामान्य कैसे हो गई?
भारत की पहली लोकसभा 1952 में अस्तित्व में आई थी। शुरुआती वर्षों में संसद में सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस जरूर होती थी, लेकिन सदन को लगातार बाधित करना सामान्य संसदीय संस्कृति का हिस्सा नहीं था। 1963 में संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के संबोधन के दौरान कुछ सांसदों द्वारा व्यवधान और बाद में वॉकआउट की घटना को संसद में व्यवधान के शुरुआती प्रमुख उदाहरणों में माना जाता है। इस घटना के बाद संबंधित सांसदों को सदन में फटकार भी लगाई गई थी।
1967 के आम चुनाव भारतीय राजनीति में बड़ा मोड़ लेकर आए। कांग्रेस के प्रभुत्व को पहली बार गंभीर चुनौती मिली और विपक्षी दल पहले की तुलना में अधिक मजबूत होकर सामने आए। केंद्र में कांग्रेस का बहुमत हालांकि बना रहा, लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ गई। इसके बाद संसद में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव भी बढ़ने लगा। विरोध प्रदर्शन अभी आज के स्तर तक नहीं पहुंचा था, लेकिन सदन के भीतर सामूहिक विरोध की राजनीति मजबूत होने लगी थी।
1970 और 1980 के दशक में भारतीय राजनीति अत्यंत उथल-पुथल भरी रही। आपातकाल, जनता पार्टी का सत्ता में आना, कांग्रेस की वापसी और फिर विभिन्न राजनीतिक विवादों ने संसद के भीतर सत्ता और विपक्ष के संघर्ष को और तीखा किया। इस दौर में विरोध केवल भाषण और मतदान तक सीमित नहीं रहा बल्कि सदन की कार्यवाही प्रभावित करने के तरीके भी दिखाई देने लगे।
1989 इस इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की जांच से संबंधित थक्कर आयोग की रिपोर्ट को लेकर लोकसभा में भारी हंगामा हुआ। स्थिति इतनी बिगड़ी कि 63 सांसदों को एक सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया गया। यह लोकसभा में एक साथ बड़ी संख्या में सांसदों के निलंबन की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी। इसी वर्ष रक्षा सेवाओं से संबंधित CAG रिपोर्ट को लेकर भी लोकसभा में जबरदस्त विरोध हुआ। एक सांसद ने सदन के भीतर लगा माइक्रोफोन तक हटा दिया था।
1989 की घटनाओं ने यह संकेत दे दिया था कि संसदीय विरोध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। विरोध अब केवल भाषण, वॉकआउट या मत विभाजन तक सीमित नहीं था। सदन के काम को रोकना भी राजनीतिक दबाव बनाने का तरीका बन चुका था।
1990 का दशक गठबंधन राजनीति का दौर था। केंद्र में किसी एक दल का पहले जैसा मजबूत प्रभुत्व नहीं था और क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ गई थी। इस दौर में नारेबाजी, सदन के बीच में आना और सामूहिक विरोध अधिक दिखाई देने लगा। 1998 में महिला आरक्षण विधेयक को लेकर लोकसभा में अभूतपूर्व हंगामा हुआ। कुछ सांसदों ने विधेयक की प्रतियां छीनकर फाड़ दीं। यह घटना संसद में विरोध के आक्रामक होते स्वरूप का एक चर्चित उदाहरण बन गई।
लगातार बढ़ते व्यवधान को देखते हुए संसद को अपने नियमों को भी कठोर करना पड़ा। 2001 में लोकसभा के नियमों में Rule 374A जोड़ा गया, जिसके तहत गंभीर व्यवधान पैदा करने वाले सदस्य को स्वतः निलंबित किया जा सकता है। लेकिन नियमों में बदलाव के बावजूद सदन के भीतर विरोध और व्यवधान का सिलसिला थमा नहीं।
2010 में 2G स्पेक्ट्रम आवंटन विवाद संसद में बड़े गतिरोध का कारण बना। विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC की मांग पर अड़ा रहा और संसद का शीतकालीन सत्र लगभग पूरी तरह इसी मुद्दे पर हुए विरोध की भेंट चढ़ गया। PRS के अनुसार उस वर्ष लोकसभा अपने निर्धारित समय का केवल लगभग 57 प्रतिशत ही काम कर सकी। इसी वर्ष महिला आरक्षण विधेयक को लेकर राज्यसभा में भी भारी हंगामा हुआ। विरोध के दौरान सात सांसदों को निलंबित किया गया और सदन को कई बार स्थगित करना पड़ा।
2011 में भ्रष्टाचार का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में था। 2G मामले के बाद विपक्ष सरकार पर लगातार हमलावर था और इसी बीच अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन देशव्यापी राजनीतिक दबाव में बदल गया। संसद के मानसून सत्र में भ्रष्टाचार, अन्ना हजारे की गिरफ्तारी और अन्य मुद्दों को लेकर कार्यवाही बाधित हुई। पूरे वर्ष में लोकसभा और राज्यसभा के कामकाज का महत्वपूर्ण हिस्सा व्यवधान की भेंट चढ़ गया।
2012 में कोयला ब्लॉक आवंटन, खुदरा क्षेत्र में FDI और पदोन्नति में आरक्षण जैसे मुद्दों पर संसद में जोरदार विरोध हुआ। इन मुद्दों पर भी कार्यवाही बार-बार बाधित हुई और संसद की उत्पादकता प्रभावित हुई। इस समय तक यह स्पष्ट हो चुका था कि सदन को बाधित करना अब किसी एक विशेष घटना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि विपक्षी राजनीति की नियमित रणनीति बनता जा रहा है।
2013 में संसद में विरोध का स्वरूप और तीखा हुआ। विभिन्न राजनीतिक मुद्दों के साथ तेलंगाना के प्रश्न ने भी सदन में भारी तनाव पैदा किया। अगस्त 2013 में 12 सांसदों को निलंबित किया गया। अगले वर्ष फरवरी 2014 में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक यानी तेलंगाना से संबंधित विधेयक के दौरान लोकसभा और राज्यसभा में जबरदस्त हंगामा हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ने 17 सांसदों को पांच बैठकों के लिए निलंबित किया। उस समय सत्र की शुरुआती छह बैठकों में लोकसभा का लगभग 95 प्रतिशत और राज्यसभा का लगभग 92 प्रतिशत समय व्यवधान में चला गया था।
2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। कांग्रेस विपक्ष में आ गई। लेकिन सदन में व्यवधान की राजनीति समाप्त नहीं हुई। बल्कि 2015 में यह एक बार फिर बड़े रूप में सामने आई। लगातार विरोध और नारेबाजी के बाद लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने 25 कांग्रेस सांसदों को पांच बैठकों के लिए निलंबित कर दिया।
यह घटना भारतीय राजनीति के उस पुराने चक्र को सामने लाती है जिसमें सत्ता बदलते ही संसद के भीतर भूमिका बदल जाती है। जो दल सत्ता में रहते हुए विपक्ष के हंगामे की आलोचना करता है, वही दल विपक्ष में आने के बाद कई बार सदन में विरोध और व्यवधान का सहारा लेता है। इसी तरह जो दल विपक्ष में रहते हुए सदन चलाने की मांग करता है, सत्ता में आने के बाद उसे भी सदन में होने वाले विरोध का सामना करना पड़ता है।
2018 तक संसद में व्यवधान इतना सामान्य हो चुका था कि इसे संसदीय राजनीति का एक स्थापित हिस्सा माना जाने लगा। PRS के अनुसार 16वीं लोकसभा के एक महत्वपूर्ण दौर में लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का लगभग 60 प्रतिशत और राज्यसभा ने लगभग 80 प्रतिशत समय खो दिया। विरोध के तरीके भी बदल गए थे। नारेबाजी और वेल में आने के साथ पोस्टर दिखाना, कागज के विमान उड़ाना और दस्तावेजों से छेड़छाड़ जैसी घटनाएं भी सामने आने लगीं।
2021 में पेगासस जासूसी विवाद और कृषि कानूनों सहित कई मुद्दों पर विपक्ष ने संसद में जोरदार विरोध किया। मानसून सत्र में लगातार व्यवधान हुआ और राज्यसभा के 12 विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया। इस समय तक संसद में व्यवधान की राजनीति छह दशकों की यात्रा पूरी कर चुकी थी और वह भारतीय संसदीय राजनीति का एक नियमित हिस्सा बन चुकी थी।
संसद में व्यवधान को केवल विपक्ष की गलती मानना भी पूरी तस्वीर नहीं है। इतिहास बताता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका इसमें रही है। जब कोई दल विपक्ष में होता है तो वह अक्सर यह तर्क देता है कि सरकार उसकी आवाज नहीं सुन रही, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं कर रही या विपक्ष को पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा। दूसरी तरफ सरकार आरोप लगाती है कि विपक्ष जानबूझकर संसद को चलने नहीं दे रहा।
2001 में संसदीय नेताओं की बैठक में भी संसद में व्यवधान के कारणों पर चर्चा हुई थी। इसमें विपक्ष को पर्याप्त समय नहीं मिलना, सरकार का महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचना, सत्ता पक्ष का आक्रामक रवैया और राजनीतिक दलों द्वारा अपने सदस्यों को नियंत्रित नहीं करना जैसे कारणों को भी सामने रखा गया था।
इसलिए संसद में विरोध और संसद को ठप करना दो अलग-अलग बातें हैं। लोकतंत्र में विपक्ष को सरकार की आलोचना करने, सवाल पूछने, चर्चा की मांग करने और असहमति दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब विरोध इस स्तर तक पहुंच जाए कि प्रश्नकाल न हो सके, विधेयकों पर चर्चा न हो, बजट पर पर्याप्त बहस न हो और सांसदों को अपनी बात रखने का अवसर ही न मिले, तब नुकसान केवल सरकार का नहीं बल्कि पूरी संसदीय व्यवस्था और जनता का होता है।
1963 में जिस तरह का व्यवधान एक असाधारण घटना माना गया था, वह धीरे-धीरे 1967 के बाद बढ़ा, 1980 और 1990 के दशक में अधिक आक्रामक हुआ और 2000 के बाद राजनीतिक दबाव बनाने की नियमित रणनीति बन गया। 1989 में 63 सांसदों का निलंबन, 1998 में महिला आरक्षण विधेयक पर हंगामा, 2010 में 2G गतिरोध, 2011 में भ्रष्टाचार और लोकपाल का मुद्दा, 2013–14 में बड़े पैमाने पर निलंबन, 2015 में 25 कांग्रेस सांसदों का निलंबन और 2018 तथा 2021 के बड़े व्यवधान इस लंबी यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
इस पूरे इतिहास से सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही निकलता है कि भारत में सदन को हंगामे के जरिए रोकने की परंपरा किसी एक राजनीतिक दल की देन नहीं है। यह धीरे-धीरे भारतीय राजनीति की ऐसी प्रवृत्ति बन गई है, जिसमें सत्ता बदलने के साथ भूमिकाएं बदल जाती हैं, लेकिन सदन में टकराव का तरीका अक्सर वही रहता है।
लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी संसद का चलना भी है। सरकार का काम केवल बहुमत के आधार पर कानून पारित करना नहीं है और विपक्ष का काम केवल विरोध करना भी नहीं है। संसद तभी मजबूत होगी जब सरकार जवाब देगी, विपक्ष सवाल पूछेगा, दोनों पक्ष बहस करेंगे और अंत में निर्णय संविधान तथा संसदीय प्रक्रिया के अनुसार होगा।
आखिर संसद जनता के पैसों से चलती है और सांसद जनता के प्रतिनिधि होते हैं। इसलिए संसद में हंगामा करके कुछ समय के लिए राजनीतिक संदेश भले ही दिया जा सकता है, लेकिन यदि बार-बार कार्यवाही स्थगित होती रहे तो सबसे बड़ा नुकसान उस आम नागरिक का होता है, जिसने अपने प्रतिनिधियों को सवाल पूछने, बहस करने और कानून बनाने के लिए संसद भेजा है। यही वजह है कि छह दशक पुराने इस इतिहास को केवल “विपक्ष संसद नहीं चलने देता” बनाम “सरकार विपक्ष की आवाज दबाती है” के राजनीतिक आरोपों तक सीमित करने के बजाय पूरे संसदीय इतिहास और दोनों पक्षों की जिम्मेदारी के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।
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