@विनोद भगत
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के दस वर्षों (2004–2014) के दौरान कई बड़े घोटाले राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बने। इनमें दूरसंचार, खेल, कोयला आवंटन, रेल भर्ती और अन्य मामलों ने संसद से लेकर अदालत तक हलचल मचाई। हालांकि इन मामलों में सभी आरोप अंततः अदालत में सिद्ध नहीं हुए। कई मंत्रियों ने नैतिक और राजनीतिक दबाव में इस्तीफा दिया, कुछ को जेल भी जाना पड़ा, जबकि कई मामलों में अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपियों को बरी कर दिया। ऐसे में इन मामलों को आरोप, मुकदमे और अंतिम न्यायिक फैसलों के आधार पर अलग-अलग समझना जरूरी है।
यूपीए सरकार के सबसे चर्चित मामलों में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामला था। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा पर मनमाने तरीके से स्पेक्ट्रम आवंटित करने के आरोप लगे। भारी राजनीतिक दबाव के बाद उन्होंने नवंबर 2010 में इस्तीफा दिया और बाद में गिरफ्तार भी हुए। लेकिन दिसंबर 2017 में विशेष सीबीआई अदालत ने ए. राजा, कनिमोझी और अन्य सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा। इसलिए इस मामले में किसी मंत्री को दोषी नहीं ठहराया गया और न ही किसी को सजा हुई।
राष्ट्रमंडल खेल (कॉमनवेल्थ गेम्स) 2010 में भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी देश का ध्यान खींचा। हालांकि आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाड़ी कांग्रेस सांसद थे, लेकिन केंद्रीय मंत्री नहीं थे। उन्हें गिरफ्तार किया गया, परंतु अधिकांश मामलों में बाद में उन्हें राहत मिली। इस प्रकरण में किसी केंद्रीय मंत्री को अदालत ने दोषी ठहराकर सजा नहीं दी।
आदर्श हाउसिंग सोसायटी मामले में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को पद छोड़ना पड़ा। हालांकि वह उस समय केंद्र सरकार के मंत्री नहीं थे। बाद में जांच चली, लेकिन लंबे समय तक चले कानूनी घटनाक्रम के बावजूद उन्हें किसी आपराधिक मामले में दोषी ठहराकर सजा नहीं हुई।
कोयला ब्लॉक आवंटन (कोलगेट) मामला भी यूपीए सरकार के सबसे बड़े विवादों में शामिल रहा। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कुछ समय के लिए कोयला मंत्रालय भी संभाल रहे थे, लेकिन उनके खिलाफ कोई आपराधिक आरोप तय नहीं हुए। इस मामले में कई उद्योगपतियों और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई तथा कुछ मामलों में दोषसिद्धि भी हुई, लेकिन किसी केंद्रीय मंत्री को अदालत ने दोषी ठहराकर सजा नहीं सुनाई।
रेलवे भर्ती और पदोन्नति से जुड़े कथित रिश्वत कांड में तत्कालीन रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने मई 2013 में इस्तीफा दिया। यह मामला उनके भांजे से जुड़ा था। राजनीतिक दबाव के चलते इस्तीफा लिया गया, लेकिन बंसल स्वयं किसी आपराधिक मामले में दोषी सिद्ध नहीं हुए और उन्हें अदालत से सजा नहीं मिली।
कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने सीबीआई की कोयला जांच रिपोर्ट में कथित हस्तक्षेप के विवाद के बाद 2013 में इस्तीफा दिया। यह राजनीतिक जवाबदेही का मामला था। उनके खिलाफ कोई ऐसा न्यायिक फैसला नहीं आया जिसमें उन्हें दोषी ठहराकर सजा दी गई हो।
इसी प्रकार दयानिधि मारन ने एयरसेल-मैक्सिस मामले में आरोप लगने के बाद केंद्रीय मंत्री पद छोड़ा। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने जांच की, लेकिन बाद में विशेष अदालत ने उन्हें राहत दी और वे दोषी सिद्ध नहीं हुए।
यदि केवल उन केंद्रीय मंत्रियों की बात की जाए जिन्हें अदालत ने दोषी ठहराकर सजा सुनाई, तो यूपीए काल के चर्चित घोटालों में ऐसा उदाहरण लगभग नहीं मिलता। अधिकांश मामलों में या तो मुकदमे लंबी अवधि तक चले, या आरोपी बरी हो गए, या मुकदमे अभी भी विभिन्न स्तरों पर लंबित रहे।
हालांकि यूपीए सरकार के दौरान एक केंद्रीय मंत्री ऐसे रहे जिन्हें भ्रष्टाचार के मामले में अदालत ने दोषी ठहराकर सजा सुनाई। पूर्व केंद्रीय कोयला राज्य मंत्री दिलीप राय को झारखंड के ब्रह्माडीहा कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने वर्ष 2020 में दोषी ठहराया और तीन वर्ष की सजा सुनाई। यह आवंटन 1999 का था, जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार सत्ता में थी और दिलीप राय उस सरकार में मंत्री थे। इसलिए उनकी दोषसिद्धि यूपीए सरकार के दौरान हुए किसी घोटाले से संबंधित नहीं थी।
यूपीए सरकार के दौरान कई बड़े घोटालों के आरोपों के कारण ए. राजा, पवन कुमार बंसल, अश्विनी कुमार और दयानिधि मारन जैसे मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन इन चर्चित मामलों में अदालतों ने अधिकांश आरोपियों को या तो बरी कर दिया या उनके खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं हो सके। इसलिए राजनीतिक आरोप और न्यायिक दोषसिद्धि के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है। भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जाता, जब तक अदालत आरोपों को संदेह से परे सिद्ध न कर दे।
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