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पीएम मोदी की सोच “एक राष्ट्र एक चुनाव” देश के विकास को तेज करने में सहायक :वरिष्ठ पत्रकार सुरेश शर्मा का आकलन

सुरेश शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा शब्द दूत के संपादकीय सलाहकार हैं

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में एक राष्ट्र एक चुनाव को देश की जरूरत बताते हुए निर्वाचन आयोग से इस पर गंभीरता से विचार करने को कहा है। पीएम मोदी ने गत माह 26 नवंबर को केवड़िया (गुजरात) में संविधान दिवस पर अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के एक सम्मेलन के समापन सत्र में यह बात कही। मोदी ने कहा कि कुछ महीनों के अंतराल के बाद देश के अलग अलग राज्यों में होने वाले चुनाव से विकास कार्य प्रभावित होते हैं साथ में समय और धन की बर्बादी भी होती है। पीएम ने अलग अलग चुनाव प्रक्रिया मसलन लोकसभा विधानसभा और पंचायत चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि इन सबके लिए एक ही मतदाता सूची होनी चाहिए। अलग अलग मतदाता सूची बनाने से भी समय और सरकारी धन की बर्बादी होती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस कथन के पीछे सार्थक सोच है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहाँ लोकसभा एवं राज्य विधानसभा के चुनाव पांच वर्षों के अंतर पर निर्धारित है। लेकिन अलग चुनाव होने से काफी सरकारी धन बर्बाद हो रहा है और सरकारी खजाने से जो धन विकास कार्यों में लगना चाहिए वह चुनाव खर्च में लग जाता है। 

भारत में ऐसा हुआ है जब पूरे देश में एक साथ चुनाव हुये हैं। अगर इतिहास के पन्नों को पलटा जाये तो आजादी के बाद 1952,1957,1962और 1967 में एक साथ लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव हुये हैं। देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत के मुताबिक वर्ष 1967 तक देश के विकास की गति बहुत तीव्र थी। इसका कारण वह पूरे देश में एक साथ चुनाव को बताते हैं।

उसके बाद 1968 – 69 में कुछ विधानसभाओं को विभिन्न कारणों से समय पूर्व भंग करने से देश में एक राष्ट्र एक चुनाव वाली व्यवस्था भंग हो गई और धीरे-धीरे यह परिपाटी समाप्त ही हो गई। विश्व पटल पर अगर नजर डालें तो आज भी दुनिया के कई देशों में एक साथ चुनाव व्यवस्था कायम है। इनमें स्वीडन, इंडोनेशिया, दक्षिणी अफ्रीका, जर्मनी, स्पेन, हंगरी, बेल्जियम, पोलैंड, स्लोवेनिया तथा अल्बानिया शामिल हैं।

एडीआर के आंकड़ों के अनुसार 1952 में लोकसभा का पहला चुनाव हुआ जिसमें 53 दलों ने भाग लिया था। 1874 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। तब कुल व्यय 11 करोड़ रुपये आया था। और अब 2019 में हुये आम चुनावों पर नजर डालें तो 610 दलों ने इसमें अपनी भागीदारी निभाई और नौ हजार उम्मीदवार मैदान में थे। कुल खर्च साठ हजार करोड़ रुपए आया था। देश में 31 राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में 4120 विधायक हैं। विधानसभाओं के लिए अधिकतम सीमा 28 लाख रुपये तक है। आम तौर पर हर साल पांच राज्यों से विधानसभाओं के चुनाव होते हैं। 2021 में भी पांच से छह विधानसभाओं के चुनाव होने हैं।

कुल मिलाकर देश के विकास पर भारी पड़ रहे चुनावी खर्च से निजात पाने के लिए एक राष्ट्र एक चुनाव की व्यवस्था लाभकारी साबित होगी।

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