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फैसला :काशीपुर में घरेलू कार्य से जुड़े श्रमिकों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को संरक्षण का संदेश

@शब्द दूत ब्यूरो (20 जुलाई 2025)

काशीपुर। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट काशीपुर की अदालत ने एक घरेलू नौकरानी के विरुद्ध दायर आपराधिक परिवाद को खारिज करते हुए कहा है कि खाना बनाना बंद कर देना कोई आपराधिक कृत्य नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का विषय है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार सोनल सिंघल पत्नी सन्दीप सिंघल, निवासी नई सब्जी मंडी, शक्तिनगर, काशीपुर ने अपने घर में खाना बनाने वाली नौकरानी रमाकान्ति उर्फ सुमन पत्नी विनोद कुमार वर्मा, निवासी काली मंदिर, शर्मा आटा चक्की के पास, काशीपुर के खिलाफ परिवाद दाखिल किया था।

वादिनी ने आरोप लगाया था कि सुमन के तीन बच्चे हैं और वह उनकी स्कूल फीस नहीं जमा कर पा रही थी। इसी को देखते हुए उन्होंने सुमन की मदद करते हुए स्कूल में बात कर 50,000 रुपए की फीस जमा कर दी, जिसमें से 25,000 रुपए उन्होंने नकद दिए। इस धनराशि को सुमन द्वारा 1,200 रुपए प्रति माह की किश्तों में चुकाने का वादा किया गया था।

परिवाद में कहा गया कि कुछ समय पश्चात सुमन ने उनके घर खाना बनाना बंद कर दिया और अक्टूबर 2024 में स्पष्ट कह दिया कि वह अब काम पर नहीं आएगी, “चाहे 25,000 रुपए का केस डालो या 50,000 रुपए का”। वहीं, वह पड़ोस के घरों में काम करती रही। इसे आधार बनाकर सोनल सिंघल ने सुमन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 316 (1), 318 (4), 351 (1)(2) के अंतर्गत परिवाद दाखिल किया।

मुकदमे में सुमन की ओर से अधिवक्ता अमरीश अग्रवाल ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि यदि कोई खाना बनाने वाली महिला काम छोड़ देती है तो वह कोई अपराध नहीं है। यह व्यक्ति विशेष की स्वेच्छा का मामला है, और इसमें किसी भी प्रकार का आपराधिक पक्ष नहीं बनता।

अधिवक्ता की दलीलों और प्रस्तुत तर्कों से सहमत होते हुए अदालत ने सोनल सिंघल द्वारा दाखिल परिवाद को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि घरेलू सहायक द्वारा कार्य न करना कानूनन अपराध नहीं है।

यह निर्णय घरेलू कार्य से जुड़े श्रमिकों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को संरक्षण देने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

 

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