फिलहाल दोनों एसडीएम का तबादला कर दिया गया है, लेकिन यह मामला यहीं समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा। प्राथमिकी की विवेचना और विभागीय जांच जारी है।
@शब्द दूत ब्यूरो (02 नवंबर 2026)
पीलीभीत। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में मतदाता सूची में कथित बड़े फर्जीवाड़े के मामले में शासन ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई की है। 10,470 मतदाताओं के नाम अथवा उनके पिता के नाम में बदलाव किए जाने के मामले में आरोपों से घिरे दोनों उपजिलाधिकारियों (एसडीएम) का तबादला कर उन्हें लखनऊ संबद्ध कर दिया गया है। इस मामले में पहले ही दोनों अधिकारियों और एक कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई जा चुकी है। वहीं, अब जांच का दायरा बढ़ाते हुए पांच सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (एईआरओ) और अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी जांची जा रही है।
जानकारी के अनुसार, पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का मामला सामने आया था। जांच में पता चला कि मतदाता सूची में संशोधन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म-8 के माध्यम से हजारों मतदाताओं के विवरण में बदलाव किए गए। आरोप है कि कई मतदाताओं के नाम और उनके पिता के नाम तक बदल दिए गए, जबकि इन संशोधनों के समर्थन में जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे।
इस मामले ने उस समय गंभीर रूप ले लिया जब मतदाताओं के पहचान संबंधी विवरण में बदलाव की शिकायतें सामने आने लगीं। जांच के दौरान नुरुद्दीन का नाम बदलकर इलियास, कादिर खान का नाम अकरम और तनवीर का नाम हम्जा किए जाने जैसे उदाहरण सामने आए। इससे मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
प्रारंभिक जांच में सामने आया कि वोटर रजिस्ट्रेशन सेंटर (वीआरसी) में तैनात कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार ने फॉर्म-8 के माध्यम से मतदाताओं के विवरण में बदलाव किए थे। इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में आई। निर्वाचन आयोग के निर्देश पर जिला प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए 21 अक्टूबर को अमरिया के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी एवं एसडीएम हेमंत चौधरी, पूर्व में तैनात रहे एसडीएम मयंक गोस्वामी और कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार को उनके पदों से हटा दिया था।
इसके बाद 22 अक्टूबर को दोनों एसडीएम और कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ शहर कोतवाली में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। कंप्यूटर ऑपरेटर की सेवाएं भी समाप्त कर दी गई थीं। मामले में सरकारी कामकाज में लापरवाही, धोखाधड़ी और लोक सेवक के रूप में कर्तव्य के उल्लंघन से संबंधित आरोपों की जांच की जा रही है।
अब शासन ने दोनों एसडीएम का लखनऊ तबादला कर दिया है। जारी प्रशासनिक फेरबदल के तहत एसडीएम हेमंत कुमार चौधरी को उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में विशेष कार्याधिकारी बनाया गया है। वहीं, एसडीएम मयंक गोस्वामी को चकबंदी मुख्यालय लखनऊ में बंदोबस्त अधिकारी (चकबंदी) के पद पर संबद्ध किया गया है।
इन दोनों अधिकारियों के स्थान पर पीलीभीत में नए अधिकारियों की तैनाती भी की गई है। उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में विशेष कार्याधिकारी रहे मांधाता सिंह को एसडीएम पीलीभीत बनाया गया है। वहीं, चकबंदी मुख्यालय लखनऊ में बंदोबस्त अधिकारी के पद पर तैनात अजय कुमार को भी एसडीएम पीलीभीत की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच अब केवल दो एसडीएम और कंप्यूटर ऑपरेटर तक सीमित नहीं रह गई है। पांच सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है। इनके कामकाज और मतदाता सूची में किए गए संशोधनों की प्रक्रिया की पड़ताल की जा रही है। प्रशासनिक स्तर पर यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के विवरण में बदलाव किस प्रक्रिया के तहत किए गए और इसमें किन-किन अधिकारियों तथा कर्मचारियों की भूमिका रही।
इस मामले में निर्वाचन आयोग की कार्रवाई के बाद उत्तर प्रदेश की चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया भी चर्चा में आ गई है। मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार होती है। इसमें किसी मतदाता का नाम, पिता का नाम अथवा अन्य पहचान संबंधी विवरण गलत तरीके से बदलना उसके मतदान के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में 10,470 मतदाताओं से जुड़ा यह मामला प्रशासनिक लापरवाही से कहीं अधिक गंभीर माना जा रहा है।
फिलहाल दोनों एसडीएम का तबादला कर दिया गया है, लेकिन यह मामला यहीं समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा। प्राथमिकी की विवेचना और विभागीय जांच जारी है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच में पांच एईआरओ और अन्य कर्मचारियों की भूमिका को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं तथा मतदाता सूची में हुई कथित गड़बड़ी के लिए अंतिम रूप से किन अधिकारियों की जिम्मेदारी निर्धारित की जाती है।
सवाल यह भी है कि यदि मतदाता सूची में हजारों लोगों की पहचान से जुड़े विवरण बदल दिए गए, तो इतनी बड़ी गड़बड़ी संबंधित अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था से कैसे बचती रही? इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों पर प्रभावी कार्रवाई लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास के लिए बेहद जरूरी है।
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