@शब्द दूत ब्यूरो (27 जुलाई 2026)
नई दिल्ली। परमाणु विस्फोट जैसी विनाशकारी घटनाओं के बाद भी कॉकरोच के जीवित बच जाने की चर्चा लंबे समय से होती रही है। इसी रहस्य को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने गहन अध्ययन किया, जिसमें कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन्होंने कॉकरोच की अद्भुत जीवित रहने की क्षमता को नई पहचान दी।
शोध के अनुसार, कॉकरोच इंसानों की तुलना में कहीं अधिक मात्रा में रेडिएशन सहन कर सकते हैं। जहां लगभग 800 रैड (rad) रेडिएशन इंसानों के लिए घातक माना जाता है, वहीं कॉकरोच लगभग 10,000 रैड तक की रेडिएशन मात्रा को झेलने में सक्षम पाए गए हैं। यह क्षमता उन्हें अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रहने का अवसर देती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि परमाणु बम से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण केवल रेडिएशन नहीं होता, बल्कि विस्फोट के तुरंत बाद उत्पन्न होने वाली अत्यधिक गर्मी, दबाव और ऊर्जा होती है। इसलिए विस्फोट के बिल्कुल निकट मौजूद कॉकरोच भी बच नहीं पाते। हालांकि, जो कॉकरोच कुछ दूरी पर होते हैं, वे तीव्र गर्मी और विस्फोट की मार से बचने पर उच्च स्तर के रेडिएशन को भी सहन कर लेते हैं।
कॉकरोच की इस क्षमता का सबसे बड़ा कारण उनके शरीर की कोशिकाओं की कार्यप्रणाली मानी जाती है। इंसानों की कोशिकाएं लगातार और तेजी से विभाजित होती रहती हैं, जबकि रेडिएशन सबसे अधिक नुकसान उन्हीं कोशिकाओं को पहुंचाता है जो तेजी से विभाजित हो रही हों। इसके विपरीत, कॉकरोच की अधिकांश कोशिकाएं अपेक्षाकृत धीमी गति से विभाजित होती हैं, जिससे रेडिएशन का प्रभाव उन पर अपेक्षाकृत कम पड़ता है।
जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमलों के बाद भी कुछ क्षेत्रों में कॉकरोचों के जीवित पाए जाने की घटनाओं ने इस विषय को और अधिक चर्चा में ला दिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि विस्फोट से पर्याप्त दूरी पर मौजूद कॉकरोच उच्च स्तर के रेडिएशन को सहन करने में सफल रहे, जबकि इंसानों और अन्य बड़े जीवों के लिए वही परिस्थितियां जानलेवा साबित हुईं।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि “कॉकरोच परमाणु विस्फोट में कभी नहीं मरते” जैसी धारणा पूरी तरह सही नहीं है। यदि वे विस्फोट के केंद्र या अत्यधिक गर्मी और दबाव वाले क्षेत्र में हों, तो उनकी भी मृत्यु निश्चित है। उनकी विशेषता केवल यह है कि वे अन्य अधिकांश जीवों की तुलना में कहीं अधिक रेडिएशन सहन कर सकते हैं।
इसी वजह से वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि भविष्य में पृथ्वी पर कोई ऐसी वैश्विक आपदा आती है, जिसमें अधिकांश बड़े जीव समाप्त हो जाएं, तो कॉकरोच जैसे छोटे और अत्यधिक सहनशील जीव सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वालों में शामिल हो सकते हैं। यह क्षमता उन्हें प्रकृति के सबसे अनुकूलनशील जीवों में से एक बनाती है।
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