@शब्द दूत ब्यूरो (21 मई 2026)
उर्वशी दत्त बाली ने आधुनिक जीवनशैली और बदलते पारिवारिक ढांचे पर चिंता जताते हुए कहा है कि आज रिश्तों में धैर्य, समझ और स्वीकार्यता लगातार कम होती जा रही है। उनका मानना है कि समाज धीरे-धीरे “साथ रहने” की संस्कृति से “अकेले रहने” की सोच की ओर बढ़ रहा है, जो भविष्य के लिए गंभीर सामाजिक संकेत है।
काशीपुर में बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि आज की मॉडर्न लाइफ में सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इंसान खुद में कई कमियां होने के बावजूद अपने पार्टनर से परफेक्शन की उम्मीद करता है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसे जैसे वह है, वैसे ही स्वीकार किया जाए, लेकिन सामने वाले से यह अपेक्षा रखता है कि वह उसकी पसंद और सोच के अनुसार खुद को बदल ले। यही सोच रिश्तों में दूरियों की शुरुआत बन जाती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति बाजार में कपड़े या अन्य सामान खरीदता है, तो छोटी-मोटी कमियों को नजरअंदाज कर देता है, लेकिन रिश्तों में वही छोटी बातें बड़ी समस्याओं का रूप ले लेती हैं। यही कारण है कि आज रिश्ते पहले की तुलना में अधिक संवेदनशील और अस्थिर होते जा रहे हैं।
उर्वशी दत्त बाली के अनुसार न्यूक्लियर फैमिली के बढ़ते चलन ने लोगों की सोच और व्यवहार में बड़ा बदलाव किया है। पहले संयुक्त परिवारों में रहने से लोग आपसी सहयोग, त्याग, एडजस्टमेंट और माफ करना स्वाभाविक रूप से सीख जाते थे। अब “मेरा कमरा, मेरा समय और मेरी पसंद” जैसी मानसिकता ने इंसान को अधिक आत्मकेंद्रित बना दिया है। ऐसे में जब किसी रिश्ते में समझौता, धैर्य और स्वीकार्यता की जरूरत पड़ती है, तो लोग उसे निभाने में संघर्ष करने लगते हैं।
उन्होंने कहा कि रिश्ते कोई रेडीमेड व्यवस्था नहीं होते, बल्कि उन्हें समय, धैर्य और समझदारी से मजबूत बनाना पड़ता है। एक सफल रिश्ता वही होता है, जहां दोनों लोग छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज कर एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने का प्रयास करें।
उन्होंने विवाह को केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक सुरक्षा का आधार बताया। उनके अनुसार जीवन के उतार-चढ़ाव में एक साथी का साथ इंसान को अकेलेपन और अवसाद से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी के बीच भावनात्मक, मानसिक और आर्थिक सुरक्षा का एहसास ही रिश्ते को स्थिरता प्रदान करता है।
बच्चों की भूमिका पर भी उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि बच्चा केवल जिम्मेदारी नहीं होता, बल्कि वह दो लोगों के बीच एक गहरा भावनात्मक संबंध भी बनाता है। इससे परिवार का महत्व और जीवन का उद्देश्य दोनों मजबूत होते हैं।
अंत में उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति परफेक्ट नहीं होता और न ही कोई रिश्ता अपने आप परफेक्ट बनता है। मजबूत रिश्तों के लिए थोड़ा एडजस्टमेंट, थोड़ा सब्र और थोड़ी माफ करने की भावना जरूरी होती है। यदि हम चाहते हैं कि कोई हमें समझे, तो हमें भी सामने वाले को समझने की कोशिश करनी होगी।
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