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प्रसंगवश :भारत में आजादी के बाद हुये जनआंदोलनों में नेताओं के खिलाफ कब से शुरू हुआ गाली गलौज का प्रचलन ?

@विनोद भगत

भारत को आजादी मिले करीब आठ दशक हो चुके हैं और इस दौरान देश ने अपनी समस्याओं तथा सरकारों की नीतियों के विरोध में सैकड़ों छोटे-बड़े आंदोलनों को देखा है। इनमें छात्र आंदोलनों से लेकर किसान, मजदूर, महिला, आदिवासी, भाषा, क्षेत्रीय पहचान, रोजगार, शिक्षा, भ्रष्टाचार, महंगाई, आरक्षण और भूमि-अधिकार से जुड़े आंदोलन शामिल हैं। हालांकि आजादी के बाद से अब तक देश में कुल कितने आंदोलन हुए, इसका कोई आधिकारिक और सर्वमान्य आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसी तरह आंदोलनों के दौरान देश के प्रधानमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों या अन्य जनप्रतिनिधियों को कितनी बार गाली-गलौज की गई, इसका भी कोई प्रमाणित राष्ट्रीय आंकड़ा मौजूद नहीं है। इसलिए इस सवाल का जवाब प्रमुख आंदोलनों और उनके स्वरूप के ऐतिहासिक अध्ययन के आधार पर ही समझा जा सकता है।

स्वतंत्र भारत में शुरुआती दशकों से ही जनता ने अपनी मांगों को लेकर सरकारों के खिलाफ आवाज उठाई। भाषा को लेकर दक्षिण भारत में हुए आंदोलन, राज्यों के पुनर्गठन से जुड़े संघर्ष, मजदूरों और किसानों के आंदोलन तथा विभिन्न क्षेत्रों में जनहित के मुद्दों पर हुए विरोध प्रदर्शन इसके उदाहरण हैं। 1965 का तमिलनाडु का हिंदी विरोधी आंदोलन छात्र राजनीति के बड़े आंदोलनों में शामिल रहा। इसके बाद 1970 के दशक में गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन और बिहार का छात्र आंदोलन सामने आया। महंगाई, भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था के खिलाफ शुरू हुए इन आंदोलनों ने आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया।

1974 का जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाला आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े राजनीतिक जनआंदोलनों में गिना जाता है। बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ व्यापक आंदोलन में बदल गया। जयप्रकाश नारायण ने इसे ‘संपूर्ण क्रांति’ का स्वरूप दिया और आंदोलन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। 1975 में आपातकाल लागू होने से पहले और उसके बाद का राजनीतिक घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का बेहद महत्वपूर्ण अध्याय है। इस दौर में प्रधानमंत्री और सरकार के खिलाफ बेहद तीखा राजनीतिक विरोध हुआ, लेकिन उस समय आज की तरह सोशल मीडिया और मोबाइल कैमरों का दौर नहीं था। इसलिए नेताओं के खिलाफ कही गई हर आपत्तिजनक बात का कोई डिजिटल रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है।

1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन भी छात्र शक्ति के बड़े उदाहरणों में शामिल है। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के नेतृत्व में चले इस आंदोलन का प्रमुख मुद्दा अवैध प्रवासियों की पहचान और मतदाता सूची से जुड़ा था। लंबे संघर्ष के बाद 1985 में असम समझौता हुआ। इसी तरह 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद देश के कई हिस्सों में छात्रों और युवाओं ने बड़े पैमाने पर विरोध किया। यह आंदोलन इतना उग्र हुआ कि आत्मदाह जैसी घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। इन आंदोलनों से स्पष्ट है कि स्वतंत्र भारत में युवाओं ने सरकारों की नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरने में कभी संकोच नहीं किया।

इसके बाद नर्मदा बचाओ आंदोलन, विभिन्न किसान आंदोलनों, मजदूर आंदोलनों, पर्यावरण आंदोलनों और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए संघर्षों ने भी सरकारों के सामने गंभीर सवाल खड़े किए। इन आंदोलनों में कई बार सरकार की नीतियों की बेहद कठोर आलोचना हुई, लेकिन सरकार की आलोचना और व्यक्तिगत गाली-गलौज को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।

2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने आंदोलन की राजनीति को एक नया स्वरूप दिया। जन लोकपाल की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर और बाद में रामलीला मैदान में बड़ी संख्या में युवा और आम नागरिक जुटे। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि पहली बार सोशल मीडिया और 24 घंटे चलने वाले समाचार चैनलों ने किसी बड़े जनआंदोलन को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके एक वर्ष बाद 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड के विरोध में देशभर के युवाओं ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा और कठोर कानून की मांग था और इसे किसी एक राजनीतिक दल या प्रधानमंत्री के खिलाफ आंदोलन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

2020-21 का किसान आंदोलन भी स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे और चर्चित आंदोलनों में शामिल रहा। तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लंबे समय तक धरना दिया। सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी भी हुई और अंततः केंद्र सरकार ने नवंबर 2021 में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। 2022 में अग्निपथ सैन्य भर्ती योजना के खिलाफ भी देश के विभिन्न हिस्सों में युवाओं ने प्रदर्शन किया। कई स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक हुए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं।

हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, सरकारी भर्तियों में देरी, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर युवाओं के प्रदर्शन लगातार दिखाई दिए हैं। इन आंदोलनों की एक खास बात यह है कि अब किसी आंदोलन को केवल सड़क पर मौजूद लोगों की संख्या से नहीं मापा जाता। सोशल मीडिया के कारण किसी प्रदर्शन का एक वीडियो, नारा या भाषण कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है।

यहीं से प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ गाली-गलौज के सवाल को समझना जरूरी हो जाता है। यह कहना तथ्यात्मक रूप से संभव नहीं है कि अमुक वर्ष से नेताओं को गाली देने की शुरुआत हुई। राजनीतिक विरोध में तीखी भाषा और व्यक्तिगत टिप्पणियां भारत में कई दशकों से मौजूद रही हैं। हालांकि 2010 के बाद सोशल मीडिया के विस्तार ने इस प्रवृत्ति को अभूतपूर्व दृश्यता जरूर दी है। फेसबुक, ट्विटर यानी एक्स, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे माध्यमों ने प्रत्येक व्यक्ति को अपनी राजनीतिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक करने का मंच दे दिया। किसी सभा में हजारों लोगों के बीच लगाया गया आपत्तिजनक नारा पहले शायद स्थानीय स्तर तक सीमित रहता था, लेकिन आज वही वीडियो कुछ मिनटों में देशभर में वायरल हो सकता है।

इसलिए आज ऐसा महसूस होना कि नेताओं के खिलाफ गाली-गलौज पहले की तुलना में बहुत अधिक हो गई है, केवल वास्तविक बदलाव का परिणाम नहीं है, बल्कि संचार माध्यमों में आए बदलाव का भी परिणाम है। पहले आंदोलनों की रिपोर्ट अखबार, रेडियो और सीमित संख्या में टेलीविजन चैनलों के माध्यम से सामने आती थी। आज हर प्रदर्शनकारी के हाथ में कैमरा है और हर नारे के वायरल होने की संभावना रहती है।

यहां यह अंतर समझना भी बेहद जरूरी है कि सरकार की कठोर आलोचना, प्रधानमंत्री या मंत्री के इस्तीफे की मांग, सरकार की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी और व्यक्तिगत गाली-गलौज एक जैसी चीजें नहीं हैं। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों को गलत बताना और उसके खिलाफ आंदोलन करना जनता का महत्वपूर्ण अधिकार है। लेकिन किसी व्यक्ति के परिवार, निजी जीवन या व्यक्तिगत पहचान को निशाना बनाकर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक आलोचना से अलग श्रेणी में आता है।

भारत के इतिहास को देखने पर यह भी साफ होता है कि पहले के सभी आंदोलन शांतिपूर्ण और आज के सभी आंदोलन अभद्र नहीं रहे हैं। आजादी के बाद कई आंदोलनों में हिंसा हुई, पुलिस कार्रवाई हुई, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा, आत्मदाह जैसी घटनाएं हुईं और लंबे समय तक सड़कें जाम रहीं। दूसरी ओर आज भी बड़ी संख्या में ऐसे आंदोलन होते हैं जिनमें लोग शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग रखते हैं और सरकार से संवाद की मांग करते हैं।

इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, उनसे पहले मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, पी.वी. नरसिम्हा राव, राजीव गांधी, इंदिरा गांधी या कोई अन्य प्रधानमंत्री रहा हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके फैसलों की आलोचना का अधिकार जनता के पास हमेशा रहा है। इसी तरह केंद्रीय मंत्रियों से भी सवाल पूछे जा सकते हैं और उनके इस्तीफे की मांग की जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं है कि विरोध कितना अपमानजनक है, बल्कि इस बात में है कि विरोध में उठाए गए सवाल कितने तथ्यपूर्ण, तार्किक और जनहित से जुड़े हैं।

आज के दौर में राजनीतिक दलों, सरकारों और आंदोलनों से जुड़े लोगों के लिए यह चुनौती और बड़ी हो गई है। सोशल मीडिया ने आवाज को ताकत दी है, लेकिन इसी माध्यम ने भाषा की मर्यादा को भी चुनौती दी है। राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलना किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता।

आजादी के बाद भारत में हुए आंदोलनों का इतिहास यह बताता है कि जनता ने जब भी अपनी समस्याओं को लेकर मजबूती से आवाज उठाई है, सरकारों को उसका जवाब देना पड़ा है। कई आंदोलनों ने कानून बदले, कई ने सरकारी फैसले बदले और कई आंदोलनों ने देश की राजनीति की दिशा तक बदल दी। इसलिए आंदोलन लोकतंत्र की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत हैं। जरूरत केवल इतनी है कि आंदोलन का मुद्दा केंद्र में रहे और व्यक्ति नहीं। प्रधानमंत्री हो या कोई केंद्रीय मंत्री, उससे सवाल पूछे जाएं, उसकी नीतियों की आलोचना की जाए और जरूरत पड़ने पर उसके इस्तीफे की मांग भी की जाए, लेकिन गाली और व्यक्तिगत अपमान को लोकतांत्रिक अधिकार का पर्याय नहीं बनाया जाना चाहिए।

आखिरकार भारत के करीब आठ दशक के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि सत्ता से सवाल करना लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन सवाल की असली शक्ति गाली में नहीं, बल्कि तथ्य, तर्क और जनहित में होती है।

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