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जानिए क्या है चिराग पासवान और पशुपति पारस के बीच तल्खी की असल वजह

@नई दिल्ली शब्द दूत ब्यूरो

बिहार की राजनीति में कभी सत्ता की चाभी रखने वाली लोक जनशक्ति पार्टी अब दो फाड़ हो चुकी है। चाचा-भतीजे के बीच में पैदा हुआ मनमुटाव वक्त के साथ इतना बढ़ गया कि अब दोनों की राहें अलग-अलग हो चुकी हैं। पार्टी में जो कुछ आज हो रहा है उसके संकेत पहली बार पिछले साल उस वक्त सामने आए थे जब चिराग ने सार्वजनिक तौर पर चाचा पशुपति कुमार पारस के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर दी थी।

लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान के भाई और चिराग पासवान के चाचा पशुपति पारस हमेशा लो प्रोफाइल और पर्दे के पीछे रहने वाले ही रहे। सूत्र बताते हैं कि जैसे ही पार्टी की कमान बेटे चिराग के हाथों में आईं चीजें तेजी से बदलने लगीं। स्थितियां ऐसी परिवर्तित हो गईं कि हाजीपुर के सांसद और रामविलास पासवान के दाहिने हाथ कहे जाने वाले पारस ने ही पार्टी में तख्ता पलट कर दिया। उनके समेत पांच सांसद लोकसभा स्पीकर के पास पहुंच गए और सदन में एक अलग दल की मान्यता देने की बात कह दी।

रामविलास पासवान के निधन के चार दिनों के बाद और बिहार चुनावों से पहले पारस द्वारा नीतीश कुमार की तारीफ करना चिराग पासवान को नाराज कर गया था। गुस्साए चिराग ने चाचा को पार्टी से निकालने तक की धमकी दे दी थी और उन्हें परिवार के नहीं होने तक की बात कह दी थी। इसके जवाब में पारस ने भी कहा था कि आज से तुम्हारे लिए तुम्हारे चाचा मर गए। इस संवाद के बाद चाचा-भतीजे के बीच मुश्किल से ही बात होती थी, चिट्ठियों में तनाव का ऐहसास किया जा सकता था।

सूत्रों के अनुसार पशुपति पारस बिहार विधानसभा चुनावों में कभी भी एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ने या बीजेपी-जेडीयू के खिलाफ एलजेपी के उम्मीदवार खड़े करने के पक्ष में नहीं थे। पारस के करीबी बताते हैं कि जब चुनाव की तैयारियों के दौरान भतीजे ने चाचा से पार्टी के उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा करना जरूरी नहीं समझा तो वह खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे थे।

नवंबर के चुनावों में लोजपा की एकमात्र उपलब्धि यह थी कि वह जेडीयू का वोट विभाजित करने में कामयाब रही थी। जिसका असर ये हुआ कि जेडीयू चुनावों में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई थी और लोजपा के खाते में मात्र एक सीट आई थी। चुनाव में मिली हार की हताशा के बाद पार्टी नेताओं को चिराग के अंदर एक बेहद जिद्दी और अभिमानी नेता दिखाई देने लगा। हालांकि कुछ नेता उनके काम करने के अंदाज में रामविलास पासवान की शैली देखा करते हैं। लोजपा का संकट उस वक्त और बढ़ गया जब हाजीपुर से पहली बार सांसद बने पारस को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देने का वादा किया गया।

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