@शब्द दूत ब्यूरो (04 मई 2026)
देहरादून। उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। राज्य सरकार द्वारा लागू की जा रही नई व्यवस्था के चलते मदरसा बोर्ड के तहत संचालित करीब 452 मदरसों का भविष्य अधर में नजर आ रहा है। वर्तमान मान्यता 30 जून को समाप्त होने जा रही है, जिसके बाद नई शर्तों के तहत ही मदरसों का संचालन संभव होगा।
सरकार के फैसले के अनुसार 1 जुलाई से मदरसा बोर्ड की जगह उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण कार्यभार संभालेगा। अब मदरसों को जिला विद्यालय शिक्षा समिति या हाईस्कूल स्तर के लिए उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी। इसके साथ ही एनसीईआरटी पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा और शिक्षा व्यवस्था को तय मानकों के अनुरूप ढालना अनिवार्य होगा।
नई व्यवस्था के तहत मदरसों के लिए जमीन, भवन, प्रशिक्षित शिक्षक और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सख्त मानक निर्धारित किए गए हैं। शहरी क्षेत्रों में आधा एकड़ और ग्रामीण क्षेत्रों में एक एकड़ जमीन, कक्षा 1 से 8 तक के लिए कम से कम 5-8 कमरे, डीएलएड/बीएड व टीईटी पास शिक्षक, साथ ही लाइब्रेरी, शौचालय, पेयजल और खेल मैदान जैसी सुविधाएं अनिवार्य की गई हैं।
इन्हीं सख्त मानकों को लेकर अधिकांश मदरसा संचालकों में चिंता बढ़ गई है। बताया जा रहा है कि करीब 99 प्रतिशत मदरसे वर्तमान में छोटे भवनों, मस्जिदों या निजी परिसरों में संचालित हो रहे हैं, जहां इन मानकों को पूरा करना मुश्किल है। ऐसे में बड़ी संख्या में मदरसों पर ताला लगने की आशंका जताई जा रही है। इन मदरसों में लगभग 46 हजार छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
मदरसा संचालकों की प्रमुख संस्था जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। संगठन का आरोप है कि सरकार धार्मिक शिक्षा में हस्तक्षेप कर रही है और मदरसों को निशाना बनाया जा रहा है।
जमीयत के प्रदेश पदाधिकारियों का कहना है कि मदरसों में दीनी शिक्षा के साथ-साथ हिंदी, गणित और विज्ञान भी पढ़ाया जाता है। उनका तर्क है कि सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा दी जा रही है और नई शर्तें व्यावहारिक नहीं हैं।
वहीं सरकार का कहना है कि यह कदम अल्पसंख्यक शिक्षा में सुधार और पारदर्शिता लाने के लिए उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट किया है कि सभी बच्चों को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, इसके लिए यह व्यवस्था बनाई गई है। उन्होंने यह भी कहा कि मदरसों में पढ़ाई की गुणवत्ता और बच्चों की सुरक्षा को लेकर शिकायतें मिली हैं, जिन्हें ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है।
अल्पसंख्यक मामलों के अधिकारियों के अनुसार नया प्राधिकरण सभी अल्पसंख्यक समुदायों—सिख, बौद्ध, पारसी और ईसाई—को शामिल करते हुए शिक्षा के लिए एक समान ढांचा तैयार करेगा।
फिलहाल, राज्य में मदरसा शिक्षा को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एक ओर सरकार सुधार की बात कर रही है, तो दूसरी ओर मदरसा संचालक इसे अपने अस्तित्व का संकट मान रहे हैं। आगामी समय में हाईकोर्ट का फैसला इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा।
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