@शब्द दूत ब्यूरो (17 अगस्त 2026)
देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर मतदाता सूचियों में दर्ज नामों की जांच के दौरान नए-नए मामले सामने आ रहे हैं। जानकारी के अनुसार प्रदेश के मैदानी और आसपास के जिलों में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम सामने आए हैं, जो उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में भी दर्ज बताए जा रहे हैं। इस स्थिति के सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या ऐसे मतदाताओं ने दोनों राज्यों में मतदाता के रूप में पंजीकृत रहते हुए अलग-अलग स्थानों पर मतदान भी किया है।
जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश से लगे उत्तराखंड के कई विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में ऐसे नाम सामने आए हैं, जिन्हें लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा या किसी अन्य सिंडिकेट की ओर से योजनाबद्ध तरीके से SIR के दौरान फॉर्म-7 के माध्यम से आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं, ताकि उसके समर्थक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटवाए जा सकें।
कांग्रेस नेताओं तिलकराज बेहड़, अनुपमा रावत और हाजी मोहम्मद काजी ने आरोप लगाया है कि एक वर्ग विशेष के मतदाताओं के नामों को निशाना बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए और किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम केवल राजनीतिक कारणों से नहीं हटाया जाना चाहिए।
वहीं भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि जिन मतदाताओं के संबंध में आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं, उनमें ऐसे नाम शामिल हैं जिनके बारे में मौके पर मौजूद नहीं होने या अन्य स्थान पर रहने की जानकारी सामने आई है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि निर्वाचन आयोग का काम साफ और पारदर्शी मतदाता सूची तैयार करना है तथा भाजपा के बूथ लेवल एजेंट इस प्रक्रिया में सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने और संदिग्ध मतदाताओं के नामों का संरक्षण करने का आरोप भी लगाया।
भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूची में फर्जी, डुप्लीकेट या अपात्र नाम हटाए जाने से चुनाव प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी होगी। पार्टी का कहना है कि यदि किसी मतदाता का नाम दो राज्यों की मतदाता सूचियों में दर्ज है तो निर्वाचन आयोग को उसकी जांच करने और नियमों के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार है।
जानकारी के अनुसार उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल जिलों की मतदाता सूचियों में ऐसे नाम सॉफ्टवेयर के माध्यम से चिन्हित किए गए हैं, जो कथित तौर पर उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची में भी दर्ज हैं। इनमें ऐसे लोग भी बताए जा रहे हैं जो वर्ष 2003 के बाद रोजगार की तलाश में उत्तराखंड आए और बाद में यहां रहने के कारण उनका नाम उत्तराखंड की मतदाता सूची में दर्ज हो गया, जबकि उनके मूल राज्य की मतदाता सूची में भी नाम बना रहा।
इसके अलावा बिहार और पश्चिम बंगाल से उत्तराखंड आए कुछ लोगों के नामों को लेकर भी जांच की बात सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि संबंधित राज्यों में चुनाव और SIR की प्रक्रिया के दौरान कुछ लोगों के नाम वहां की मतदाता सूचियों में भी दर्ज पाए गए हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश में SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी वहां कुछ ऐसे नाम बने रहने की जानकारी सामने आई है, जो उत्तराखंड की मतदाता सूची में भी दर्ज हैं।
ऐसे मामलों में निर्वाचन आयोग की ओर से संबंधित मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में कहां निवास करता है और उसका नाम किस स्थान की मतदाता सूची में होना चाहिए। जांच के बाद नियमों के अनुरूप डुप्लीकेट या अपात्र नामों को हटाने की कार्रवाई की जा सकती है।
उत्तराखंड में SIR के दौरान सामने आ रहे इन मामलों ने मतदाता सूचियों की शुद्धता और दो राज्यों में एक ही व्यक्ति के नाम दर्ज होने के मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। अब निर्वाचन आयोग की जांच और आगे होने वाली कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। आयोग का उद्देश्य यदि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मतदाता सूची को अपडेट कर डुप्लीकेट नामों को हटाना है, तो आने वाले दिनों में विभिन्न जिलों में ऐसे और मामलों की पहचान होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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