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हमारे संस्कृति कर्मी – 1: उत्तराखंड की पहली फिल्म ‘जग्वाल’ और इसके निर्माता-निर्देशक पाराशर गौड़, एक सांस्कृतिक मील का पत्थर

@विनोद भगत

उत्तराखंड के सांस्कृतिक इतिहास में जब भी क्षेत्रीय सिनेमा की बात होगी, एक नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा – पाराशर गौड़। उन्होंने 1983 में गढ़वाली भाषा की पहली फीचर फिल्म ‘जग्वाल’ (प्रतीक्षा) का निर्माण और निर्देशन कर एक सांस्कृतिक क्रांति की नींव रखी। यह फिल्म केवल एक कथा नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा, वहां की स्त्री की प्रतीक्षा और प्रवासी जीवन के दर्द की सिनेमाई अभिव्यक्ति थी।

पाराशर गौड़ का जन्म 3 मई 1947 को पौड़ी गढ़वाल के मिर्चोड़ा गांव में हुआ था। बचपन से ही रंगमंच और साहित्य में रुचि रखने वाले पाराशर जी ने दिल्ली में थिएटर और दूरदर्शन के माध्यम से सांस्कृतिक सृजन आरंभ किया। गढ़वाली भाषा को सिनेमा के माध्यम से पहचान दिलाना उनका उद्देश्य था। उनका मानना था—“पहाड़ की आत्मा को स्क्रीन पर उतारना मेरा पहला लक्ष्य था—और ‘जग्वाल’ उसी की प्रतीक्षा थी।”

‘जग्वाल’ शब्द का अर्थ होता है प्रतीक्षा। यह फिल्म एक ऐसी नवविवाहिता की कथा है, जो पति के शहर चले जाने के बाद बरसों तक उसकी वापसी की प्रतीक्षा करती है। वह प्रतीक्षा केवल उसके पति की नहीं, बल्कि प्रेम, अपनत्व और पहाड़ के सामाजिक रिश्तों की प्रतीक्षा है। पाराशर गौड़ कहते हैं—“मैंने देखा कि पहाड़ की हर औरत के हिस्से में एक ‘जग्वाल’ होता है – किसी के लौट आने की, चिट्ठी की, सुख की प्रतीक्षा।”

इस फिल्म को बनाना आसान नहीं था। संसाधन सीमित थे, तकनीकी साधन मुश्किल से जुटते थे, लेकिन पाराशर जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने बॉम्बे से तकनीकी टीम और कैमरा बुलाया और अपने थिएटर अनुभव के सहारे पूरी फिल्म सिर्फ 22–28 दिनों में शूट कर दी। फिल्म का बजट केवल ₹8.5 लाख था, जिसे उन्होंने दोस्तों और शुभचिंतकों की मदद से जुटाया। वे बताते हैं—“जब मावलंकर हॉल में पहली स्क्रीनिंग हुई, तो लोगों ने टिकट ₹5 की जगह ₹50 देकर देखी। ये मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार था।”

उतराख॔डी फिल्मौ की गलियारों की हकीकत–

आजकल जो अपने को किसी के कंधौ के साहारा लेकर कई सालौ से बडा बनने के कोशिश कर रहा है अब समय आ गया है उसकी सचाई  को जमाने के आगे लाने की — मेरा एक शेर —

” हम अपनी इस अदा पर गुरूर करते रहे —
सबके सामने झूठ बोल बोल कर—
अपना कद ऊंचा करते रहे “
-पाराशर गौड पारस —

 

‘जग्वाल’ एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ है। इसकी भाषा शुद्ध गढ़वाली है, संगीत पारंपरिक लोकधुनों पर आधारित है और पात्र स्थानीय ग्रामीण परिवेश से लिए गए हैं। फिल्म में संवादहीन पीड़ा, लोकगीतों की मार्मिकता और गांव के परिवेश की सजीवता दर्शकों को सीधे दिल से जोड़ देती है।

इस फिल्म ने उत्तराखंड में क्षेत्रीय फिल्मों के लिए दरवाजे खोल दिए। इसके बाद ‘मेंजण’, ‘टिल्लू की शादी’, ‘कभी सुख कभी दुख’ जैसी गढ़वाली फिल्मों का मार्ग प्रशस्त हुआ। ‘जग्वाल’ ने पहाड़ी समाज की प्रतीक्षा, पीड़ा और पहचान को रूपायित किया। पाराशर गौड़ कहते हैं—“मैंने सिर्फ फिल्म नहीं बनाई, मैंने अपनी मां की आंखों से बहता जीवन दिखाया।”

1989 में पाराशर गौड़ कनाडा (टोरंटो) चले गए, लेकिन वहां से भी उन्होंने अपनी भाषा और संस्कृति के लिए काम जारी रखा। वे आज भी कनाडा में उत्तराखंडी समाज से जुड़े हैं, सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लेते हैं और नई पीढ़ी को गढ़वाली बोली से जोड़ने का प्रयास करते हैं। उनका कहना है—“मैं जहां भी जाऊं, मेरे भीतर का गढ़वाल कभी बाहर नहीं जाता।”

‘जग्वाल’ के माध्यम से पाराशर गौड़ ने यह साबित कर दिया कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को छूने का माध्यम भी है। उनके शब्दों में—“जग्वाल कोई एक स्त्री की कहानी नहीं है – यह पूरे उत्तराखंड की आत्मकथा है।”

आज जब उत्तराखंड में फिल्म नीति बन रही है, पहाड़ों में शूटिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है, तब इस यात्रा की नींव रखने वाले पाराशर गौड़ को याद करना नितांत आवश्यक है। उनका योगदान उत्तराखंड की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। ‘जग्वाल’ न सिर्फ उत्तराखंड की पहली फिल्म थी, बल्कि वह प्रतीक्षा थी उस दिन की जब हमारी बोली, हमारी पीड़ा और हमारी पहचान को भी सिनेमा के माध्यम से वह सम्मान मिलेगा जिसकी वह सच्चे अर्थों में हकदार है।

(यह लेख पाराशर गौड़ से लेखक की हुई बातचीत पर आधारित है। शब्द दूत उत्तराखंड के संस्कृति कर्मियों पर एक सीरीज प्रकाशित कर रहा है। उसी सीरीज का यह पहला भाग है। दूसरे भाग में एक और संस्कृति कर्मी के बारे में जानेंगे आप।)

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