@शब्द दूत ब्यूरो (28 अप्रैल 2026)
काशीपुर । डी-बाली ग्रुप की डायरेक्टर श्रीमती उर्वशी दत्त बाली समाज के उत्थान के वास्तविक मूल्यों को अपनाने के लिए निरंतर प्रेरित करती रही हैं। वे कुरीतियों से दूर रहने और सादगीपूर्ण जीवन जीने पर जोर देती हैं। उनका कहना है कि आज की दिखावे वाली जीवनशैली हमें भटकाव की ओर ले जा रही है, इसलिए इससे दूरी बनाना आवश्यक है।
उर्वशी दत्त बाली के अनुसार, वर्तमान समय में विवाह समारोहों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक रूप से विवाह एक पवित्र संस्कार माना जाता रहा है, लेकिन अब इसमें भव्यता और दिखावे का प्रभाव बढ़ गया है, जो समाज के लिए चिंताजनक है। महंगे वेन्यू, बड़े आयोजन और अनावश्यक खर्चों ने विवाह को एक सामाजिक प्रतिस्पर्धा का रूप दे दिया है। ऐसे में आवश्यकता है कि हम विवाह के मूल उद्देश्य और उसकी गरिमा पर पुनर्विचार करें।
वे मानती हैं कि विवाह केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसे सादगी, श्रद्धा और पारिवारिक मूल्यों के साथ सम्पन्न किया जाना चाहिए। दुनिया के कई समाजों में आज भी धार्मिक स्थलों—जैसे गुरुद्वारे, चर्च आदि—में सादगीपूर्ण और गरिमामय विवाह की परंपरा कायम है, जहाँ केंद्र में केवल दो व्यक्तियों का पवित्र मिलन होता है।
इसी संदर्भ में वे सुझाव देती हैं कि भारत में भी मंदिरों में विवाह की परंपरा को पुनः प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। मंदिरों का शांत, आध्यात्मिक और पवित्र वातावरण विवाह जैसे संस्कार के लिए अत्यंत उपयुक्त होता है। यहाँ दिखावे के बजाय श्रद्धा, संस्कार और आत्मिक जुड़ाव को महत्व दिया जाता है।
मंदिर में विवाह का अर्थ यह नहीं है कि उसमें खुशी या उत्साह की कमी होती है, बल्कि यह सादगी के साथ गहराई और आत्मिक संतोष को जोड़ता है। सीमित मेहमानों के बीच सम्पन्न विवाह अधिक आत्मीय, व्यक्तिगत और यादगार बनता है। साथ ही, इससे होने वाली आर्थिक बचत को परिवार के भविष्य, बच्चों की शिक्षा या सामाजिक कार्यों में उपयोग किया जा सकता है।
उर्वशी दत्त बाली का मानना है कि विवाह को लेकर समाज में सकारात्मक बदलाव की आवश्यकता है। जब लोग स्वयं दिखावे की होड़ से बाहर निकलकर संस्कारों और जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देंगे, तभी एक संतुलित और प्रेरणादायक परंपरा विकसित हो सकेगी।
अंततः, विवाह की वास्तविक सुंदरता उसके भव्य आयोजन में नहीं, बल्कि उसमें निहित भावनाओं, मूल्यों और जीवनभर निभाए जाने वाले संकल्प में होती है। यदि इस सोच को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो यह न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी सिद्ध होगा, बल्कि समाज को भी एक स्वस्थ और सकारात्मक दिशा प्रदान करेगा।
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