@शब्द दूत ब्यूरो (12 मई 2026)
नई दिल्ली — देश के आर्थिक हालात और वैश्विक परिस्थितियों के बीच समय-समय पर भारत के प्रधानमंत्रियों ने नागरिकों से संयम और सहयोग की अपील की है। वर्ष 1967 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विदेशी मुद्रा संकट के चलते देशवासियों से सोना न खरीदने की अपील की थी। अब लगभग छह दशक बाद, मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ऊर्जा बचत और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग को लेकर देशवासियों से सहयोग मांग रहे हैं।
1967 में भारत गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा था। उस समय सोने का आयात देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहा था। इसे देखते हुए इंदिरा गांधी ने “राष्ट्रीय अनुशासन” का हवाला देते हुए लोगों से सोना खरीदने से परहेज करने की अपील की थी। यह कदम सीधे तौर पर देश की आर्थिक स्थिरता और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने से जुड़ा था।
वहीं, वर्तमान परिदृश्य में नरेंद्र मोदी ने वैश्विक तनाव और ऊर्जा संकट के मद्देनज़र नागरिकों से पेट्रोल-डीजल की बचत, अनावश्यक खपत कम करने और वैकल्पिक उपाय अपनाने की अपील की है। उनकी अपील का उद्देश्य भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखना और संसाधनों पर बढ़ते दबाव को कम करना है।
दोनों दौर की परिस्थितियों में समानता यह है कि संकट चाहे विदेशी मुद्रा का हो या ऊर्जा संसाधनों का, सरकार ने जनता से सहयोग को सबसे अहम माना है। फर्क केवल इतना है कि 1967 में चुनौती सीमित संसाधनों और आयात पर निर्भरता की थी, जबकि आज का संकट वैश्विक भू-राजनीतिक हालात और बढ़ती ऊर्जा मांग से जुड़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों अपीलों में एक समान संदेश छिपा है—देश की आर्थिक मजबूती के लिए नागरिकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। जब सरकार और जनता मिलकर जिम्मेदारी निभाते हैं, तभी बड़े संकटों से पार पाया जा सकता है।
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