@विनोद भगत
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में गोलू देवता, जिन्हें गोल्ज्यू, ग्वेल या ग्वाल देवता के नाम से भी जाना जाता है, विशेष स्थान रखते हैं। खासकर कुमाऊं अंचल में उन्हें न्याय, सत्य और जनविश्वास के देवता के रूप में पूजा जाता है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि उनके दरबार में कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर जा सकता है और न्याय की गुहार लगा सकता है। इसी विश्वास के कारण गोलू देवता के मंदिरों में पूजा-पाठ के साथ-साथ लिखित प्रार्थना-पत्र और हजारों घंटियां दिखाई देती हैं। अल्मोड़ा जिला प्रशासन भी चितई गोलू मंदिर को न्याय के देवता से जुड़ा प्रमुख धार्मिक स्थल बताते हुए इस परंपरा का उल्लेख करता है।
लेकिन गोलू देवता की कहानी केवल एक मंदिर या धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है। उनके बारे में उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में कई लोककथाएं और परंपराएं प्रचलित हैं, इसलिए उनकी उत्पत्ति और जीवन की कथा का एक ही सर्वमान्य ऐतिहासिक संस्करण नहीं मिलता। कहीं उन्हें कत्यूरी राजकुमार गोरिल या ग्वेल के रूप में याद किया जाता है तो कहीं उन्हें भगवान शिव के गौर भैरव स्वरूप से जोड़ा जाता है। चंपावत जिला प्रशासन की वेबसाइट भी ग्वाल देवता को गोरिल या ग्वेल नाम से संबोधित करती है और उन्हें न्याय का परंपरागत देवता बताती है।
कुमाऊं में गोलू देवता को स्थानीय लोकदेवता के रूप में अत्यंत श्रद्धा से पूजा जाता है। उनके प्रमुख मंदिर अल्मोड़ा के चितई और गैराड़, नैनीताल जिले के घोड़ाखाल तथा चंपावत क्षेत्र में हैं। अल्मोड़ा जिला प्रशासन के अनुसार गोलू देवता को कई स्थानों पर भगवान शिव के गौर भैरव स्वरूप का अवतार माना जाता है। अनेक कुमाऊंनी परिवार उन्हें इष्ट अथवा कुल देवता के रूप में भी पूजते हैं।
गोलू देवता की पहचान अक्सर सफेद घोड़े, सफेद पगड़ी और सफेद वस्त्र से की जाती है। लोकविश्वास में उनका स्वरूप एक ऐसे शासक अथवा देवता का है जो अन्याय से पीड़ित व्यक्ति की बात सुनता है और सत्य का साथ देता है।
गोलू देवता की कथा के कई रूप मिलते हैं। उनमें सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में से एक उन्हें कत्यूरी वंश के राजकुमार गोरिल/ग्वेल से जोड़ती है।
लोककथा के अनुसार गोरिल न्यायप्रिय और साहसी राजकुमार थे। उनकी सौतेली मां उनसे ईर्ष्या करती थी। कथा के एक रूप में बताया जाता है कि षड्यंत्र के तहत उन्हें लोहे के पिंजरे में बंद करके नदी में फेंक दिया गया। इसके बावजूद वे बच गए और बाद में अपनी योग्यता और न्यायप्रियता के कारण लोगों के बीच सम्मानित हुए। चंपावत जिला प्रशासन भी इसी प्रकार की लोककथा का उल्लेख करता है, जिसमें गोरिल को सौतेली मां की साजिश का शिकार बताया गया है।
एक अन्य प्रचलित कथा में उनके जन्म से ही उन्हें समाप्त करने की साजिश का वर्णन मिलता है। लोकमान्यता के अनुसार उन्हें नदी में बहा दिया गया, लेकिन उनका जीवन बच गया। बड़े होकर उन्होंने अन्याय का विरोध किया और लोगों के बीच न्यायप्रिय शासक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की। इस कथा के अलग-अलग संस्करणों में घटनाओं और पात्रों का विवरण अलग मिलता है। इसलिए इन्हें लोकगाथा के रूप में देखना अधिक उचित है, न कि प्रमाणित ऐतिहासिक जीवनी के रूप में।
गोलू देवता की सबसे बड़ी पहचान उनकी न्यायप्रियता से जुड़ी है। लोकविश्वास में वे ऐसे देवता हैं जो राजा-प्रजा, गरीब-अमीर या शक्तिशाली-कमजोर में भेद नहीं करते।
चंपावत जिला प्रशासन के अनुसार ग्वाल देवता को न्याय का परंपरागत देवता माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि अन्याय और अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति उनकी शरण लेकर न्याय की गुहार करता है।
इसी विश्वास ने गोलू देवता को सामान्य धार्मिक देवता से आगे बढ़ाकर लोकन्याय के प्रतीक का स्वरूप दिया। पहाड़ों में जब किसी व्यक्ति को लगता था कि उसकी बात किसी सांसारिक दरबार में नहीं सुनी जा रही, तब वह गोलू देवता के दरबार में अपनी फरियाद लगाने की परंपरा से जुड़ता गया।
यही वजह है कि गोलू देवता के मंदिर को कई लोग ‘न्याय का दरबार’ भी मानते हैं। गोलू देवता की पूजा की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है लिखित प्रार्थना-पत्र देना।
भक्त अपनी समस्या, मनोकामना या न्याय की गुहार कागज पर लिखकर मंदिर में चढ़ाते हैं। चितई गोलू मंदिर में ऐसी अनेक चिट्ठियां और प्रार्थना-पत्र देखने को मिलते हैं। अल्मोड़ा जिला प्रशासन भी मंदिर में भक्तों द्वारा लिखित याचिकाएं दिए जाने की परंपरा का उल्लेख करता है।
यह परंपरा अपने आप में बेहद प्रतीकात्मक है। भक्त मानता है कि उसकी बात गोलू देवता के दरबार तक पहुंच गई है और अब देवता उसके मामले में न्याय करेंगे।
गोलू देवता के मंदिरों की सबसे अलग पहचान हैं हजारों घंटियां। मान्यता है कि जब किसी भक्त की मनोकामना पूरी होती है या उसे न्याय मिलने का विश्वास होता है, तो वह धन्यवाद स्वरूप मंदिर में घंटी चढ़ाता है। इसी कारण चितई और अन्य गोलू देवता मंदिरों में छोटी-बड़ी असंख्य घंटियां दिखाई देती हैं।
घंटी यहां केवल पूजा की वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि वह भक्त और देवता के बीच आस्था, प्रार्थना और कृतज्ञता का प्रतीक बन जाती है।
लोकमान्यता में गोलू देवता को सफेद घोड़े पर सवार देवता के रूप में देखा जाता है। घोड़ा उनके स्वरूप का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
कुमाऊं की लोकपरंपरा में घोड़े पर सवार होकर लोगों के बीच पहुंचने वाले न्यायप्रिय देवता की छवि बहुत गहरी है। इसी वजह से गोलू देवता के मंदिरों और धार्मिक चित्रों में सफेद घोड़ा दिखाई देता है।
यह छवि उनके सक्रिय, गतिशील और जनता के बीच पहुंचने वाले न्यायप्रिय देवता के रूप से जुड़ी हुई मानी जाती है।
यह भी गोलू देवता की मान्यताओं का महत्वपूर्ण पक्ष है। अल्मोड़ा जिला प्रशासन के अनुसार गोलू देवता की उत्पत्ति को गौर भैरव यानी भगवान शिव के स्वरूप से जोड़ा जाता है। गैराड़ स्थित डाना गोलू मंदिर के संबंध में भी यही मान्यता दर्ज है।
हालांकि गोलू देवता को लेकर कुमाऊं में लोकगाथाओं के अलग-अलग रूप हैं। कहीं उन्हें ऐतिहासिक-लोकनायक के रूप में देखा जाता है, कहीं शिव के भैरव स्वरूप से जोड़ा जाता है और कहीं उन्हें स्थानीय राजवंश की परंपरा से संबंधित माना जाता है। यही विविधता उत्तराखंड की लोकदेवता परंपरा की विशेषता है।
अल्मोड़ा के पास स्थित चितई गोलू मंदिर गोलू देवता के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में शामिल है। अल्मोड़ा जिला प्रशासन के अनुसार यह अल्मोड़ा से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित है और मंदिर की पहचान उसके परिसर में लगी असंख्य तांबे की घंटियों से होती है।
यहां आने वाले श्रद्धालु पूजा करने के साथ अपनी समस्याओं और मनोकामनाओं को लिखित रूप में भी प्रस्तुत करते हैं। किसी की समस्या नौकरी से जुड़ी होती है, किसी की पारिवारिक विवाद से, कोई कानूनी मामले में न्याय की प्रार्थना करता है तो कोई अपने जीवन की किसी दूसरी परेशानी से मुक्ति की कामना करता है।
इसी वजह से चितई मंदिर को आम बोलचाल में ‘घंटियों वाला मंदिर’ और ‘चिट्ठियों वाला मंदिर’ भी कहा जाता है।
अल्मोड़ा जिले में बिंसर क्षेत्र के पास स्थित गैराड़ का डाना गोलू मंदिर भी गोलू देवता की आस्था का प्रमुख केंद्र है। जिला प्रशासन के अनुसार यह बिंसर वन्यजीव अभयारण्य के मुख्य द्वार से लगभग दो किलोमीटर दूर है और इसे गोलू देवता का मूल एवं प्राचीन मंदिर माना जाता है।
गैराड़ की परंपरा में कल्बिष्ट की लोककथा भी गोलू देवता से जुड़ी हुई बताई जाती है। जिला प्रशासन की जानकारी के अनुसार कल्याण सिंह बिष्ट यानी कालबिष्ट गरीबों और पीड़ितों की मदद करने वाले व्यक्ति माने जाते थे और उनकी मृत्यु से जुड़ी लोककथा डाना गोलू से संबंधित है
चंपावत को भी गोलू देवता की लोकपरंपरा में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यहां उन्हें ग्वाल, गोरिल या ग्वेल नामों से भी जाना जाता है।
ग्वाल देवता को न्याय का देवता माना जाता है और उनके सम्मान में मंदिर भी स्थापित है। स्थानीय लोककथा उन्हें कत्यूरी राजकुमार गोरिल से जोड़ती है।
इस तरह चंपावत, अल्मोड़ा और कुमाऊं के अन्य हिस्सों में गोलू देवता की परंपरा अलग-अलग लोककथात्मक रूपों में दिखाई देती है, लेकिन न्याय और सत्य उनकी साझा पहचान बने हुए हैं।
नैनीताल जिले के घोड़ाखाल में स्थित गोलू देवता मंदिर भी प्रदेश के प्रसिद्ध मंदिरों में गिना जाता है। यहां भी दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाएं लेकर पूजा करते हैं।
इस प्रकार गोलू देवता की आस्था केवल किसी एक गांव या जिले तक सीमित नहीं है। कुमाऊं के अनेक हिस्सों में वे इष्ट देवता, कुल देवता और लोकन्याय के देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
उत्तराखंड की लोकदेवता परंपरा में जागर का विशेष महत्व है। ढोल-दमाऊं और पारंपरिक गायन के माध्यम से लोकदेवताओं का स्मरण किया जाता है। गोलू देवता से जुड़े जागर भी कुमाऊं की लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
जागर केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोकस्मृति का माध्यम भी है। इसके माध्यम से गोलू देवता की गाथाएं, उनके न्यायप्रिय स्वरूप और उनसे जुड़ी लोककथाएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही हैं।
गोलू देवता की लोकप्रियता के पीछे केवल मंदिर या धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं। उनके पीछे एक गहरी सामाजिक भावना भी दिखाई देती है—जिसकी कहीं सुनवाई नहीं हो रही, वह देवता के दरबार में अपनी बात रख सकता है।
यही भावना गोलू देवता को उत्तराखंड के अन्य लोकदेवताओं से अलग पहचान देती है। उनके मंदिर में लगाई गई घंटियां केवल मनोकामना पूरी होने का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि लोगों की पीढ़ियों पुरानी आस्था की आवाज भी हैं। मंदिरों में टंगी चिट्ठियां इस विश्वास की अभिव्यक्ति हैं कि न्याय की उम्मीद कभी छोड़ी नहीं जानी चाहिए।
गोलू देवता की कथा उत्तराखंड की समृद्ध लोकपरंपरा का हिस्सा है। उनके बारे में प्रचलित कथाओं में ऐतिहासिक घटनाओं, राजवंशों, धार्मिक मान्यताओं और लोकविश्वासों का मिश्रण दिखाई देता है। इसलिए गोरिल/ग्वेल की कथा, शिव के गौर भैरव स्वरूप की मान्यता और अन्य स्थानीय कथाओं को लोकपरंपरा के अलग-अलग रूपों के रूप में समझना चाहिए।
इतिहासकारों के लिए किसी लोककथा के हर विवरण को ऐतिहासिक तथ्य मानना अलग विषय है, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से इन कथाओं का महत्व बहुत बड़ा है। यही लोकगाथाएं उत्तराखंड के पहाड़ों में सदियों से चली आ रही सामुदायिक स्मृति और आस्था को जीवित रखती हैं।
गोलू देवता इसलिए केवल मंदिर में विराजमान देवता नहीं हैं। वे कुमाऊं की लोकचेतना में न्याय, सत्य, उम्मीद और अपनी बात कहने के अधिकार के प्रतीक बन चुके हैं। शायद यही वजह है कि आज भी जब कोई व्यक्ति खुद को असहाय महसूस करता है तो वह गोलू देवता के दरबार में जाकर अपनी फरियाद लगाने को आस्था और उम्मीद का रास्ता मानता है।
हिमाद्री प्रोडक्शन द्वारा निर्मित फिल्म इन सभी कहानियों को पर्दे पर जीवंत करने जा रही है। गोलू देवता जिन्हें कुमाऊं में न्याय का देवता माना जाता है। फिल्म ‘बाला गोरिया’ 16 अक्टूबर को रिलीज होने जा रही है। फिल्म चंपावत के गोलू देवता की लोकगाथा, उनके बलिदान और उस विश्वास की कहानी कहेगी, जिसके चलते आज भी भक्त न्याय की उम्मीद लेकर उनके मंदिरों में अर्जी लगाते हैं।’बाला गोरिया’ को फैंटेसी और हिस्ट्री की शैली में बनाया गया है।
हाल ही में हनुमान अंश के बाद उत्तराखंड के इस महान और लोककथाओं के नायक न्याय के देवता गोलू देवता की ये गाथा हर किसी की आस्थाओं और स्थानीय संस्कृति की उदात्त परंपरा से आज की पीढ़ी को रुबरु कराने की कोशिश भी क्या हनुमान अंश की तरह कामयाब होगी? देखना होगा कि उत्तराखंड के लोग अपने आराध्य और ईष्ट के प्रति कितने जागरूक हो पाते हैं? यह फिल्म केवल मनोरंजन की दृष्टि से नहीं बनाई गयी है वरन् अपने धार्मिक और महान देवता से लोगों को परिचित कराने के उद्देश्य से बनाई गई है। कहानी पढ़ने से ज्यादा पर्दे पर देखना एक अलग और सुखद अनुभव होगा। अब 16 अक्टूबर का इंतजार रहेगा लोगों को।
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