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काशीपुर फ्लैश बैक :सत्येंद्र चंद्र गुड़िया को आज भी इसलिए याद करते हैंशहर के लोग?

इन दुकानों के मालिक आज भी सत्येंद्र चंद्र गुड़िया को स्मरण करते हैं

@शब्द दूत ब्यूरो (19 अप्रैल 2022)

काशीपुर। पूर्व सांसद स्वर्गीय सत्येंद्र चंद्र गुड़िया वास्तव में प्रभावशाली राजनीति के पुरोधा थे । उनकी प्रशासनिक पकड़ और असरदार राजनीति ,के लोग आज भी कायल हैं ।

लोग इस बात का लोहा मानते हैं कि वास्तव में जो ताकत सत्येंद्र चंद्र गुड़िया मे थी वह बहुत कम नेताओं में देखने को मिलती है। और जहां तक काशीपुर का सवाल है तो यहां गुड़िया जैसा नेता उनसे पहले न कभी था और ना कभी होगा। श्री गुड़िया को हमसे बिछड़े हुए एक दशक से भी अधिक का समय बीत गया है बावजूद इसके आज भी लोग उन्हें नहीं भूले हैं और गली मोहल्लों चौपालों व दुकानों पर आज भी उनके राजनीतिक वजूद की चर्चा होती है।

बात उन दिनों की है जब श्री गुड़िया विधायक बने थे । बताते हैं उस समय काशीपुर कोतवाली नहीं थाना हुआ करता था। पुलिस के पास जीप या मोटरसाइकिल नहीं बल्कि साइकिल हुआ करती थी। थाने का एक दरोगा आए दिन दुकानदारों को परेशान करता था । उन्हीं से बेगार लेता था और उन्हीं के चालान काट देता था। दरोगा के अभद्र आचरण से लोग परेशान भी बहुत थे । दुकानदार अनिल शर्मा बताते हैं कि जब पानी सिर से ऊपर पहुंच गया तो तो कई दुकानदार इकट्ठे होकर सत्येंद्र चंद गुड़िया के पास पहुंचे मगर वह कहीं बाहर गए हुए थे ।  बाद में जब वह लौट कर आए तो दुकानदार दिन निकलते ही प्रातः करीब 8:00 बजे फिर पहुंच गए। वहां मौजूद नौकर ने बताया कि गुड़िया जी देर रात लौटे हैं अतः बाद में आना। यह बात श्री गुड़िया ने सुन ली और दुकानदारों को अपने पास बुला कर उनकी समस्या सुनी और कहा अब आप लोग जाओ। मैं देख लूंगा। बाद में 2 घंटे बाद ही पता चला कि दरोगा जी का ट्रांसफर कहीं बलिया साइड में बहुत दूर हो गया है। इतनी जल्दी कार्यवाही हो जाने से सभी दुकानदार आश्चर्यचकित रह गए।

शहर में एक मस्जिद हुआ करती थी जिसकी जगह पर विवाद था और इसी वजह से वह टीन की चादरों से बनाई गई थी जिस कारण मस्जिद को टीन वाली मस्जिद भी कहा जाता था। मस्जिद का विवाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रहा था। मुस्लिम समाज के कुछ बुजुर्ग श्री गुड़िया के पास पहुंचे और उन्होंने मस्जिद का लिंटर डलवाने की बात कही। बताया जाता है कि कोर्ट में मामला होने के बावजूद श्री गुड़िया ने मौके पर कुर्सी डलवा कर बैठकर अपने सामने लिंटर डलवाया ।लोगों ने विरोध भी जताया और शिकायत भी की। पुलिस भी आई मगर श्री गुड़िया के सामने किसी की नहीं चली और लिंटर डल गया।

जीजीआईसी के सामने सड़क बननी थी, मगर दिक्कत यह थी कि ट्रांसफार्मर के पास सड़क पर ही छोटे दुकानदारों की कई दुकानें थी। सड़क बनाने के लिए तत्कालीन नगर पालिका ने टीन की चादरों से बनी हुई इन दुकानों को हटा दिया। बाद में दुकानें लगने दी जाएंगी या नहीं यह सोच कर दुकानदार परेशान हो गए और उन्होंने श्री गुड़िया के यहां गुहार लगाई। दुकानदारों की माली हालत देख और उनका कारोबार बंद ना हो जाए यह सोच कर श्री गुड़िया ने कह दिया कि जाओ जहां तुम्हारी दुकानें थी वही लगा लो और कोई कुछ कहे तो मेरा नाम ले देना ।उसके बाद सड़क तो बनी मगर किसी ने उन दुकानों को नहीं हटाया। यह दुकानदार आज भी खुद को श्री गुड़िया का ऋणी मानते हैं।

नगर के एक पत्रकार को अपनी माता जी को उपचार के लिए दिल्ली ले जाना था, मगर आर्थिक तंगी के चलते गाड़ी की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। जब चारों ओर से निराशा ही निराशा दिखाई दी तो उस पत्रकार ने रात्रि 8:00 बजे सोचा कि क्यों न सत्येंद्र चंद गुड़िया को फोन कर लिया जाए। श्री गुड़िया को फोन किया गया। उन्होंने पूरी बात सुनी और कहा कि सुबह माताजी को दिल्ली ले जाने की तैयारी करो ।पांच मिनट बाद ही पत्रकार के पास फोन आ गया कि कार किस जगह पर भेजनी है। इतनी जल्दी समस्या का समाधान हो जाएगा यह सोच कर वह पत्रकार भी दंग रह गए जो आज भी श्री गुड़िया के उस सहयोग के प्रति खुद को उनका ऋणी मानते हैं ।

बताते हैं जिस समय नगर के पास स्थित श्री बांसियों वाले मंदिर का निर्माण और विस्तार कार्य चल रहा था तो पैसे की तंगी आड़े आ गई। शहर के गणमान्य लोगों ने विचार बनाया कि इस समस्या का समाधान श्री गुड़िया ही कर सकते हैं। अतः उनके पास जाया जाए। वह सब इकट्ठे होकर श्री गुड़िया के पास पहुंचे और उन्होंने समस्या सुनने के बाद शाम तक ही पैसे की व्यवस्था करा दी थी।

बताते हैं एक बार श्री गुड़िया को पता चला कि गदरपुर चीनी मिल के जीएम लोगों से अभद्रता से बात करते हैं। सच जानने के लिए गुड़िया ने अपने किसी आदमी को गदरपुर चीनी मिल के जीएम के पास भेजा था । जीएम ने उसकी बात को कोई तवज्जो नहीं दी और उल्टे कह दिया कि मैं किसी गुड़िया को नहीं जानता। बाद में बताया जाता है कि उस जीएम को श्री गुड़िया ने काफी लताड़ा। उसके बाद वह तोबा मान गए और जनता की बात को गंभीरता के साथ सुनकर उसका निदान करने लगे।

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