@विनोद भगत
उत्तराखंड के वजूद पर लगातार खतरा मंडरा रहा है। राज्य के राजनेताओं का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। चाहे भाजपा हो चाहे कांग्रेस दोनों ने ही उत्तराखंड को अपनी कठपुतली बना कर नचाया है और यह सिलसिला थमने वाला नहीं है। विकास की बातें करने वाले राष्ट्रीय दल यहाँ के नेताओं को अपने इशारे पर चलाते रहे हैं। आदेश आता है बैठ जाओ फिर आदेश आता है खड़े हो जाओ। मतलब उत्तराखंड का नेतृत्व भले ही प्रकट में स्थानीय नेता के हाथ में दिखाई देता है लेकिन डोर हाईकमान के हाथ में है।
तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलवाकर हाईकमान ने दिखा दिया कि उत्तराखंड का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। विकास इतना जरूरी नहीं है जितना कि सत्ता पर नियंत्रण। अफसोसजनक बात है कि देवभूमि में कोई क्षेत्रीय दल अन्य राज्यों की तरह अपना वजूद नहीं बना पाया यह भी दुर्भाग्य है।
इस छोटे से राज्य के साथ राष्ट्रीय दलों का यह अन्याय शायद ही कभी समाप्त हो पाये। दरअसल यहाँ इस कद का कोई नेता नहीं उभर पाया या यूँ कहें कि उभरने नहीं दिया गया। यहाँ के स्थानीय नेताओं ने भी राष्ट्रीय नेतृत्व की जी हूजूरी कर उनका कृपापात्र बनकर मंत्री या मुख्यमंत्री का पद हासिल किया और जब तक कृपा रही तब तक पद पर बने रहे। विचारणीय बात यह है कि जिस मंत्री या मुख्यमंत्री को राष्ट्रीय नेतृत्व की चरणवंदना करनी होगी तो वह राज्य में विकास योजनाओं से अधिक राष्ट्रीय नेतृत्व की चापलूसी ज्यादा करेगा। ऐसे में देवभूमि के विकास की बात सोचना भी बेमानी है।
111 दिन बाद ही मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को दिल्ली आकाओं के निर्देश पर पद छोडना पड़ता है। यह इस राज्य के लोगों के लिए बिडम्बना है। आखिर कब तक उत्तराखंड जिसे देवभूमि कहा जाता है वह विकास के लिए तरसती रहेगी। एकमात्र मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी थे जो कि पूरे पांच साल तक इस राज्य के मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे। उनके अलावा कोई अन्य ऐसा वजूद वाला राजनीतिक व्यक्तिव इस राज्य में नहीं उभर पाया। और इसका कुपरिणाम इस राज्य का अनियोजित विकास के रूप में सामने आया।
दुर्भाग्य की बात है कि प्रचंड बहुमत के बावजूद भाजपा को पांच साल के भीतर तीसरा मुख्यमंत्री लाना पड़ता है। भाजपा के नेता विपक्ष पर सरकार को अस्थिर करने के लिए जिम्मेदार ठहराते है लेकिन यहाँ तो बाड़ ही खेत को खा गई।
बहरहाल मुख्यमंत्री बदलने के इस प्रकरण से भाजपा ने यह साबित कर दिया है वह जन भावनाओं और जनता के मेंडेट को महत्व नहीं देती। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है। ।
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