@शब्द दूत ब्यूरो (17 जुलाई 2026)
लद्दाख के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में वर्ष 1984 एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। आज जब पर्यावरणविद् और शिक्षा सुधारक सोमन (सोनम) वांगचुक के आंदोलनों की चर्चा होती है, तब बहुत कम लोगों को यह ज्ञात है कि उनके पिता सोनम वांग्याल ने भी चार दशक पहले लद्दाख के लोगों के अधिकारों के लिए एक ऐतिहासिक संघर्ष किया था।
उनका प्रमुख उद्देश्य था कि लद्दाख के मूल निवासियों को अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe – ST) का दर्जा मिले, जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक अधिकार और विकास संबंधी हितों की रक्षा हो सके।
उस समय लद्दाख जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा था। भौगोलिक रूप से दुर्गम, सीमावर्ती और अत्यंत कम आबादी वाले इस क्षेत्र के लोगों का मानना था कि उनकी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ देश के अन्य आदिवासी क्षेत्रों से मेल खाती हैं। इसके बावजूद उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त नहीं था।
इसी मांग को लेकर 1984 में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांग्याल ने लेह में क्रमिक भूख हड़ताल शुरू की। आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था, लेकिन लद्दाख में इसका व्यापक जनसमर्थन मिला। लोगों का दबाव बढ़ने लगा और यह मामला सीधे केंद्र सरकार तक पहुँच गया।
आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वयं लेह पहुँचीं। उन्होंने सोनम वांग्याल से मुलाकात की, उनकी मांगों को विस्तार से सुना और आश्वासन दिया कि लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने की दिशा में केंद्र सरकार आवश्यक कदम उठाएगी। इसके बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें जूस पिलाकर उनका अनशन समाप्त कराया। यह घटना आज भी लद्दाख के राजनीतिक इतिहास में संवाद और लोकतांत्रिक समाधान के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में याद की जाती है। इस मुलाकात का एक ऐतिहासिक छायाचित्र भी समय-समय पर सार्वजनिक चर्चाओं में सामने आता रहा है।
हालाँकि, उसी वर्ष 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। उनके निधन के कारण इस विषय पर तत्काल कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका। बाद में केंद्र सरकार और विभिन्न राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से लद्दाख की अनुसूचित जनजाति संबंधी मांग आगे बढ़ी।
अंततः वर्ष 1989 में लद्दाख के प्रमुख समुदायों—विशेषकर बौद्ध, बाल्टी, बेडा, ब्रोकपा, चांगपा, ड्रोकपा, गर्रा तथा अन्य पारंपरिक जनजातीय समूहों—को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान किया गया। यह उपलब्धि कई वर्षों के जनसंघर्ष, सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक प्रयासों का परिणाम थी।
सोनम वांग्याल का यह आंदोलन केवल आरक्षण प्राप्त करने का संघर्ष नहीं था, बल्कि लद्दाख की सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक जीवन शैली और सीमावर्ती समाज के अधिकारों की रक्षा का आंदोलन भी था। इसी कारण 1984 का यह अनशन लद्दाख के इतिहास में विशेष स्थान रखता है।
आज जब उनके पुत्र सोमन (सोनम) वांगचुक लद्दाख के पर्यावरण, संवैधानिक अधिकारों और स्थानीय भागीदारी से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन करते हैं, तब 1984 का यह ऐतिहासिक प्रसंग बार-बार याद किया जाता है। हालांकि दोनों आंदोलनों की मांगें और परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं, लेकिन दोनों में लोकतांत्रिक तरीके से जनहित के प्रश्न उठाने की समान भावना दिखाई देती है।
इतिहासकारों का मानना है कि 1984 की यह घटना इस बात का उदाहरण है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों और सरकार के बीच संवाद से जटिल क्षेत्रीय प्रश्नों का समाधान खोजने का प्रयास किया गया। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने की प्रक्रिया तत्काल पूरी नहीं हुई, बल्कि इसमें कई वर्षों का समय लगा और विभिन्न प्रशासनिक एवं संवैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा।
उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों में इंदिरा गांधी द्वारा आश्वासन दिए जाने और बाद में ST दर्जा मिलने का उल्लेख मिलता है, जबकि तत्काल उसी वर्ष दर्जा प्रदान किए जाने का स्पष्ट आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
Shabddoot – शब्द दूत Online News Portal