@विनोद भगत
हल्द्वानी में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का बसों को रोके जाने के विरोध में जोरदार प्रदर्शन चर्चा का विषय बन गया है। विरोध प्रदर्शन की आक्रामकता ने कांग्रेस की पांच साल की राजनीतिक भूमिका और जनसमस्याओं को लेकर उसके आंदोलनों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की जनसभा को लेकर बेहद मुखर नजर आई। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि जिस धार के साथ कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की सभा से जुड़े मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन किया, क्या वही धार पिछले पांच वर्षों में प्रदेश की ज्वलंत जनसमस्याओं को लेकर दिखाई दी?
आम जनता के बीच चर्चा है कि लोकतंत्र में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत जनता होती है। ऐसे में विपक्षी दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होता है कि वह लगातार जनता के मुद्दों को उठाए और उनके बीच अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराए। कांग्रेस के सामने पिछले पांच वर्षों में ऐसे कई अवसर आए, जब वह जनसमस्याओं को लेकर व्यापक आंदोलन खड़ा कर सकती थी। लेकिन अधिकांश मामलों में उसका विरोध प्रदर्शन सांकेतिक प्रदर्शन और पुतला दहन तक सीमित दिखाई दिया।
काशीपुर का फ्लाईओवर बना बड़ा उदाहरण
काशीपुर की बात करें तो शहर में फ्लाईओवर निर्माण लंबे समय से आम जनता के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। रामनगर रोड पर निर्माणाधीन फ्लाईओवर और निर्माण की खामियों को लेकर शहरवासियों में लगातार नाराजगी रही है। इसे भाजपा सरकार की बड़ी नाकामियों में गिनाया जाता रहा है।
कांग्रेस के स्थानीय और प्रदेश स्तर के नेताओं ने समय-समय पर इस मुद्दे को उठाया जरूर, लेकिन विरोध का वह व्यापक स्वरूप दिखाई नहीं दिया, जिसकी उम्मीद आम जनता विपक्षी दल से करती है। सवाल यही है कि यदि कांग्रेस इस मुद्दे को लगातार और व्यापक जनआंदोलन का रूप देती तो क्या वह शहर की जनता के साथ मजबूत राजनीतिक जुड़ाव स्थापित कर सकती थी?
प्रदेश में कई बड़े मुद्दे, लेकिन विरोध की धार रही कमजोर
उत्तराखंड की राजनीति में पिछले पांच वर्षों के दौरान अंकिता भंडारी हत्याकांड, भर्ती एवं पेपर लीक जैसे मामले विपक्ष के लिए बड़े राजनीतिक मुद्दे रहे। केदारनाथ मंदिर से जुड़े चंदे के विवाद जैसे मामलों ने भी सरकार को घेरने का अवसर विपक्ष को दिया।
इन मुद्दों पर कांग्रेस ने प्रदर्शन और राजनीतिक विरोध जरूर किया, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह विरोध उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया, जिससे प्रदेशभर में कोई बड़ा जनआंदोलन खड़ा हो सके।
राहुल गांधी की अल्मोड़ा जनसभा रद्द होने के मामले को भी कांग्रेस के पास सरकार को घेरने का एक अवसर माना गया, लेकिन यह मुद्दा भी लंबे समय तक व्यापक राजनीतिक अभियान का रूप नहीं ले सका।
खड़गे की सभा से पहले दिखी आक्रामकता ने बढ़ाई चर्चा
अब हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा से पहले बसों को रोके जाने के विरोध में कांग्रेस नेताओं के आक्रामक प्रदर्शन ने राजनीतिक बहस को फिर हवा दे दी है। सवाल यह उठ रहा है कि राष्ट्रीय नेतृत्व से जुड़े कार्यक्रम को लेकर जिस तरह कांग्रेस एकजुट और आक्रामक दिखाई दी, अगर ऐसी ही सक्रियता लगातार जनसमस्याओं को लेकर दिखाई जाती तो शायद प्रदेश की जनता के बीच पार्टी की राजनीतिक पकड़ और मजबूत होती।
विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह केवल सरकार विरोधी बयानबाजी और सांकेतिक प्रदर्शनों से आगे बढ़कर आम जनता के मुद्दों को सड़क पर कितनी मजबूती से उठाती है।
क्या कांग्रेस अब अपने विरोध प्रदर्शन की धार तेज कर जनता के बीच अपनी खोई राजनीतिक जमीन मजबूत कर पाएगी? या फिर चुनाव से पहले भी उसका विरोध प्रदर्शन केवल सांकेतिक राजनीति तक सीमित रहेगा—यह आने वाला समय बताएगा।
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