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बिहार में एक बार फिर ‘ क्रास ब्रीड ‘ सरकार@नैतिकता से दूर होती सियासत पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की खरी खरी

राकेश अचल,
वरिष्ठ पत्रकार जाने माने आलोचक

यकीन मानिये की सियासत पर न लिखने का बिलकुल मन नहीं होता,किन्तु देश की सियासत में हर रोज कुछ न कुछ ऐसा घटित हो जाता है की मन मारकर उस पर लिखना ही पड़ता है । झारखंड की सियासत के बाद बिहार की सियासत में बहुत कुछ हो चुका है और एक बार फिर से महाराष्ट्र की बारी है। बिहार में एक बार फिर विधानसभा में क्रास वोटिंग की वजह से ‘ क्रास ब्रीड ‘ सरकार बन गयी। इसके लिए मै बिहार की जनता को बधाई नहीं दे सकता । मै बधाई देना चाहता हूँ विश्वास मत प्रस्ताव के दौरान हारे राजद के तेजस्वी यादव को ,क्योंकि उन्होंने डाकू सुल्ताना बनने के बजाय बाबा बनना पसंद किया और सत्ता का सफेद घोड़ा नीतीश कुमार को ले जाने दिया।

बिहार की सियासत का नैतिकता से कोई लेना-देना कम से कम पिछले तीन दशक से तो नहीं रहा ,लेकिन तेजस्वी ने ये कोशिश की ,सत्तारूढ़ भाजपा-जेडीयू की सरकार ने राजद के तीन विधायकों को जबरन क्रास वोटिंग के लिए विवश कर अपनी सरकार को औंधे मुंह गिरने से तो बचा लिया किन्तु इस कोशिश में ये नया और अनैतिक गठबंधन बुरी तरह लहू-लुहान हो गया । यहां तक कि भाजपा और जदयू के पांच विधायक भी अब सरकार के निशाने पर आ गए हैं और उप मुख्यमंत्री सिद्धार्थ सिंह उन्हें देख लेने की धमकी दे रहे हैं। बिहार में आगामी लोकसभा चुनाव तक सत्ता के सूत्र भाजपा को अपने हाथ में चाहिए थे इसमें उसे कामयाबी मिली ,लेकिन आगे इस गठबंधन का क्या हाल होगा ,ये देखने वाली बात है।
भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में संसद में 370 सीटें जीतने का लक्ष्य घोषित कर दरअसल फंस गयी है । ये लक्ष्य पाने के लिए उसे एड़ी-चोटी का जोर लगना पड़ रहा है । भाजपा की खस्ता हो चुकी बुर्जों की मरम्मत में अब यहां-वहां से समेटकर रोड़े लगाए जा रहे है। बिहार में जदयू के रोड़े बटोरे गए हैं और महाराष्ट्र में कांग्रेस ,शिव सेना और एनसीपी के रोड़े भाजपा के काम आ रहे हैं। भाजपा एक तरफ अपनी ध्वस्त बुर्जों की मरम्मत कर रही है दूसरी तरफ कांग्रेस समेत विपक्ष की तमाम बुर्जों पर प्रहार कर रही है और जमकर प्रहार कर रही है। राजद और समाजवादी पार्टी जैसे कुछ ही क्षेत्रीय दल हैं जो अभी तक भाजपा के सामने टिके हुए है। तृण मूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी भी कब हथियार डाल दे ,कहना कठिन है।

तीसरी बार सत्ता में आने को आतुर भाजपा अब सियासत में निर्ममता की तमाम हदें पार कर चुकी है । नैतिकता का परित्याग तो भाजपा पहले ही कर चुकी है। भाजपा के नेतृत्व वाले पुराने गठबंधन की जिस सरकार को बचाने में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी ने दल-बदल,और खरीद-फरोख्त के चिमटे का इस्तेमाल करने से साफ़ मना कर दिया था उसी भाजपा के लिए अब कोई भी चिमटा अछूत नहीं है। उसे तो केवल अपनी सरकार बनाना है। भाजपा की केंद्र सरकार किसानों के प्रति उतनी ही क्रूर है जितनी पहले थी । जब आप ये खबर पढ़ रहे होंगे तब मुमकिन है कि केंद्र और हरियाणा की सरकार मिलकर आंदोलनरत किसानों पर लाठियां बरसा रही हो। सरकार अब कोई भी प्रतिकार बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है। झारखंड की हार से केंद्र की सरकार और ज्यादा भन्ना गयी है । उसकी क्रूरता में और ज्यादा इजाफा हो गया है।

मुझे लगता है कि चुनावों की घोषणा होने तक भाजपा इतना इंतजाम कर लेगी की कांग्रेस इंडिया गठबंधन के बजाय अकेले चुनाव लड़ने पर विवश हो जाए। ‘ बांटो और राज करो ‘ की पुरानी और आजमायी हुई अंग्रेजों की नीति भाजपा के बहुत काम आ रही है। आज भाजपा कहने को एक महान राष्ट्रवादी पार्टी है लेकिन उसकी चाल,चरित्र और चेहरे से फिरंगियों वाला तेज झलक रहा है। मुझे इसीलिए कभी-कभी भाजपा सुदर्शन लगती है। कांग्रेस आज की तारीख में सड़क की पार्टी है और भाजपा पुरानी कांग्रेस की तरह ‘ कार्पोरेट्स ‘ की पार्टी बन चुकीहै। सड़क से उसका रिश्ता न जाने कब का टूट चुका है। भाजपा में अब पांच सितारा संस्कृति पनप चुकी है। भाजपा का मूल चरित्र ही सौदेबाजी का है । इसमें उसे कामयाबी मिल रही है ,हालाँकि इसके लिए भाजपा ने अपना और देश का सब कुछ दांव पर लगा दिया ह। सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ भारत रत्न ‘ भी भाजपा से नहीं बच पाए।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं ,वैसे-वैसे भारत की सियासत और ज्यादा जटिल,निर्दय और अमानवीय होती जा रही है । नए भारत के लिए ये हिंसक और अदावती राजनीति कितनी फायदेमंद होगी और कितनी नुकसानदेह ये कहना अभी सम्भव नहीं है किन्तु इसके करवट लेने से देश में बहुत कुछ बदलेगा जरूर। भारत पहले अंग्रेजों से लड़ा ,बाद में आपातकाल में उसे कांग्रेस से लड़ना पड़ा और अब भारत की लड़ाई भारतीय जनता पार्टी से है। मजे की बात ये है कि भाजपा के पास होशमंद नेता और बेहोश समर्थकों की फ़ौज है ,जबकि सामने बिखरी हुई सेनाएं। मुझे कभी-कभी लगता है कि 2024 की लड़ाई का हश्र 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जैसा न हो। पहले स्वतंत्रता संग्राम के बिखराव ने हमारे सेनानियों की बगावत को नाकाम कर दिया था। आज 167 साल बाद इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है। मुमकिन है कि बहुत से पाठक मित्रों को ये तुलना कुछ अजीब और असंगत लगे ,किन्तु मेरे मन में जो है वो मैंने लिखा है। आपका सहमत होना आवश्यक नहीं है। आप अपने विचारों के खुद मालिक हैं।

मजे की बात देखिये कि 2024 के संग्राम में अनेक लक्ष्मीबाइयाँ हैं जो अपनी-अपनी झाँसी बचाने में लगी हैं,लेकिन अनेक सिंधिया भी हैं [नीतीश कुमार,अशोक चव्हाण और एकनाथ शिंदे को याद रखिये ]जो इन लक्ष्मीबाईयों की मौत का सामान बन रहे है। [ ममता,माया को ध्यान में रखिये] इस लड़ाई में भी अनेक तात्या टोपे हैं [,हेमंत सोरेन,अरविंद केजरीवाल को ध्यान में रखिये] लेकिन लड़ाके होने के बावजूद उनके हारने के आसार ज्यादा है। खैर मै तो कल्पना कर रहा हूँ । आप चाहें तो मेरी कल्पना का आनंद ले सकते हैं ,लेकिन सावधानी के साथ,क्योंकि सामने तो दुर्दिन ही हैं।
@ राकेश अचल
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