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मौजूदा समाज का मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी पीड़ा का सच उजागर करती कहानी :”पिता के हिस्से के दस मिनट”

@विनोद भगत

राघव और मोहन बचपन के मित्र थे। दोनों ने साथ पढ़ाई की थी। समय के साथ दोनों अपने-अपने परिवार और कामकाज में व्यस्त हो गए। दूर अलग-अलग शहरों में दोनों की नौकरी लगी और उनका संपर्क लगभग टूट सा गया।

इधर समय बदला और मोहन का तबादला भी उसी शहर में हो गया जहां राघव रहता था। पुरानी मित्रता फिर जी उठी। पर इस बीच कुछ ऐसा हुआ कि दोनों की मित्रता और अधिक प्रगाढ़ हो गयी।

राघव के घर में उसकी पत्नी सीमा और अस्सी वर्षीय पिता हरिदास जी रहते थे। हरिदास जी अब उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ उन्हें दवा से अधिक किसी अपने के साथ की ज़रूरत थी। दिनभर बरामदे की कुर्सी पर बैठकर वे राह चलते लोगों को देखते रहते।

एक दिन जब मोहन  राघव के घर आया। राघव के पिता धुंधली दृष्टि से मोहन को राघव समझ बैठे। उनकी धुंधली आंखों में चमक सी आ गयी। हरिदास जी बोले, “राघव, आ गये बेटा।”,

मोहन ने उनकी आवाज में दर्द और पीड़ा को भांप लिया। मोहन को उनमे अपने पिता की झलक नजर आई। उसकी आंखों के सामने अपने पिता का चेहरा तैर गया।

सीधे हरिदास जी के पास जाकर उनके चरण छुए और बोला, “कैसे हैं बाबूजी?”

हरिदास जी ने गौर से देखा। तुम मोहन हो ना। मैं भी सोच रहा था कि आज राघव आज सीधे मेरे पास क्यों और कैसे आ गया? वर्षों पहले जब राघव छोटा था तब मैं जैसे ही आफिस से आता था तो राघव दौड़ कर मेरे पास आ जाया करता था। पर आज….. ।”इससे आगे हरिदास जी कुछ कह नहीं पाये उनका गला रुंध गया।

मोहन ने जो महसूस किया उसने भीतर तक मोहन के ह्रदय को विदीर्ण कर दिया। वह समझ गया कि परिवार होते हुये भी हरिदास जी अकेलेपन के दंश को झेल रहे हैं।

वह उनके पास बैठ गया और उसने बतियाने लगा। उस दिन दोनों घंटों बातें करते रहे। जाते-जाते मोहन उनके लिए फल रख गया।

इसके बाद उसका रोज़ आना शुरू हो गया।कभी वह गरम समोसे लाता, कभी जलेबी, कभी हरिदास जी की पसंद की मिठाई । कभी उनके साथ पुरानी तस्वीरें देखता, तो कभी उनका हाथ पकड़कर पार्क तक टहलाने ले जाता।

हरिदास जी की बुझी हुई आँखों में फिर चमक लौट आई।लेकिन दूसरी ओर राघव और उसकी पत्नी सीमा परेशान होने लगे।

सीमा बोली, “अच्छे इंसान हैं, लेकिन रोज़-रोज़ कई घंटे बैठे रहते हैं। अब यह ठीक नहीं लग रहा।”राघव भी यही सोचने लगा।

एक शाम जब मोहन लौट रहा था, तो गली के मोड़ पर राघव ने उसे रोक लिया।

“यार, बुरा मत मानना… लेकिन तुम्हारा रोज़ आना अब हमें असुविधा देने लगा है। आखिर कोई भी रोज़-रोज़ किसी के घर क्यों आता है?”

मोहन कुछ पल चुप रहा। फिर उसकी आँखें भर आईं।धीरे से बोला, “तुम नहीं समझोगे, दोस्त…”

उसकी आवाज़ काँपने लगी। “मैं तुम्हारे पिता के पास नहीं आता… मैं तो अपने पिता को खोजने आता हूँ…।”

इतना कहते ही मोहन की आँखों के सामने वर्षों पुरानी यादें तैरने लगीं और वह विचारमग्न हो गया।

करीब दस वर्ष पहले…मोहन एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता था। सुबह जल्दी निकल जाता और देर रात घर लौटता।उसके पिता रामस्वरूप जी हर शाम दरवाज़े पर बैठकर उसका इंतज़ार करते।

जैसे ही मोहन घर आता, पिता मुस्कुराकर कहते, “बेटा, आज पाँच मिनट बैठ जा। बड़ी देर से तेरी राह देख रहा था।”मोहन जूते उतारते-उतारते कह देता, “पिताजी, बहुत थक गया हूँ। कल बैठेंगे।”और अपने कमरे में चला जाता।यह “कल” रोज़ आता, लेकिन पाँच मिनट कभी नहीं आते।

एक रविवार पिता ने कहा, “चल बेटा, मंदिर तक साथ चलते हैं। बहुत दिनों से तेरे साथ घूमना नहीं हुआ।”मोहन मोबाइल देखते हुए बोला, “आज दोस्तों के साथ मीटिंग है। फिर कभी चलेंगे।”

पिता मुस्कुरा दिए।उन्होंने कुछ नहीं कहा।कुछ दिन बाद पिता ने पुराना फोटो एलबम निकाला।

“देख, यह तेरे बचपन की तस्वीरें हैं।”

मोहन ने बिना देखे कहा, “पिताजी, अभी बहुत जरूरी ईमेल भेजना है।”पिता चुपचाप एलबम बंद करके अलमारी में रख आए।

एक रात रामस्वरूप जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। मोहन उन्हें अस्पताल तो ले गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

पिता की मुट्ठी में एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ था। मोहन ने उसे खोला।

उसमें काँपते हाथों से लिखा था—“बेटा, जब भी तेरे पास समय मिले, मेरे साथ दस मिनट बैठ जाना। मुझे तुझसे कोई काम नहीं, बस तेरी बातें सुननी हैं।”

कागज़ आँसुओं से भीग गया। मोहन ज़ोर-ज़ोर से रोता रहा।

वह बार-बार खुद से कहता रहा—”पिताजी… आपने तो सिर्फ़ दस मिनट माँगे थे… और मैं वह भी नहीं दे पाया..।”उस दिन से उसके भीतर अपराधबोध का ऐसा तूफ़ान उठा जो वर्षों बाद भी शांत नहीं हुआ।

मोहन की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। राघव उसे हिलाने लगा। मोहन”, क्या सोचने लगे हो? कहाँ खो गये?

मोहन भावुक होकर राघव से बोला,तुम शायद अभी न समझ पाओ लेकिन एक वक्त ऐसा आयेगा जब तुम्हें अह्सास होगा। और सुनो दोस्त जब तुम्हारे बाबूजी के साथ बैठता हूँ तो लगता है जैसे भगवान ने मुझे एक और मौका दिया है। मैं उन्हें फल इसलिए नहीं खिलाता कि उन्हें ज़रूरत है… मैं अपने पिता से माफ़ी माँगता हूँ। मैं उनकी हँसी में अपने पिता की मुस्कान ढूँढ़ता हूँ। मैं उनके साथ बैठकर अपने बीते हुए कल का प्रायश्चित करता हूँ।”

राघव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे याद आया कि पिछले कई महीनों से उसने भी अपने पिता के साथ बैठकर ढंग से बात नहीं की थी। वह मोहन को छोड़ कर दौड़ते हुए घर के भीतर गया।

हरिदास जी बरामदे में अकेले बैठे थे। राघव उनके पैरों के पास बैठ गया। उनका हाथ अपने हाथों में लेकर बोला,”बाबूजी… आज कहीं नहीं जाना… आज आपकी सारी कहानियाँ सुनूँगा।”हरिदास जी की आँखें भर आईं।

उसी समय मोहन भी भीतर आया। राघव ने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया। “आज से यह घर तुम्हारा भी है… और बाबूजी सिर्फ़ मेरे नहीं, हमारे हैं।”बरामदे में बैठे तीनों की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे पछतावे के नहीं, रिश्तों के पुनर्जन्म के आँसू थे।

मोहन और राघव जैसे दोस्त इस समाज में हमेशा रहते आये हैं। हाँ, पहले इनकी संख्या कम हुआ करती थी पर आज जैसे जैसे हम उन्नति करते आ रहे हैं मोहन और राघव की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

 

 

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