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पूरे देश में अब एक ही महिला मुख्यमंत्री—नारी शक्ति के दावों के बीच सियासी सच्चाई, दावे और हकीकत का आईना

@विनोद भगत

भारत में “नारी शक्ति” को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श पिछले कुछ वर्षों में काफी तेज हुआ है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम को महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया, लेकिन इसी दौर में यह तथ्य सामने आना कि पूरे देश में अब केवल एक ही महिला मुख्यमंत्री बची है, अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास है। यह स्थिति केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की जमीनी हकीकत को उजागर करती है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहां महिलाएं आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं, वहां सत्ता के शीर्ष पदों पर उनकी उपस्थिति नगण्य होना चिंताजनक है। एक समय ऐसा भी रहा जब कई राज्यों में महिला मुख्यमंत्री सक्रिय थीं और उन्होंने अपने नेतृत्व से प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया। लेकिन वर्तमान परिदृश्य यह संकेत देता है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी, विशेषकर शीर्ष नेतृत्व में, सीमित होती जा रही है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब देश में महिलाओं के सशक्तिकरण की बात इतनी जोर-शोर से हो रही है, तो फिर राजनीतिक दल उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में क्यों नहीं ला पा रहे हैं।

राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि टिकट वितरण से लेकर नेतृत्व के चयन तक, अधिकांश निर्णय पुरुष प्रधान सोच के तहत लिए जाते हैं। महिलाओं को अक्सर चुनावों में कम अवसर दिए जाते हैं, और जब दिए भी जाते हैं तो कई बार ऐसी सीटों पर जहां जीत की संभावना कम होती है। यह धारणा कि महिलाएं चुनावी राजनीति में पुरुषों की तुलना में कम प्रभावी होती हैं, अब भी कई दलों के भीतर गहराई से मौजूद है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत कई उदाहरण पेश कर चुकी है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन इसका प्रभाव तत्काल देखने को नहीं मिलेगा। परिसीमन और जनगणना जैसी प्रक्रियाओं के बाद ही यह पूरी तरह लागू हो सकेगा। ऐसे में वर्तमान राजनीतिक स्थिति यह बताती है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक राजनीतिक दल अपनी आंतरिक संरचना और सोच में बदलाव नहीं लाते, तब तक महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सीमित ही रहेगी।

सामाजिक स्तर पर भी कई चुनौतियां हैं जो महिलाओं के राजनीतिक करियर को प्रभावित करती हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियां, संसाधनों की कमी और समाज की पारंपरिक सोच महिलाओं के आगे बढ़ने में बाधा बनती हैं। हालांकि शिक्षा और जागरूकता के बढ़ने के साथ इन बाधाओं में कमी आई है, लेकिन राजनीति जैसे क्षेत्र में अभी भी यह अंतर साफ दिखाई देता है।

आज की स्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि “नारी शक्ति” का नारा और वास्तविकता के बीच एक बड़ा अंतर मौजूद है। यदि वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाना है, तो उन्हें केवल प्रतीकात्मक स्थान देने के बजाय सत्ता के केंद्र में लाना होगा। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे महिलाओं को अधिक अवसर दें, उन्हें निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में आगे बढ़ाएं और उनके नेतृत्व पर भरोसा जताएं।

अंततः, यह सवाल केवल एक महिला मुख्यमंत्री के होने या न होने का नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतिबिंब है जो आज भी भारतीय राजनीति को संचालित कर रही है। जब तक इस सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक नारी सशक्तिकरण के दावे अधूरे ही रहेंगे और “नारी शक्ति” का नारा एक आदर्श से अधिक कुछ नहीं बन पाएगा।

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