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क्या ओटीटी और आज का मनोरंजन पुराने दौर के टीवी धारावाहिकों की आत्मा खो चुका है?युवाओं को क्या दिखा रहे हैं? उसका परिणाम क्या हो रहा?

@विनोद भगत

एक समय था जब टेलीविजन केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि पूरे परिवार को एक साथ बैठकर जोड़ने वाला माध्यम हुआ करता था। शाम होते ही घरों में एक ही स्क्रीन के सामने तीन पीढ़ियाँ एकत्र होती थीं। हम लोग, बुनियाद, नुक्कड़, करमचंद, व्योमकेश बख्शी, रामायण, महाभारत, भारत एक खोज और मालगुड़ी डेज़ जैसे धारावाहिक केवल कहानियाँ नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति, नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों के जीवंत दस्तावेज़ थे।

आज तकनीक ने मनोरंजन को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म और सैकड़ों टीवी चैनलों ने दर्शकों को विकल्पों की भरमार दी है। लेकिन एक बड़ा प्रश्न भी खड़ा हुआ है—क्या इस असीम स्वतंत्रता ने मनोरंजन की गुणवत्ता और सामाजिक जिम्मेदारी को पीछे छोड़ दिया है?

आज के अनेक वेब सीरीज़ और धारावाहिकों में हिंसा, गाली-गलौज, यौन सामग्री, सनसनी और उग्रता को अक्सर कहानी का प्रमुख आकर्षण बना दिया जाता है। ऐसा नहीं कि हर ओटीटी सामग्री ऐसी ही हो, लेकिन यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए विवाद, उत्तेजना और चौंकाने वाले दृश्य सबसे आसान रास्ता बन गए हैं।

सबसे अधिक चिंता तब होती है जब इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय व्यक्तित्वों को लेकर रचनात्मक स्वतंत्रता और तथ्यात्मक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कमजोर पड़ता दिखाई देता है। कई बार ऐतिहासिक घटनाओं या पात्रों को ऐसे रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे बहस और विवाद तो पैदा होते हैं, लेकिन दर्शकों के मन में भ्रम भी उत्पन्न हो सकता है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी, जो इतिहास को पुस्तकों से कम और दृश्य माध्यमों से अधिक समझने लगी है, उसके लिए यह चुनौती और गंभीर हो जाती है।

पुराने धारावाहिकों की सबसे बड़ी ताकत उनकी संवेदनशीलता थी। हम लोग मध्यमवर्गीय परिवार के संघर्षों की कहानी थी। बुनियाद ने विभाजन की त्रासदी को मानवीय दृष्टि से दिखाया। नुक्कड़ ने आम आदमी के जीवन को सम्मान दिया। व्योमकेश बख्शी और करमचंद ने रहस्य और रोमांच को बिना अनावश्यक हिंसा या अश्लीलता के भी लोकप्रिय बनाया। इन कार्यक्रमों ने यह सिद्ध किया था कि अच्छी कहानी, सशक्त अभिनय और सामाजिक सरोकार ही किसी रचना को कालजयी बनाते हैं।

इसके विपरीत आज कई बार यह शिकायत सुनने को मिलती है कि मनोरंजन उद्योग में ‘क्या बिकेगा’ यह प्रश्न ‘क्या सही है’ से बड़ा हो गया है। दर्शकों की उत्सुकता को बनाए रखने के लिए लगातार अधिक हिंसक, अधिक उत्तेजक और अधिक विवादास्पद सामग्री पर जोर दिया जाता है।

लेकिन क्या इसका दोष केवल फिल्मकारों या ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म का है? शायद नहीं।

दोष का एक हिस्सा दर्शकों की बदलती पसंद से भी जुड़ा हो सकता है। जिस प्रकार की सामग्री अधिक देखी जाती है, उसी प्रकार की सामग्री का निर्माण भी बढ़ता है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के एल्गोरिद्म भी वही सामग्री आगे बढ़ाते हैं, जिसे अधिक क्लिक और अधिक समय तक देखा जाता है। ऐसे में बाज़ार, निर्माता और दर्शक—तीनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

दूसरी संभावना यह भी है कि आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के बीच सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन कमजोर हुआ है। पहले दूरदर्शन जैसे सीमित मंचों पर सामग्री के चयन में सांस्कृतिक और सामाजिक पक्षों पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया जाता था। आज प्रतिस्पर्धा कहीं अधिक तीव्र है, और वैश्विक दर्शकों तक पहुँचने की दौड़ ने प्रस्तुति की शैली भी बदल दी है।

यह भी सच है कि ओटीटी पर कई उत्कृष्ट और विचारोत्तेजक रचनाएँ भी बनी हैं, जो समाज, विज्ञान, अपराध, राजनीति और मानवीय संवेदनाओं को गंभीरता से प्रस्तुत करती हैं। इसलिए पूरे ओटीटी जगत को एक ही तराजू में तौलना उचित नहीं होगा। प्रश्न किसी एक माध्यम का नहीं, बल्कि उस दिशा का है, जिसमें मनोरंजन उद्योग आगे बढ़ रहा है।

समाज का दर्पण कहे जाने वाले सिनेमा और धारावाहिक केवल मनोरंजन नहीं करते, वे सोच भी गढ़ते हैं। यदि किसी समाज का लोकप्रिय मनोरंजन लगातार हिंसा, घृणा, अश्लीलता और सनसनी को सामान्य बना दे, तो उसका प्रभाव सामाजिक व्यवहार और संवाद पर भी पड़ सकता है। वहीं यदि मनोरंजन प्रेरणा, संवेदना, परिवार, संघर्ष, ईमानदारी और सकारात्मक मूल्यों को स्थान दे, तो उसका प्रभाव भी उतना ही गहरा हो सकता है।

आज आवश्यकता किसी सेंसरशिप की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। निर्माता यह सोचें कि लोकप्रियता और जिम्मेदारी साथ-साथ कैसे चल सकती हैं। दर्शक यह तय करें कि वे किस प्रकार की सामग्री को अपना समय और समर्थन देना चाहते हैं। अभिभावक भी यह समझें कि डिजिटल युग में बच्चों और किशोरों के मनोरंजन पर संवाद पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।

शायद यही समय है जब हम स्वयं से पूछें—क्या हम केवल मनोरंजन चाहते हैं, या ऐसा मनोरंजन भी चाहते हैं जो आने वाली पीढ़ियों को सोचने, सीखने और बेहतर समाज बनाने की प्रेरणा दे? आमतौर पर हम सीधे सीधे युवाओं को दिग्भ्रमित होने का आरोप मढ़ देते हैं। पर खुद यह नहीं सोचते कि हम उसे क्या दिखा रहे हैं क्या सिखा रहे हैं।

यदि इस प्रश्न का उत्तर समाज ईमानदारी से खोज ले, तो संभव है कि भविष्य का मनोरंजन फिर उसी दिशा में लौटे, जहाँ कहानी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कार और विचार का माध्यम भी हुआ करती थी।

इस लेख में व्यक्त कुछ निष्कर्ष और आशंकाएँ विश्लेषण के रूप में प्रस्तुत हैं, न कि स्थापित तथ्य के रूप में।

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