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महुआ मोइत्रा बनाम संसद का आहत पुरुषार्थ@राकेश अचल

राकेश अचल,
वरिष्ठ पत्रकार जाने माने आलोचक

पश्चिम बंगाल के श्रीकृष्णनगर से तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा का संसद से बाहर किया जाना संसद के आहत पुरुषार्थ का अब तक का सबसे बड़ा उदाहरण है । महुआ की संसद सदस्य्ता रद्द किये जाने से लोकतंत्र पर कोई पहाड़ नहीं टूटने वाला किन्तु सत्तारूढ़ दल की इस कार्रवाई ने एक बार फिर बिखरे हुए विपक्ष को एकजुट कर दिया है। यानि महुआ मोइत्रा अब कदाचरण की नहीं बल्कि सत्ता की प्रताड़ना की प्रतीक बन गयीं है । उनके ऊपर संसद में नगदी लेकर सवाल पूछने का आरोप था।

पचास साल की महुआ अमेरिका से अर्थशास्त्र और गणित में स्नातक है। राजनीति में आने से पहले बैंकर थी । राजनीति में उनका तजुर्बा भी संसद के रूप में ज्यादा नहीं है । वे दूसरी बार संसद के लिए चुनी गयीं लेकिन उन्होंने इन सात सालों में भी अपनी मेधा से सत्तारूढ़ दल के छक्के छुड़ाने में महारत हासिल करने के साथ ही एक अलग पहचान भी बनाई ।उनके डीएनए में कांग्रेस है।युवा कांग्रेस में शामिल होने के बाद वे “आम आदमी का सिपाही” परियोजना में राहुल गांधी की भरोसेमंदों में से एक थी। 2010 में वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुईं।उन्होंने अपने धारदार प्रश्नों से सत्तारूढ़ दल के पुरुषार्थ को इतना ज्यादा आहत किया कि अंतत : उन्हें संसद ने ध्वनिमत से संसद से बाहर कर दिया। लेकिन वे जब संसद से बाहर आयीं तो उनके साथ समूचा विपक्ष था।

महुआ मोइत्रा सांसदी गंवाने वाली अकेली या पहली सांसद नहीं है। उनसे पहले दर्जनों संसद अपनी सांसदीगंवा चुके है। कांग्रेस के शासन में भी और भाजपा के शासन में भी । लेकिन किसी की सांसदी दलबदल की वजह से छीन गयी तो किसी की सांसदी आपराधिक मामलों में दो साल से ज्यादा की सजा मिलने के बाद। लेकिन महुआ की सांसदी जिस तरीके से छीनी गयी है उसकी वजह से वे समूचे विपक्ष और देश की सहानुभूति की पात्र बन गयीं है। महुआ मोइत्रा पर एक कारोबारी के साथ अपना आधिकारिक ईमेल आईडी पासवर्ड शेयर करने का आरोप था। उनके खिलाफ शिकायत करने वाले भाजपा के संसद निशिकांत दुबे थे । उनके खिलाफ मामले की जांच करने वाली संसद की मर्यादा से के सदस्य भाजपा के थे और उन्हें संसद की सदस्य्ता के लिए अपात्र करने वाले सदस्य भी सत्तारूढ़ दल के थे।

संसद की सदस्यता किसी को उपहार में नहीं मिलती । संसद की सदस्यता पाने केलिए जनादेश हासिल करना पड़ता है इसलिए यदि किसी की सदस्यता छीनी जाती है तो ये उस जनादेश की अवमानना होती है जो उसे जनता ने दिया था ,लेकिन संसद शायद ऐसा नहीं मानती और जिसे सत्ता अपनी आँख की किरकिरी मानती है उसे महुआ मोइत्रा बना देती है। महुआ मात्र एक सांसद थीं लेकिन राहुल गांधी तो एक राष्ट्रीय दल के सर्वमान्य नेता थे, सत्तारूढ़ दल ने उनकी सदस्यता भी रद्द की ,गनीमत है कि वे अदालत के हस्तक्षेप से अपनी सदस्य्ता बहाल करने में कामयाब हुए। मुमकिन है कि महुआ भी अदालत जाएँ तो उनकी भी सदस्यता बहाल हो जाये। सत्तारूढ़ दल नहीं चाहता की महुआ मोइत्रा जैसी कोई वाचाल,प्रश्नाकुल और गणित समझने वाली कोई महिला संसद की सदस्य हो।

आपको याद दिला दूँ कि महुआ पिछले सात साल से सत्तारूढ़ भाजपा को परेशानी में डालने में सबसे आगे थी । उन्होंने अनेक बहसों में शामिल होकर प्रधानमंत्री से लेकर उनके तमाम सेनापतियों के लत्ते लिए ,निरुत्तर किया। भाजपा जब मैदान में तृणमूल कांग्रेस का कुछ नहीं बिगाड़ पायी तो उस्सने महुआ को निशाने पर ले लिया । भाजपा का असल गुस्सा तो बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी पर था। ममता ने भाजपा को बंगाल में हराया, प्रधानमंत्री की सभा का बहिष्कार किया और भाजपा के एजेंट बनकर काम करने वाले तत्कालीन राज्यपाल जयदीप धनकड़ को विफल किया। संसद के बाहर ममता और संसद के भीतर महुआ भाजपा के लिए मुसीबत बन गयी।

आपको याद दिला दूँ कि सवाल के बदले माल [नगदी ] लेने का सबसे पहला मामला 2005 में उजागर हुआ था । उस समय जिन 11 सांसदों की सदस्य्ता संसद की मर्यादा कमेटी की रिपोर्ट पर छीनी गयी थी,उसके ऊपर बाकायदा बहस हुई थी ।दोषी पाए गए 11 में से सर्वाधिक 6 सदस्य भाजपा के थे । मतदान हुआ था,लेकिन महुआ के मामले में बहस करने के बजाय सत्तारूढ़ दल से मेजें बजवाई गयीं और उसी ध्वनिमत के सहारे महुआ की सदस्य्ता छीनने का निर्णय कर लिया गया। ये संसद में बहुमत के दुरूपयोग का दूसरा बड़ा उदाहरण था । इसी तरह सरकार ने राजयसभा में अपने दो विधेयक विपक्ष के विरोध के बावजूद ध्वनिमत से पारित कराये थे। उस समय राज्यसभा के उप सभापति हरवंश के लत्ते लिए गए थे। बाद में हरवंश को इसका ईनाम भी मिला।

लोकसभा की इस कार्रवाई से महुआ पूर्व संसद नहीं बल्कि अभूतपूर्व सांसद बन गयीं है। वे अगला आम चुनाव लड़ पाएं या नहीं ,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन उनकी सदस्य्ता छीनकर भाजपा ने देश में नारी शक्ति वंदना के अपने नाटक का पर्दा अपने हाथ से हटा दिया है। जाहिर कर दिया है की भाजपा को न महुआ मोइत्रा चाहिए, न उमा भारती और न बसुंधरा राजे । भाजपा ज्यादा से ज्यादा श्रीमती द्रोपदी मुर्मू को बर्दास्त कर सकती है क्योंकि वे बोलती नहीं हैं। देश में 1988 से 2023 तक 43 सांसदों की सदस्य्ता विभिन्न कारणों से छीनी गयी ,लेकिन किसी मामले में संसद की इतनी बदनामी नहीं हुई जितनी की महुआ मोइत्रा के मामले में हो रही है। महुआ मोइत्रा अब अकेली नहीं है । सत्तारूढ़ भाजपा ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को पराजित कर जिस आईएनडीआईए [इंडिया] गठबंधन को कमजोर कर दिया था वो ही इंडिया गठबंधन महुआ मोइत्रा प्रकरण के बाद एक बार फिर से एकजुट हो गया है। मुझे लगता है कि भाजपा अपने अश्वमेघ के खुरों में खुद ही कीलें खुद ढीली कर रही है। मुझे इस बात की आशंका है कि महुआ के अपमान का श्राप भाजपा के लिए भारी न पड़ जाये। लेकिन भाजपा शायद नारी शक्ति के शाप से डरती नहीं है। अपने मन की करती है। पूरे देश की तरह मेरी सहानुभूति भी महुआ मोइत्रा के साथ है। मैं उम्मीद करता हूँ की अदालत के हस्तक्षेप से महुआ के साथ न्याय हो सकेगा।
चलते-चलते
कभी सीनियर नहीं बन पाए जूनियर मेहमूद

जूनियर मेहमूद हमारी मनोरंजन की दुनिया से हमेशा के लिए रुखसत हो गए हैं। जूनियर मेहमूद यानि मोहम्मद नईम हिंदुस्तानी फिल्मों में जूनियर बनकर आये थे और लगभग चार दशक तक अपने दर्शकों को हंसाने वाले नईम मियाँ जूनियर बने ही दुनिया से चले ग। वे ताउम्र सीनियर नहीं बने। जूनियर मेहमूद को कैंसर अपने साथ ले गया। फ़िल्मी दुनिया में जब खुद मेहमूद हास्यावतार के रूप में मौजूद थे तब किसी का जूनियर मेहमूद बनकर फिल्मों में आना और लगातार चार दशकों तक मजबूती के साथ हर छोटे बड़े अभिनेता के साथ काम करना आसान नहीं होता ,लेकिन जूनियर मेहमूद ने इसे आसान कर दिखाया। विनम्र श्रृद्धांजलि
@ राकेश अचल
achalrakesh1959@gmail.com

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