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चुनाव विशेष: आजादी के बाद से अबतक हुए लोकसभा चुनाव,अर्श से फर्श पर पहुंचे राजनीतिक दल या आम जनता के जरूरी मुद्दे,एक विश्लेषण

@विनोद भगत 

देश में अब तक 17 लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। 18 वें लोकसभा चुनाव का बिगुल लगभग बज चुका है। निर्वाचन आयोग की घोषणा का इंतजार किया जा रहा है। आजादी के बाद हुये लोकसभा चुनावों के सफर ने साफ तौर पर बता दिया है कि अर्श से फर्श पर पहुंचाने वाली जनता ही है। लोकतंत्र के मंदिर में मतदाता ही सर्वशक्तिमान है। भले ही चुनाव निपटने के बाद वही मतदाता अनेक बार अपने आप को ठगा महसूस करता है। इसका मूल कारण है कि अब तक हुए सभी चुनाव किसी लहर का शिकार हुये हैं या फिर भावनाओं में बहकर लड़े गये हैं। परिणाम स्वरूप आम जन के मुद्दे आज भी मुंह बाये खड़े हैं। और ये मुद्दे राजनीतिक दल जिंदा रखना चाहते हैं ताकि पक्ष विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप लगाकर जनता के बीच खुद को प्रतिस्थापित कर सकें।

आइये अब बात करते हैं अब तक के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं ने कैसे कैसे किस को अर्श से फर्श तक पहुंचाया 

आजादी के बाद पहले लोकसभा चुनाव से लेकर 17 वें चुनाव तक कांग्रेस, भाजपा समेत अन्य प्रमुख दलों को मिलीं सीटों में बड़ा अंतर आया है। कांग्रेस जहां 90% से घटकर 9% सीटों पर आ गई, वहीं भाजपा ने 1984 से 2014 के बीच अपनी सीटें 0.3% से बढ़ाकर 52% तक पहुंचा दीं। आजादी के बाद पहली बार 2004 में वाम दल सबसे बेहतर प्रदर्शन कर सके। वहीं, 2014 का चुनाव द्रमुक (0), बसपा (0) और सपा (5) के लिए सबसे निराशाजनक रहा। वहीं, अन्नाद्रमुक (37) और तृणमूल (34) ने मोदी लहर के बावजूद पिछले चुनाव में अपना अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। पहली बार में ही सत्ता तक पहुंचने का रिकॉर्ड कांग्रेस के बाद जनता पार्टी और जनता दल का रहा। जनता पार्टी ने 1977 और जनता दल ने 1989 में सरकार बनाई। हालांकि, बाद में दोनों दल टूट गए।

1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 90% यानी 401 में से 364 सीटें मिली थीं। 1957 में दूसरे चुनाव में उसने 403 में से 371 यानी 92% सीटें जीतीं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए चुनाव में कांग्रेस का तीसरा सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा। इसमें पार्टी को 543 में से 76% यानी 415 सीटें मिलीं। इसके बाद कांग्रेस की सीटें घटती गईं। सिर्फ एक बार 2009 में उसने 200+ का आंकड़ा पार किया और 206 सीटें जीतीं। इसके बाद 2014 में कांग्रेस को महज 44 सीटें मिलीं, यह कुल सीटों का महज 8% हिस्सा थी। देश के चुनावी इतिहास में कांग्रेस का यह सबसे खराब प्रदर्शन था।

जनसंघ के जनता पार्टी में विलय और फिर इसके टूटने के बाद 1980 में भाजपा अस्तित्व में आई। पार्टी ने 1984 में पहला चुनाव लड़ा और 2 सीटों पर जीत हासिल की। 1989 के चुनाव में भाजपा राम मंदिर को मुद्दा बना चुकी थी। उसने इस चुनाव में 86 यानी 15% सीटें हासिल कीं और नेशनल फ्रंट सरकार को समर्थन दिया। इसी बीच, लालकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। 1991 में दोबारा चुनाव हुए और भाजपा की सीटें बढ़कर 120 यानी 22% हो गईं। 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 161, 1998 में 1982 और 1999 में 182 सीटें मिलीं। 2004 में उसकी सीटें घटकर 138 हो गईं। 2009 में सीटें और भी कम होकर 116 पर आ गईं। लेकिन 2014 में उसने अपनी सबसे ज्यादा 282 सीटें हासिल कीं। यह कुल सीटों के मुकाबले 52% थीं।इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनाव में इंदिरा विरोधी कई दलों ने एकजुट होकर जनता पार्टी बनाई। इसमें जनसंघ, भारतीय लोकदल, कांग्रेस (ओ) जैसी प्रमुख पार्टियां शामिल थीं। 41% वोटों के साथ जनता पार्टी ने अपने पहले ही चुनाव में 295 सीटें जीतीं।

इमरजेंसी के खिलाफ लोगों का गुस्सा और विपक्षी एकजुटता इस चुनाव में पार्टी की जीत का बड़ा कारण रही।महज 2 साल में ही जनता पार्टी अपने अर्श से फर्श पर पहुंच गई। नेताओं के बीच मतभेद हुए और पार्टी टूट गई। मोरारजी देसाई को पद छोड़ना पड़ा और चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। जनता पार्टी के टूटने के बाद बड़े चेहरों ने अपने-अपने दल बनाए। इसके बाद 1996, 1999 और 2004 के चुनाव में पार्टी को एक भी सीट नसीब नहीं हुई। 2013 में पार्टी का भाजपा में विलय हो गया।वीपी सिंह ने जन मोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस-एस को एकजुट कर 1988 में जनता दल की नींव रखी। 1989 के चुनाव में पार्टी को 143 सीटें हासिल हुईं। भाजपा और लेफ्ट के समर्थन से जनता दल की सरकार बनी। यह जनता दल का सबसे अच्छा प्रदर्शन था। 1996 के चुनाव के बाद जनता दल टूटने लगा। 1998 में पार्टी को महज 6 सीटें मिलीं। 1999 के चुनाव के पहले पार्टी पूरी तरह खत्म हो गई। इसमें शामिल बड़े चेहरों ने जदयू, जेडीएस, राजद, बीजद जैसे दल बनाए।

अब 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी है और परिणाम का फैसला जनता जनार्दन के हाथ में आने वाला है। क्या मुद्दों को फिर दरकिनार कर भावनाओं या लहर पर ही चुनाव की परंपरा जारी रहेगी?

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