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“फर्जी पत्रकार” कहने से पहले जानिए – भारत में पत्रकार बनने के लिए नहीं है कोई कानूनी शर्त

@शब्द दूत ब्यूरो (08 जुलाई 2025)

आज के डिजिटल युग में जब सोशल मीडिया, यूट्यूब और वेब पोर्टल्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है, पत्रकारों की संख्या में भी अप्रत्याशित इजाफा हुआ है। इसके साथ ही एक नई बहस जन्म लेती है – कौन है असली पत्रकार और कौन है फर्जी पत्रकार? लेकिन क्या वाकई भारत में किसी को “फर्जी पत्रकार” कहने का कानूनी आधार मौजूद है?

क्या है पत्रकार बनने की कानूनी प्रक्रिया?

भारत में पत्रकार बनने के लिए कोई विशेष डिग्री, पंजीकरण या सरकारी लाइसेंस अनिवार्य नहीं है। यह एक ऐसा पेशा है जिसमें व्यक्ति अपने लेखन, संवाद, रिपोर्टिंग, संपादन या प्रसारण कौशल के बल पर जुड़ता है। कोई भी व्यक्ति, यदि वह खबरें संकलित करता है, प्रकाशित करता है, और समाज को सूचित करता है, तो वह पत्रकार कहलाने का अधिकार रखता है।

भारत का संविधान भी अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” प्रदान करता है, जो पत्रकारिता की आत्मा है।

पंजीकरण की कोई बाध्यता नहीं

कुछ लोगों में यह भ्रम होता है कि पत्रकार बनने के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया या सूचना विभाग में पंजीकरण आवश्यक है। परंतु यह सच नहीं है। ये संस्थाएँ केवल पेशेवर पत्रकारों को मान्यता देती हैं जिससे वे सरकारी सुविधाएं प्राप्त कर सकें, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।

‘फर्जी पत्रकार’ कहना क्या है उचित?

जब कोई व्यक्ति सत्ता या प्रभावशाली वर्गों पर सवाल उठाता है, तो उस पर “फर्जी पत्रकार” होने का आरोप लगाया जाता है। यह न केवल असंवैधानिक मानसिकता है, बल्कि व्यक्ति की सार्वजनिक प्रतिष्ठा पर भी हमला है।

यदि कोई पत्रकार गलत कार्य करता है, तो कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है, न कि उसे मनमाने ढंग से ‘फर्जी’ घोषित कर दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की सोच भी यही है

भारत के उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पत्रकारिता एक प्रोफेशन है, न कि लाइसेंसबद्ध व्यवसाय। इसमें प्रवेश के लिए कोई बाध्यता नहीं है।

पत्रकारिता की नैतिकता बनाम कानूनी स्थिति

पत्रकारिता में नैतिकता आवश्यक है – लेकिन नैतिकता का उल्लंघन अलग विषय है, और किसी को “फर्जी” कहना कानूनी अपराध हो सकता है।

यदि कोई व्यक्ति पत्रकार होने का झूठा दावा कर धोखाधड़ी करता है, तो उसके विरुद्ध IPC की धाराओं – 420, 468, 499 आदि के तहत कार्रवाई हो सकती है।

भारत में पत्रकारिता करने के लिए न कोई लाइसेंस चाहिए, न पंजीकरण। संविधान ने हर नागरिक को सूचना साझा करने का अधिकार दिया है।

इसलिए बिना किसी वैधानिक प्रमाण के किसी को “फर्जी पत्रकार” कहना अवैध है और मानहानि का मामला बन सकता है।

पत्रकारिता की शुचिता बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन उसकी शुरुआत तथ्यों, संवैधानिक अधिकारों और कानून की समझ से होनी चाहिए – न कि असत्य आरोपों से। आप किसी को फर्जी पत्रकार कहते हैं केवल फर्जी नहीं मतलब ये तो आप मान ही रहे हैं कि वह पत्रकार है।

 

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