@विनोद भगत
बरसात का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है, लेकिन देश के तमाम शहरों में यही बारिश हर साल जलभराव की गंभीर समस्या लेकर आती है। कुछ घंटों की तेज बारिश के बाद सड़कें नदियों में बदल जाती हैं, कॉलोनियों और बाजारों में पानी भर जाता है, घरों और दुकानों में पानी घुस जाता है तथा कई जगह यातायात पूरी तरह ठप हो जाता है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक जलभराव अब केवल बारिश से जुड़ी अस्थायी परेशानी नहीं रह गया है, बल्कि यह शहरी नियोजन, जल निकासी व्यवस्था और पर्यावरणीय असंतुलन से जुड़ी बड़ी समस्या बन चुका है।
दरअसल, बारिश अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब शहर में गिरने वाले पानी को जमीन में समाने, नालियों में जाने और सुरक्षित रूप से प्राकृतिक जलस्रोतों तक पहुंचने का पर्याप्त रास्ता नहीं मिलता। प्राकृतिक रूप से किसी क्षेत्र में बारिश का पानी जमीन में रिसता है, छोटी धाराओं और नालों से होकर तालाबों, झीलों या नदियों तक पहुंचता है। लेकिन जब वही क्षेत्र कंक्रीट, डामर, टाइल्स और अन्य अभेद्य सतहों से ढक जाता है तो पानी के जमीन में जाने की क्षमता काफी कम हो जाती है। परिणामस्वरूप थोड़ी देर की तेज बारिश में भी बड़ी मात्रा में पानी सड़कों पर जमा होने लगता है।
शहरों में जलभराव का सबसे बड़ा कारण कमजोर या अपर्याप्त ड्रेनेज सिस्टम माना जा सकता है। अनेक शहरों में नालियां दशकों पहले की आबादी और बारिश के पुराने आंकड़ों को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं। समय के साथ आबादी बढ़ी, नई कॉलोनियां विकसित हुईं, सड़कें चौड़ी हुईं और बड़ी संख्या में खुले क्षेत्र निर्माण की चपेट में आ गए, लेकिन जल निकासी व्यवस्था उसी अनुपात में विकसित नहीं हुई। कई स्थानों पर नालियों की क्षमता इतनी कम है कि भारी बारिश के दौरान वे कुछ ही समय में भर जाती हैं।
नालियों की सफाई की कमी भी समस्या को गंभीर बनाती है। प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें, कचरा, मिट्टी, पत्तियां और निर्माण सामग्री नालियों में जमा होने से पानी का प्रवाह रुक जाता है। कई जगह नालियों के ऊपर अतिक्रमण या अवैध निर्माण के कारण सफाई करना मुश्किल हो जाता है। नतीजा यह होता है कि बारिश का पानी नाली में जाने के बजाय सड़क पर फैलने लगता है।
शहरों में तेजी से हो रहा अनियोजित निर्माण भी जलभराव का एक बड़ा कारण है। जिन जगहों पर कभी खाली जमीन, खेत, तालाब, पोखर या प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते हुआ करते थे, वहां मकान, दुकानें और सड़कें बन गईं। इससे बारिश के पानी के प्राकृतिक रास्ते बाधित हो गए। कई बार छोटी नदियों, बरसाती नालों और जलधाराओं के किनारे तक निर्माण हो जाने से पानी के बहाव का क्षेत्र सिकुड़ जाता है। ऐसी स्थिति में तेज बारिश होने पर पानी आसपास के इलाकों में फैलने लगता है।
तालाबों और पारंपरिक जलस्रोतों का खत्म होना भी शहरों के लिए गंभीर खतरा है। पुराने समय में शहरों और गांवों में तालाब, पोखर और अन्य जलाशय बारिश के पानी को रोकने का काम करते थे। इससे एक तरफ भूजल का पुनर्भरण होता था और दूसरी तरफ अचानक आने वाले अतिरिक्त पानी का दबाव कम होता था। जब इन जलस्रोतों पर कब्जे या निर्माण हो जाते हैं, तो बारिश के पानी को रोकने की प्राकृतिक क्षमता समाप्त होने लगती है।
शहरीकरण के साथ पेड़-पौधों और खुले मैदानों की संख्या कम होना भी जलभराव को बढ़ाता है। मिट्टी और हरियाली वाली जमीन बारिश के पानी को सोखती है, जबकि कंक्रीट की सतह पानी को तेजी से बहाकर निचले इलाकों की ओर भेजती है। इसलिए किसी शहर में जितना अधिक कंक्रीटीकरण होगा, भारी बारिश के दौरान उतनी ही तेजी से पानी जमा होने की संभावना बढ़ेगी।
जलवायु परिवर्तन ने भी इस चुनौती को अधिक गंभीर बना दिया है। कई क्षेत्रों में कम समय में बहुत अधिक बारिश होने की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसी स्थिति में पुरानी और सीमित क्षमता वाली जल निकासी व्यवस्था पर अचानक बहुत अधिक दबाव पड़ता है। इसलिए केवल पुरानी नालियों की सफाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि भविष्य की बारिश के बदलते पैटर्न को ध्यान में रखते हुए शहरी जल निकासी की योजना बनानी होगी।
जलभराव का असर केवल यातायात तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक पानी जमा रहने से सड़कें खराब होती हैं, गड्ढे बढ़ते हैं और वाहन दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। घरों और दुकानों में पानी घुसने से संपत्ति और सामान को नुकसान पहुंचता है। गंदा पानी जमा होने से मच्छरों और अन्य कीटों के पनपने का खतरा बढ़ता है तथा दूषित पानी के कारण कई तरह की बीमारियों का जोखिम भी पैदा हो सकता है। बिजली के उपकरणों और खुले विद्युत तंत्र के संपर्क में पानी आने पर दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ जाती है।
इस समस्या का स्थायी समाधान केवल बारिश शुरू होने से पहले नालियां साफ कराने तक सीमित नहीं हो सकता। सबसे पहले प्रत्येक शहर का विस्तृत ड्रेनेज मैप तैयार होना चाहिए। यह पता लगाना जरूरी है कि बारिश का पानी किस दिशा में बहता है, कहां जमा होता है, कौन से नाले किस क्षेत्र का पानी लेते हैं और उनकी क्षमता कितनी है। इसके आधार पर जल निकासी की ऐसी योजना बनाई जानी चाहिए जो पूरे शहर को एक समग्र प्रणाली के रूप में देखे।
पुराने नालों की क्षमता का वैज्ञानिक तरीके से आकलन किया जाना चाहिए और जहां जरूरत हो वहां उनका विस्तार किया जाना चाहिए। केवल मुख्य सड़कों पर बड़े नाले बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। मोहल्लों की छोटी नालियों, मुख्य नालों और प्राकृतिक जलधाराओं के बीच बेहतर कनेक्टिविटी जरूरी है। साथ ही नालियों की सफाई केवल मानसून से पहले होने वाली औपचारिक कार्रवाई न रहकर नियमित व्यवस्था का हिस्सा बननी चाहिए।
बारिश के पानी को सीधे नालियों में भेजने के बजाय उसका कुछ हिस्सा जमीन में पहुंचाना भी जरूरी है। इसके लिए वर्षा जल संचयन, रेन गार्डन, सोख्ता गड्ढे, परकोलेशन पिट और उपयुक्त स्थानों पर पारगम्य फुटपाथ जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं। बड़े सरकारी भवनों, स्कूलों, अस्पतालों, पार्किंग स्थलों और आवासीय परिसरों में वर्षा जल संचयन को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।
शहरों के पुराने तालाबों, झीलों और जलाशयों को बचाना और पुनर्जीवित करना भी बेहद जरूरी है। जहां संभव हो वहां अतिक्रमण हटाकर प्राकृतिक जलस्रोतों की जलधारण क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए। नए विकसित होने वाले क्षेत्रों में भी पर्याप्त जलाशय, हरित क्षेत्र और प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते सुरक्षित रखना जरूरी है।
निर्माण कार्यों के लिए भी स्पष्ट नियम होने चाहिए। किसी क्षेत्र में सड़क, कॉलोनी या व्यावसायिक परिसर विकसित करने से पहले यह देखा जाना चाहिए कि बारिश का पानी कहां जाएगा। भवन निर्माण की अनुमति देते समय केवल नक्शे और पार्किंग की व्यवस्था नहीं, बल्कि वर्षा जल प्रबंधन को भी अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
कचरा प्रबंधन में सुधार जलभराव रोकने का एक बेहद महत्वपूर्ण उपाय है। नागरिकों द्वारा नालियों में कचरा फेंकने की आदत पर रोक लगानी होगी और नगर निकायों को नियमित कचरा संग्रहण सुनिश्चित करना होगा। नालियों में प्लास्टिक और ठोस कचरा पहुंचने से रोकने के लिए संवेदनशील स्थानों पर प्रभावी कचरा नियंत्रण व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
प्रशासन को अत्यधिक बारिश की स्थिति के लिए पहले से आपदा प्रबंधन योजना भी तैयार रखनी चाहिए। जलभराव वाले संवेदनशील स्थानों की पहचान, पंपिंग व्यवस्था, आपातकालीन दल, यातायात डायवर्जन, बिजली विभाग और स्वास्थ्य विभाग के बीच समन्वय तथा नागरिकों को समय पर सूचना देने की व्यवस्था पहले से तैयार होनी चाहिए। आधुनिक तकनीक की मदद से जलस्तर और बारिश की स्थिति की निगरानी कर संवेदनशील इलाकों में समय रहते कार्रवाई की जा सकती है।
इस पूरी व्यवस्था में नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सड़क किनारे या नालियों में कचरा नहीं डालना, घरों के आसपास जल निकासी के रास्ते बंद नहीं करना, वर्षा जल संचयन अपनाना और स्थानीय स्तर पर जलस्रोतों के संरक्षण में सहयोग करना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हैं। किसी शहर की जल निकासी व्यवस्था कितनी भी अच्छी क्यों न हो, यदि नागरिक उसमें कचरा डालकर रास्ते बंद करते रहेंगे तो समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जलभराव को हर साल आने वाली प्राकृतिक मजबूरी मानकर स्वीकार करने के बजाय इसे शहरी नियोजन की समस्या के रूप में देखना होगा। बारिश को रोकना संभव नहीं है, लेकिन बारिश के पानी को सही दिशा देना, उसका कुछ हिस्सा जमीन में पहुंचाना, अतिरिक्त पानी को सुरक्षित स्थानों पर संग्रहित करना और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को पुनर्जीवित करना पूरी तरह संभव है।
भारत के शहरों को अब केवल सड़क, फ्लाईओवर और इमारतों के विकास पर ध्यान देने के बजाय ऐसे शहरों की योजना बनानी होगी जो भारी बारिश को भी संभाल सकें। यदि नालों का वैज्ञानिक नेटवर्क, तालाबों और जलाशयों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, पर्याप्त हरित क्षेत्र, बेहतर कचरा प्रबंधन और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों की सुरक्षा को शहरी विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए तो बरसात के दौरान होने वाले जलभराव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। आखिरकार समाधान बारिश को रोकने में नहीं, बल्कि उसके पानी को शहर के लिए संकट बनने से पहले सही जगह पहुंचाने में है।
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