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मोदी सरकार 3.0 ला रही नयी पेंशन स्कीम, अंतिम बेसिक सेलरी का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में दिये जाने का प्रस्ताव,87 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को मिल सकता है लाभ

@शब्द दूत ब्यूरो (12 जून 2024)

नई दिल्ली। हालिया लोकसभा चुनाव परिणामों से केंद्र सरकार खासकर भाजपा ने सबक लेते हुए सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत देने का प्रस्ताव रखा है।अब नयी पेंशन योजना में बढ़ोतरी का प्रस्ताव पेश कर दिया है।

जो  जानकारी आ रही है उसके मुताबिक, केंद्र सरकार केंद्रीय कर्मचारियों की अंतिम बेसिक सैलरी पर 50 फीसदी पेंशन की गारंटी का प्रस्ताव रखा है। पिछले साल मार्च 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने वित्त सचिव टी वी सोमनाथन के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया था, जिसका मकसद नॉन कंट्रीब्यूटरी ओल्ड पेंशन स्कीम  पर वापस लौटे बिना नेशनल पेंशन स्कीम के तहत पेंशन लाभों में सुधार के तरीकों का पता लगाना था।

यह कमेटी तब बनाई गई थी, जब देश के कई राज्यों ने अपने यहां एन पी एस  को लागू करने से मना कर दिया था और पुरानी पेंशन प्रणाली की प्रक्रिया को अपना शुरू कर दिया था।

बता दें कि इस कमेटी को रिपोर्ट जमा करने के लिए कोई तय समय सीमा का निर्धारण नहीं किया गया था। इस कमेटी में इसमें वित्त मंत्रालय के एक्सपेंडीचर डिपार्टमेंट में स्पेशल सेग्रेटरी राधा चौहान, एनी मैथ्यू और पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलअपमेंट अथॉरिटी के चेयरपर्सन दीपक मोहंती शामिल थे।

नेशनल पेंशन स्कीम के तहत केंद्रीय कर्मचारियों के अंतिम वेतन के 40 से 50 प्रतिशत के बराबर पेंशन की गारंटी होगी। आसान भाषा में कहें तो, यदि आपका 50,000 रुपये महीने के अंतिम वेतन पर रिटायर होते हैं तो, आपको 20 से 25 हजार रुपये प्रति महीने पेंशन के रूप में दिया जाएगा। हालांकि कुल सेवा का समय और पेंशन कोष से आपके द्वारा किसी भी प्रकार की निकासी का समायोजन किया जाएगा। इस पेंशन गारंटी को पूरा करने के लिए पेंशन कोष में किसी भी कमी को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार के बजट से पूरा किया जाएगा। यहां यह भी ध्यान दें कि अगर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली को लागू किया जाता है तो 1 जनवरी साल 2004 से नेशनल पेंशन स्कीम में रजिस्ट्रर्ड 87 लाख से अधिक केंद्रीय कर्मचारियों को इसका फायदा मिलेगा।

वित्त मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, डीए दरों में बढ़ोतरी के साथ यह राशि बढ़ती रहती है। मंत्रालय ने कहा था कि ओपीएस वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है क्योंकि यह अंशदायी नहीं है और सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता रहता है।

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