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हरीश रावत की धन्यवाद और जनसंवाद यात्रा से क्या 2027 में कांग्रेस को मिलेगा लाभ? उत्तराखंड की सियासत में कितना बदलेगा समीकरण?

@विनोद भगत

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक जमीन धीरे-धीरे तैयार होने लगी है। इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है। यात्रा का उद्देश्य केवल कार्यकर्ताओं और समर्थकों का आभार जताना नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर उसके मुद्दों को समझना और कांग्रेस को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए तैयार करना भी माना जा रहा है। हालिया कार्यक्रमों में रावत ने जनता की समस्याओं और सुझावों के आधार पर कांग्रेस का विजन डॉक्यूमेंट तैयार करने की बात कही है।

हरीश रावत की यह यात्रा ऐसे समय शुरू हुई है, जब विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज करनी शुरू कर दी हैं। एक अक्टूबर को हरिद्वार क्षेत्र में यात्रा के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। यात्रा के दौरान रावत ने प्रदेश में बदलाव की आवश्यकता का संदेश दिया और कार्यकर्ताओं को चुनावी तैयारी के लिए सक्रिय होने का आह्वान किया।

रावत का जनता के बीच लौटना कितना महत्वपूर्ण है?
उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का अपना अलग राजनीतिक आधार माना जाता है। मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में लंबा राजनीतिक अनुभव रखने वाले रावत राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों, पहाड़, किसान, पूर्व सैनिक, युवा और पारंपरिक कांग्रेस समर्थक वर्ग के बीच लगातार सक्रिय रहे हैं। हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में भी उनके छह दशक से अधिक लंबे राजनीतिक सफर और कांग्रेस में उनकी भूमिका को रेखांकित किया गया है।

ऐसे में धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा कांग्रेस के लिए दो स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकती है। पहला, इससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में सक्रियता आ सकती है और दूसरा, रावत सीधे जनता से संवाद कर स्थानीय मुद्दों को राजनीतिक मुद्दों में बदलने का प्रयास कर सकते हैं।

रावत की यात्रा में किसानों से गन्ने के भुगतान में देरी, धान की फसल को नुकसान और बिजली के भारी बिल जैसे मुद्दे सामने आने की बात कही गई है। यदि कांग्रेस इन स्थानीय समस्याओं को विधानसभा क्षेत्रवार दस्तावेज और चुनावी मुद्दों में बदलने में सफल रहती है, तो यात्रा का राजनीतिक प्रभाव केवल भीड़ तक सीमित नहीं रहेगा।
क्या अकेले हरीश रावत कांग्रेस को फिर सत्ता में ला सकते हैं? यहीं सबसे बड़ा सवाल है। हरीश रावत कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण चेहरा हैं, लेकिन किसी एक नेता की लोकप्रियता चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं होती। 2027 में कांग्रेस को लाभ तभी मिल सकता है, जब रावत की जनस्वीकार्यता को संगठन की ताकत के साथ जोड़ा जाए।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुटीय राजनीति और नेतृत्व को लेकर अस्पष्टता रही है। स्वयं रावत अतीत में पार्टी को एकजुट होकर चुनाव लड़ने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।

इसलिए इस यात्रा का वास्तविक परीक्षण यह होगा कि इसके बाद कांग्रेस कितने बूथों तक पहुंचती है, कितने पुराने कार्यकर्ता सक्रिय होते हैं और स्थानीय स्तर पर पार्टी का संगठन कितना मजबूत होता है।

यह यात्रा केवल कांग्रेस के लिए ही नहीं, बल्कि स्वयं हरीश रावत के लिए भी राजनीतिक परीक्षा है। 2027 में चुनाव लड़ने के सवाल पर रावत ने हाल में कहा कि यदि पार्टी नेतृत्व चाहेगा तो वह चुनाव लड़ेंगे। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उनके लिए व्यक्तिगत रूप से चुनाव लड़ने से अधिक महत्वपूर्ण कांग्रेस को मजबूत करना और प्रदेश में पार्टी की सरकार बनाने के लिए काम करना है।

इस बयान से यह संकेत मिलता है कि रावत अपनी भूमिका को केवल किसी एक विधानसभा सीट तक सीमित करने के बजाय व्यापक चुनावी अभियान में देख रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो वह कांग्रेस के लिए राज्यव्यापी प्रचारक और पुराने कार्यकर्ताओं को जोड़ने वाले सेतु की भूमिका निभा सकते हैं।

2027 के चुनाव में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारतीय जनता पार्टी के मजबूत संगठन और लगातार चुनावी सक्रियता की होगी। इसलिए विपक्ष के लिए केवल सरकार की आलोचना पर्याप्त नहीं होगी। उसे जनता को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि सत्ता में आने पर वह क्या अलग करेगी।

रावत अपनी जनसंवाद यात्रा में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याओं, बिजली के बिल, कानून-व्यवस्था और सरकार के कामकाज जैसे मुद्दे उठा रहे हैं। यदि कांग्रेस इन मुद्दों को ठोस नीतिगत विकल्पों में बदलती है तो यात्रा पार्टी के चुनावी अभियान की आधारभूमि बन सकती है।

उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ी जिलों की समस्याएं मैदान के हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और देहरादून की समस्याओं से अलग हैं। ऐसे में धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा का प्रभाव तभी व्यापक माना जाएगा, जब यह केवल कुछ विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित न रहकर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचे।

रावत की राजनीतिक शैली लंबे समय से सीधे जनता से संपर्क पर आधारित रही है। इसलिए यदि यात्रा के दौरान पहाड़ों में पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और कृषि जैसे सवाल तथा मैदानी क्षेत्रों में किसान, उद्योग, व्यापार, बेरोजगारी और शहरी सुविधाओं जैसे मुद्दे एक साथ उठाए जाते हैं, तो कांग्रेस के पास व्यापक राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने का अवसर हो सकता है।

हरीश रावत की सक्रियता कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा कर सकती है, लेकिन इसके साथ पार्टी के भीतर संभावित नेतृत्व और टिकट को लेकर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ सकती है। 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस को यह स्पष्ट करना होगा कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर पार्टी की सामूहिक रणनीति क्या होगी।

रावत पहले भी एकजुट होकर चुनाव लड़ने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। उनका स्पष्ट संदेश रहा है कि संगठन मजबूत होगा और नेता एक दिशा में काम करेंगे तभी भाजपा को चुनौती दी जा सकती है।

यदि यात्रा के मंचों पर सभी प्रमुख कांग्रेस नेता साथ दिखाई देते हैं और संगठन इसे सामूहिक कार्यक्रम के रूप में आगे बढ़ाता है, तो इसका सकारात्मक संदेश मतदाताओं तक जा सकता है। इसके विपरीत यदि यात्रा पार्टी के भीतर किसी एक धड़े की गतिविधि के रूप में देखी जाती है, तो इसका लाभ सीमित हो सकता है।

इस यात्रा की एक बड़ी राजनीतिक उपयोगिता यह भी हो सकती है कि कांग्रेस को 2027 से पहले जनता का वास्तविक मूड समझने का मौका मिले। चुनाव के समय अचानक जनता के बीच जाने की बजाय अभी से लगातार संवाद करने पर पार्टी को यह पता चल सकता है कि मतदाता किन मुद्दों को सबसे अधिक महत्व दे रहा है।

रावत की ओर से जनता की समस्याओं और सुझावों के आधार पर विजन डॉक्यूमेंट तैयार करने की बात इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यदि यह दस्तावेज केवल राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित न रहकर विधानसभा क्षेत्रवार समस्याओं और उनके समाधान का रोडमैप बनता है, तो कांग्रेस इसे चुनावी अभियान का प्रमुख आधार बना सकती है।

2027 में कितना लाभ मिल सकता है? सवाल का सीधा जवाब है—हाँ, हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा कांग्रेस को 2027 में राजनीतिक लाभ दिला सकती है, लेकिन यह लाभ अपने आप वोट में तब्दील नहीं होगा।

यात्रा से कांग्रेस को तीन तत्काल फायदे मिल सकते हैं—पुराने कार्यकर्ताओं में ऊर्जा, जनता के बीच पार्टी की मौजूदगी और चुनावी मुद्दों की पहचान। इसके अलावा हरीश रावत का व्यक्तिगत राजनीतिक अनुभव पार्टी को ग्रामीण और पारंपरिक कांग्रेस मतदाताओं से संवाद स्थापित करने में मदद कर सकता है।

लेकिन अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस इस जनसंवाद को संगठनात्मक अभियान में कितना बदलती है। यदि यात्रा समाप्त होने के बाद बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ती है, युवा और महिला मतदाताओं के लिए अलग रणनीति बनती है, स्थानीय नेतृत्व को जिम्मेदारी मिलती है और पार्टी एकजुट होकर चुनाव मैदान में उतरती है, तो इसका असर 2027 में दिखाई दे सकता है।

हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को केवल एक राजनीतिक यात्रा मानना शायद सही नहीं होगा। यह उनके लिए जनता से दोबारा सीधा संपर्क स्थापित करने और कांग्रेस के लिए 2027 की चुनावी जमीन को समझने का अवसर है। एक अक्टूबर से हरिद्वार क्षेत्र में यात्रा के दौरान मिली प्रतिक्रिया ने कम से कम इतना संकेत दिया है कि रावत अब भी कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय और प्रभावशाली चेहरा बने हुए हैं।

अब असली सवाल यह नहीं है कि हरीश रावत की यात्रा में कितनी भीड़ जुटती है, बल्कि यह है कि उस भीड़ में से कितने लोग 2027 के चुनाव में कांग्रेस के लिए वोट और संगठनात्मक समर्थन में बदलते हैं।

यदि रावत जनता की नब्ज पहचानने, पुराने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जोड़ने और पार्टी के भीतर विभिन्न नेताओं को एक मंच पर लाने में सफल रहते हैं, तो उनकी यह यात्रा कांग्रेस के लिए 2027 की चुनावी लड़ाई में महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी साबित हो सकती है। लेकिन यदि जनसंवाद केवल सभाओं और स्वागत कार्यक्रमों तक सीमित रहा, तो इसका चुनावी लाभ सीमित रह जाएगा।

इसलिए 2027 के लिहाज से हरीश रावत की यात्रा कांग्रेस के लिए एक अवसर जरूर है, लेकिन उस अवसर को चुनावी सफलता में बदलने की जिम्मेदारी पूरी कांग्रेस संगठन की होगी।

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