@विनोद भगत
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) में 47 अधिकारियों को हटाए जाने और उसके तुरंत बाद युवा प्रोफेशनल्स तथा संविदा पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी होने से एक बार फिर देश की परीक्षा व्यवस्था कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। सरकार इसे सुधार की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है, लेकिन इससे कहीं बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों? और आई भी तब अनेक युवाओं ने आत्महत्या की। अनेक युवा लाठीचार्ज में घायल हो गए। देश भर में इस आंदोलन को लेकर देश के लोगों के बीच आपस में कड़वाहट घुल गयी।
NEET, JEE, CUET जैसी राष्ट्रीय परीक्षाएं केवल परीक्षा नहीं हैं। ये करोड़ों युवाओं के सपनों, वर्षों की मेहनत और परिवारों की उम्मीदों का आधार हैं। यदि इन परीक्षाओं के आयोजन की जिम्मेदारी संभालने वाली एजेंसी में ही संस्थागत कमजोरी हो, तो इसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जिन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए एक मजबूत, अनुभवी और स्थायी प्रशासनिक ढांचा होना चाहिए था, वहां लंबे समय तक संविदा व्यवस्था और अस्थायी नियुक्तियों पर इतना भरोसा क्यों किया गया? यदि आज परीक्षा अनुसंधान, साइबर सुरक्षा, टेस्ट सेंटर प्रबंधन और फॉरेंसिक जांच जैसे महत्वपूर्ण पदों पर फिर से संविदा आधार पर भर्ती की जा रही है, तो क्या सरकार मानती है कि देश की सबसे संवेदनशील परीक्षा प्रणाली स्थायी संस्थागत क्षमता के बिना भी चल सकती है?
47 अधिकारियों को हटाना निश्चित रूप से एक बड़ी कार्रवाई है। लेकिन यह कार्रवाई जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह जानना है कि इन अधिकारियों की नियुक्ति किस प्रक्रिया से हुई, उनकी कार्यप्रणाली की निगरानी कौन कर रहा था और जब लगातार परीक्षाओं पर सवाल उठ रहे थे, तब सुधार पहले क्यों नहीं किए गए? क्या केवल अधिकारियों को हटा देना ही जवाबदेही है, या फिर उन लोगों की भी जिम्मेदारी तय होगी जिन्होंने वर्षों तक इस व्यवस्था को इसी रूप में चलने दिया?
सरकार अब युवा प्रोफेशनल्स की भर्ती और विशेषज्ञों को लाने की बात कर रही है। यदि यह कदम पहले उठा लिया गया होता, यदि संस्थागत सुधार समय रहते किए गए होते और यदि परीक्षा प्रणाली को राजनीतिक घोषणाओं के बजाय पेशेवर प्रबंधन से मजबूत किया गया होता, तो शायद लाखों छात्रों को अनिश्चितता, तनाव और बार-बार होने वाले विवादों का सामना नहीं करना पड़ता।
यह भी विडंबना है कि एक ओर सरकार युवाओं से ईमानदारी, मेहनत और प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा करती है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं युवाओं के भविष्य का फैसला करने वाली परीक्षा व्यवस्था वर्षों तक कमजोर प्रशासनिक ढांचे के सहारे चलती रही। पेपर लीक की घटनाएं, परीक्षा रद्द होना, परिणामों पर विवाद और अब 47 अधिकारियों की बर्खास्तगी—ये सभी अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक गहरे संस्थागत संकट के संकेत हैं।
देश के युवाओं को केवल यह भरोसा नहीं चाहिए कि दोषियों पर कार्रवाई होगी। उन्हें यह विश्वास चाहिए कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा ही नहीं होगी। इसके लिए केवल नई भर्तियां या विज्ञापन पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता है कि NTA को पूर्ण रूप से पेशेवर, स्वतंत्र, तकनीकी रूप से सक्षम और जवाबदेह संस्था बनाया जाए। संविदा आधारित अस्थायी समाधान नहीं, बल्कि स्थायी संस्थागत सुधार समय की मांग है।
आज सरकार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि 47 अधिकारियों को क्यों हटाया गया। असली प्रश्न यह है कि क्या सरकार स्वीकार करेगी कि परीक्षा प्रणाली के प्रबंधन में गंभीर नीतिगत कमियां थीं? और यदि थीं, तो क्या उन कमियों की राजनीतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी भी तय होगी?
देश का युवा अब केवल आश्वासन नहीं चाहता। वह ऐसी परीक्षा व्यवस्था चाहता है, जहां उसकी मेहनत का फैसला किसी लापरवाही, किसी संविदा व्यवस्था की कमजोरी या किसी प्रशासनिक विफलता से प्रभावित न हो। क्योंकि परीक्षा में केवल प्रश्नपत्र नहीं लीक होता, उसके साथ लाखों युवाओं का विश्वास भी टूटता है। उस विश्वास को वापस लाना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
Shabddoot – शब्द दूत Online News Portal