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वोट के लिए जागरूक, स्वच्छता में लापरवाह जनता,नगर निगम या सरकार की नहीं जनता की खुलती है पोल

@विनोद भगत

देश की जनता कितनी जागरूक है, इसका पैमाना सिर्फ चुनाव में मतदान प्रतिशत नहीं हो सकता। लोकतंत्र में जागरूक नागरिक होने का अर्थ केवल पांच साल में एक बार वोट डालना नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को समझना और उनका पालन करना भी है। लेकिन आज एक बड़ा सवाल हमारे सामने खड़ा है—क्या जनता ने खुद को केवल वोट देने का साधन बनाकर रख दिया है?

विडंबना देखिए कि जिन नेताओं के एक आह्वान पर हजारों-लाखों लोग मतदान के लिए जागरूक हो जाते हैं, उन्हीं नेताओं द्वारा बार-बार किए जाने वाले स्वच्छता के आह्वान को बड़ी संख्या में लोग गंभीरता से नहीं लेते। चुनाव के समय नेता कहते हैं—’घर से निकलकर मतदान जरूर करें’, तो जनता लोकतंत्र का उत्सव मनाने निकल पड़ती है। लेकिन वही जनता जब सार्वजनिक स्थान पर कूड़ा न फेंकने, सड़क पर गंदगी न फैलाने, नालियों को कूड़े से बंद न करने और जलभराव रोकने में अपनी भूमिका निभाने की बात आती है तो मामला अचानक ‘नगर निगम की जिम्मेदारी’ बन जाता है।

आखिर ऐसा क्यों?

बारिश के दिनों में जब सड़कें पानी से भर जाती हैं, नालियां चोक हो जाती हैं और जगह-जगह कूड़े के ढेर दिखाई देते हैं तो सबसे पहले सवाल नगर निगम और सरकार की कार्यप्रणाली पर उठता है। निश्चित रूप से सफाई व्यवस्था, नालियों की सफाई, कूड़ा उठाने और जल निकासी की व्यवस्था करना स्थानीय निकायों और प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। सरकार और नगर निकायों को इसके लिए जवाबदेह भी होना चाहिए।

जिस नाली में लोग प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन, खाने-पीने का कचरा और अन्य सामान फेंकते हैं, वही नाली बारिश में पानी के निकास का रास्ता रोक देती है। सड़क किनारे कूड़ा डालने की आदत धीरे-धीरे कूड़े के स्थायी ढेर में बदल जाती है। फिर बारिश आती है और वही कूड़ा नालियों तथा जल निकासी व्यवस्था में पहुंचकर जलभराव की समस्या को और गंभीर कर देता है।

इसके बाद तस्वीर सामने आती है—सड़क पर पानी, आसपास गंदगी और सोशल मीडिया पर वीडियो। कैप्शन लिखा जाता है—’नगर निगम की खुली पोल।’लेकिन क्या वास्तव में केवल नगर निगम की पोल खुली? कहीं न कहीं यह तस्वीर समाज की सामूहिक सोच की भी पोल खोलती है।

हम अक्सर सरकार से बेहतर सड़क, साफ शहर, व्यवस्थित बाजार, साफ नालियां और सुंदर पार्क चाहते हैं। यह हमारी जायज मांग है। नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मिलनी ही चाहिए। लेकिन बेहतर शहर केवल सरकारी मशीनरी से नहीं बनता। उसके लिए नागरिक अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है।

सरकार सफाईकर्मी तैनात कर सकती है, कूड़ा उठाने वाली गाड़ियां भेज सकती है, नालियां साफ करा सकती है और अभियान चला सकती है। लेकिन सरकार हर नागरिक के हाथ को नहीं रोक सकती कि वह सड़क पर कूड़ा न फेंके। हर घर के दरवाजे पर कर्मचारी खड़ा नहीं कर सकती कि कोई व्यक्ति नाली में प्लास्टिक न डाले। हर दुकान के बाहर निगरानी नहीं कर सकती कि दुकानदार अपना कचरा निर्धारित स्थान पर ही रखे।

यहीं से नागरिक जागरूकता की असली परीक्षा शुरू होती है।चुनाव में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता घर-घर पहुंचते हैं। नेता मंच से अपील करते हैं। सोशल मीडिया पर संदेश चलाए जाते हैं। समर्थक अपने-अपने नेताओं के पक्ष में लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करते हैं। कई बार एक वोट के लिए लोग घंटों लाइन में खड़े होते हैं और मतदान को अपना सबसे बड़ा लोकतांत्रिक कर्तव्य मानते हैं।

यह अच्छी बात है।लेकिन लोकतंत्र केवल वोट तक सीमित नहीं है।वोट लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, पूरा लोकतंत्र नहीं।

लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका चुनाव के बाद भी जारी रहती है। सड़क साफ रखना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, यातायात नियमों का पालन करना, कूड़ा निर्धारित स्थान पर डालना, पानी और बिजली की बचत करना, करों और कानूनों का पालन करना तथा स्थानीय समस्याओं के समाधान में सहयोग करना भी नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

सवाल यह है कि हम इन जिम्मेदारियों को उतनी गंभीरता से क्यों नहीं लेते जितनी गंभीरता से मतदान को लेते हैं?क्या इसलिए कि वोट का सीधा राजनीतिक प्रभाव दिखाई देता है और स्वच्छता का लाभ सामूहिक होता है?या इसलिए कि हम अधिकारों को व्यक्तिगत और जिम्मेदारियों को सरकारी विषय मानने लगे हैं?

यह सोच बदलने की जरूरत है। आज किसी शहर की सफाई खराब है तो नगर निगम से सवाल होना चाहिए। यदि कूड़ा समय पर नहीं उठ रहा है तो संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि नालियों की सफाई नहीं हुई है तो प्रशासन से जवाब मांगा जाना चाहिए। लेकिन उसी समय नागरिकों को भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी।

किसी शहर को साफ रखने के लिए केवल ‘स्वच्छता अभियान’ चलाना पर्याप्त नहीं है। स्वच्छता को आदत बनाना होगा।

हमारे सामने अक्सर एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। हम चाहते हैं कि हमारा घर साफ रहे, लेकिन घर के बाहर की सड़क को अपना नहीं मानते। हम अपने घर के सामने कूड़ा नहीं चाहते, लेकिन वही कूड़ा कुछ कदम दूर किसी सार्वजनिक स्थान पर डालने में संकोच नहीं करते। हम चाहते हैं कि बारिश का पानी सड़क पर जमा न हो, लेकिन नाली में कूड़ा डालते समय यह नहीं सोचते कि इसका परिणाम क्या होगा।

यह मानसिकता बदलनी होगी। जनता को केवल ‘वोट बैंक’ या ‘वोटर’ के रूप में देखना लोकतंत्र की सीमित समझ है। नागरिक किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन नागरिक की ताकत तभी सार्थक है जब वह चुनाव के समय अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के साथ-साथ रोजमर्रा के जीवन में भी अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को निभाए।

नेताओं की भी जिम्मेदारी है कि वे जनता को केवल चुनाव के समय जागरूक न करें। यदि नेता वास्तव में समाज को बदलना चाहते हैं तो उन्हें स्वच्छता, पर्यावरण, यातायात अनुशासन, जल संरक्षण और नागरिक कर्तव्यों के लिए भी उसी ताकत से अभियान चलाने होंगे, जिस ताकत से वे चुनावी समर्थन जुटाते हैं।

और जनता को भी यह समझना होगा कि नेता का आह्वान केवल वोट डालने के लिए नहीं होता। यदि किसी नेता की अपील पर हम वोट देने निकल सकते हैं तो उसी नेता की अपील पर अपने मोहल्ले को साफ रखने के लिए भी आगे आ सकते हैं।

आखिर सवाल केवल यह नहीं है कि सरकार हमारे लिए क्या कर रही है। सवाल यह भी है कि हम अपने शहर और समाज के लिए क्या कर रहे हैं?

किसी सड़क पर जलभराव देखकर केवल यह कहना आसान है कि ‘सरकार फेल हो गई’। लेकिन उससे पहले यह देखना भी जरूरी है कि उस सड़क की नाली में कूड़ा किसने डाला? सार्वजनिक स्थान पर गंदगी किसने फैलाई? नियमों की अनदेखी किसने की? और क्या हमने कभी अपने आसपास के लोगों को ऐसा करने से रोकने की कोशिश की?

सरकार और नगर निगम की जवाबदेही तय होनी चाहिए, लेकिन जनता की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं होता।वह व्यवस्था का सहभागी होता है।

यदि जनता केवल चुनाव के समय सक्रिय होगी और बाकी पांच साल अपनी नागरिक जिम्मेदारियों से दूर रहेगी तो लोकतंत्र अधूरा रहेगा। नेताओं को जवाबदेह बनाने के साथ-साथ नागरिकों को भी आत्ममंथन करना होगा।

हमें यह तय करना होगा कि हम सिर्फ वोट देने वाली जनता बनना चाहते हैं या अपने शहर, अपने समाज और अपने देश को बेहतर बनाने वाली जिम्मेदार नागरिक शक्ति।

क्योंकि जिस दिन जनता यह समझ जाएगी कि ‘मेरे शहर की सफाई सिर्फ नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं, मेरी भी जिम्मेदारी है’, उसी दिन स्वच्छता अभियान किसी सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा भर नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक आदत बन जाएगा।

और शायद तब किसी बारिश के बाद सड़क पर भरे पानी की तस्वीर देखकर हमें केवल नगर निगम की ‘पोल’ दिखाई नहीं देगी—हम उसमें अपनी जिम्मेदारी का चेहरा भी देख पाएंगे।

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