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राजशाही को क्यों नहीं मरने दे रहे हम ?@15 देशों के राजा की ताजपोशी पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल का विश्लेषण

राकेश अचल,
वरिष्ठ पत्रकार जाने माने आलोचक

दुनिया में दुसरे तमाम वादों से भी पुरानी राजशाही आज भी अपने मूल स्वरूप में ज़िंदा है और उसे ज़िंदा रखे हुए हैं अंग्रेज .वे अंग्रेज जिनका सूरज अब पूरी दुनिया में डूब चुका है ,लेकिन उनके यहां राजशाही 957 साल बाद भी न सिर्फ जिंदा है बल्कि मजे में हैं .जनता अपने राजा पर लट्टू है,हालांकि कुछ लोग इसकी खिलाफत में भी खड़े दिखाई देने लगे हैं .

राजशाही को भारत में सामंतवाद कहते हैं ,जो हमारे गांधीवाद से सैकड़ों साल पुराना है. भारत में कहने के लिए आजादी के बाद देशी रियासतों के विलय के बाद सामंतशाही का लोप हो गया था लेकिन तमाम राजनीतिक दलों ने सामंतों के अवशेषों को आज भी अपने सीने से चिपका रखा है. आज भी देश की तमाम कालकवलित हो चुकी रियासतों में ताजपोशी के नाटक होते हैं.किन्तु सामंतशाही का ताजा नयनाभिराम मंजर दिखाई दिया इंग्लैंड में ,जहां महाराजा चार्ल्स तृतीय की शनिवार को ताजपोशी हुई। वेस्टमिंस्टर ऐबी में महाराजा चार्ल्स तृतीय और उनकी पत्नी कैमिला को ताज पहनाया गया। इस ताजपोशी कार्यक्रम के दो हजार से ज्यादा लोग गवाह बने।

जब महाराजा चार्ल्स तृतीय को ताज पहनाया जा रहा था उस वक्त ‘गॉड सेव किंग चार्ल्स’ के जमकर नारे लगे। बर्मिंघम पैलेस से लेकर वेस्टमिंस्टर ऐबी तक हजारों लोग सड़क के किनारे महाराजा चार्ल्स तृतीय को देखने के लिए एकत्रित हुए। कहते हैं कि वेस्टमिंस्टर एब्बे 1066 में विलियम प्रथम (विलियम द कॉन्करर) के समय से प्रत्येक ब्रिटिश ताजपोशी का गवाह रहा है। महाराजा चार्ल्स तृतीय और उनकी पत्नी कैमिला इस भव्य परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं बता दें कि चार्ल्स तृतीय और कैमिला की साल 2005 में शादी हुई थी।किंग चार्ल्स तृतीय ने बीते साल सितंबर में अपनी मां महारानी एलिजाबेथ की मौत के बाद यूनाइटेड किंगडम और 14 अन्य देशों के सम्राट के दावेदार बने थे, ताजपोशी होते ही वह इन देशों के सम्राट बन गए .दुनिया के २०० देशों में से 43 देश आज भी ऐसे हैं जो राजा-रानी के बिना नहीं जी पा रहे . थायलॅण्ड, ब्रुनेई, मोरक्को,भूटान के राजा-महाराजा आज भी दुनिया में घूमते-फिरते नजर आते हैं .

एक समय लगभग पूरी दुनिया पर कब्ज़ा रखने ब्रिटेन में आज भी उसी शिद्दत से अपने राजा का सम्मान करती है। इसके पीछे वहां का संविधान और उसके प्रति लोगों का विश्वास काम करता है। जिसमें राजा और जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार दोनों आपस में संवैधानिक शक्तियों का बंटवारा करते हैं। राजा सरकार के काम में दखल नही दे सकता है पर उसके दस्तखत के बिना किसी कानून को लागू भी नही किया जा सकता। इस व्यवस्था को ‘संवैधानिक राजशाही’ कहा जाता है।

किंग चार्ल्स III अब कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सहित 15 विभिन्न देशों में राज्य के प्रमुख हैं। वेटिकन सिटी और साउदी अरब ,मलेशिया और यूएई में मिश्रित राजशाही है सभी देश जिसमें राजाओं का शासन है में से लगभग 70 फीसदी संवैधानिक राजतंत्र होने के कारण, वे निस्संदेह समकालीन युग में सबसे प्रचलित प्रकार के शाही नेतृत्व हैं। राजा केवल औपचारिक क्षमता में कार्य करता है, जिससे लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रशासनों को राष्ट्र पर शासन करने की अनुमति मिलती है। जिन देशों में राजशाही संवैधानिक हैं लेकिन कुछ देशों में शासन तरह से निरंकुशता या राजतन्त्र है। ऐसे देशों में स्वाज़ीलैंड (पूर्ण राजतन्त्र), ओमान (पूर्ण राजतन्त्र), दारुस्सलाम (पूर्ण राजतन्त्र), सऊदी अरब (पूर्ण धर्मतन्त्र), वेटिकन (पूर्ण धर्मतन्त्र), कतर (मिश्रित शासन), यूएई (मिश्रित शासन) और बहरीन (मिश्रित शासन) का नाम शामिल है ।

दुनिया में इस समय चार तरह का सामंतवाद है .इसे आप संवैधानिक राजतंत्र, पूर्णतया राजशाही, संघीय राजशाही, मिश्रित राजशाही कह सकते हैं .जापान ,यूनाइटेड किंगडम,डेनमार्क में संवैधानिक राजशाही है ,अर्थात यहां राजा नाम का है .इस्वातिनि ,सऊदी अरब ,वेटिकन सिटी में पूर्ण राजशाही है,.यहां राजा ही सब कुछ है. संयुक्त अरब अमीरात
मलेशिया में संघीय राजतंत्र है.अर्थात यहां हर पांच साल में चुनाव भी होते हैं .जॉर्डन,लिकटेंस्टाइन,मोरक्को में मिश्रित राजशाही है .जापान के शाही परिवार ने वंशानुगत शासन के तहत 2,600 से अधिक वर्षों तक देश पर शासन किया है।
बहरहाल आज जब पूरी दुनिया राजतंत्र से लोकतंत्र की और जा चुकी है तब तीन दर्जन से अधिक देशों में सामंतशाही को प्रश्रय देना आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है .यहां भी अब एक न एक गांधी की आवश्यकता है .मुमकिन है कि इन 43 देशों में भी आने वाले सालों में कोई राजा न रहे लेकिन ऐसा नहीं भी हो सकता .ये मानसिकता का सवाल है .दुनिया के तमाम देशों में सामंतशाही अलग-अलग रूपों में ज़िंदा रही है .लेकिन समय के साथ इन्हें अस्वीकार कर दिया गया .अब न रूस में राजा है और न चीन में ,लेकिन जहां राजा नहीं हैं वहां के निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष राजाओं से ज्यादा बलशाली और क्रूर भी हैं .
हमने अपने देश में राजशाही तो नहीं देखी लेकिन उसके अवशेषों के दर्शन जरूर किये हैं. आज भी हमारे यहां

अस्तित्वहीन राजाओं के यहां रस्म पगड़ी की जगह राजतिलक होता है .हमने अपने शहर ग्वालियर में माधवराव सिंधिया के निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की कथित ताजपोशी देखी है . राजस्थान में आज भी अनेक पुरानी रियासतों के पूर्व राजप्रमुखों के परिवारों में राजतिलक होते हैं .इन परिवारों ने देश की आजादी के अमृतकाल में प्रवेश के बाद भी अपने आपको राजा-महाराजा मानना बंद नहीं किया है .ऐसे लोगों की नाक पर अभी भी लोकतंत्र की मख्खी बैठ नहीं सकती .आपको नेपाल में राजशाही के खुनी अंत का स्मरण शायद आज भी होगा ही .चीन ने भी 1949 में राजशाही से मुक्ति पा ली है .अब सामंती मानसिकता से मुक्ति का समय है .देखिये इसमें कितना समय लगता है ?
@ राकेश अचल
achalrakesh1959@gmail.com

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