@विनोद भगत
उत्तराखंड के काशीपुर क्षेत्र की राजनीति इन दिनों दो अलग-अलग लेकिन जुड़ी हुई शख्सियतों के इर्द-गिर्द घूम रही है — पूर्व विधायक और भाजपा के वरिष्ठ नेता हरभजन सिंह चीमा और उनके पुत्र एवं वर्तमान विधायक त्रिलोक सिंह चीमा। दोनों की राजनीतिक शैली में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। जहाँ एक ओर हरभजन सिंह चीमा को काशीपुर की राजनीति का “भीष्म पितामह” कहा जाने लगा है, वहीं दूसरी ओर उनके पुत्र त्रिलोक सिंह चीमा अब धीरे-धीरे राजनीतिक पथ पर आत्मसात कर रहे हैं।
पिता की विरासत: तीखे तेवर और स्पष्टता
हरभजन सिंह चीमा कई वर्षों तक काशीपुर विधानसभा सीट से विधायक रहे हैं और भाजपा की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। अपने बेबाक और तीखे बयानों के लिए चर्चित रहे हरभजन सिंह चीमा ने स्थानीय मुद्दों पर हमेशा मुखर होकर बोलने में परहेज नहीं किया। चाहे पार्टी के अंदरूनी मसले हों या नगर निगम के कामकाज — उनका दृष्टिकोण खुलकर सामने आता रहा है। हालांकि पहले जब वह निगम के कामों को लेकर सवाल उठाते थे तो सामने से पलटवार लगभग नहीं के बराबर होता था पर अब परिस्थितियाँ बदली हुई है।
बेटे की राजनीति: संतुलन और सामंजस्य
दूसरी ओर, 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर विधायक बने त्रिलोक सिंह चीमा अभी राजनीति में अपेक्षाकृत नए हैं। अपने औद्योगिक संस्थान में वर्षों से सक्रिय रहे त्रिलोक सिंह अब सार्वजनिक जीवन में धीरे-धीरे अपनी भूमिका तलाश रहे हैं। उनका झुकाव संघर्ष की बजाय सामंजस्यपूर्ण और संतुलित राजनीति की ओर अधिक दिखता है।
विवाद से संवाद तक: महापौर के साथ संबंध
बीते दिनों जब पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा ने महापौर दीपक बाली की कार्यशैली पर टिप्पणी की तो वातावरण में राजनीतिक तल्खी उभर आई थी। लेकिन नगर निगम सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम में विधायक त्रिलोक सिंह चीमा और महापौर दीपक बाली जब मंच पर गले मिले, तो यह एक संदेश बन गया — कि काशीपुर की राजनीति अब टकराव नहीं, समन्वय की दिशा में आगे बढ़ रही है।
महापौर की भूमिका और राजनीतिक हैसियत
दीपक बाली न केवल काशीपुर की नगर राजनीति में बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी अपनी मजबूत स्थिति बना चुके हैं। उनका यह बयान – “मेरे साथ जो हैं वो तो हैं ही अपने, लेकिन जो सामने हैं वो भी मेरे अपने हैं।” – उनकी समावेशी सोच को दर्शाता है, जो उन्हें अलग पहचान दिलाती है।
निष्कर्ष: सामंजस्य से ही विकास संभव
काशीपुर की राजनीति अब अनुभव और युवा सोच के बीच सामंजस्य का अद्भुत संगम बन रही है। जहाँ हरभजन सिंह चीमा की विरासत एक मजबूत नींव है, वहीं त्रिलोक सिंह चीमा की उदार राजनीति और दीपक बाली की समन्वयकारी शैली काशीपुर के विकास को नई दिशा दे सकती है। आम जनता भी अब टकराव की बजाय समाधान और समन्वय की राजनीति को प्राथमिकता देती नजर आ रही है। ऐसे में भविष्य की राजनीति का आधार आपसी सहयोग और सामूहिक विकास ही होगा।
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