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ऊर्जा संकट पर प्रधानमंत्री की अपील—क्या नियम सिर्फ आम जनता के लिए या मंत्रियों व विपक्ष के नेताओं पर भी लागू होंगे?

@विनोद भगत

बीते रोज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ऊर्जा संकट को लेकर देशवासियों से की गई अपील ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दे दिया है। उन्होंने नागरिकों से पेट्रोल-डीजल की बचत करने, अनावश्यक यात्रा से बचने और संभव हो तो ‘वर्क फ्रॉम होम’ अपनाने की सलाह दी है। वैश्विक परिस्थितियों, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति पर उसके प्रभाव को देखते हुए यह अपील समयानुकूल मानी जा रही है।

लेकिन इस अपील के साथ ही एक बड़ा सवाल भी उठ खड़ा हुआ है—क्या यह जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों तक सीमित रहेगी, या फिर सरकार और उसके मंत्री भी इस दिशा में उदाहरण प्रस्तुत करेंगे? आम आदमी, जो पहले ही महंगाई और बढ़ती ईंधन कीमतों से जूझ रहा है, उसके लिए ईंधन की बचत करना एक मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी। वह अपने स्तर पर बाइक कम चलाने, कारपूलिंग करने और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाने जैसे उपाय अपना सकता है।

दूसरी ओर, अक्सर देखा जाता है कि कई मंत्री और वीआईपी दर्जनों गाड़ियों के काफिले के साथ चलते हैं, जिनमें कई वाहन केवल प्रोटोकॉल के नाम पर शामिल होते हैं। ऐसे में जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ऊर्जा बचत की यह अपील उन पर भी समान रूप से लागू होगी? यदि सरकार वास्तव में इस संकट से निपटना चाहती है, तो उसे खुद भी सादगी और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का उदाहरण पेश करना होगा।

ऊर्जा संकट केवल आर्थिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा मुद्दा भी है। अगर देश को इस दिशा में आगे बढ़ना है, तो नीति और व्यवहार में समानता आवश्यक है। जनता तभी सहयोग के लिए आगे आएगी जब उसे लगेगा कि नियम सभी के लिए समान हैं—चाहे वह आम नागरिक हो या सत्ता में बैठा कोई बड़ा पदाधिकारी।

सरकार के पास यह अवसर है कि वह न केवल अपील करे, बल्कि ठोस कदम भी उठाए—जैसे वीआईपी काफिलों की संख्या सीमित करना, सरकारी वाहनों के उपयोग पर नियंत्रण, और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना। इससे न केवल ईंधन की बचत होगी, बल्कि एक सकारात्मक संदेश भी जाएगा कि देश का नेतृत्व खुद भी उसी अनुशासन का पालन कर रहा है, जिसकी अपेक्षा वह जनता से कर रहा है।

अंततः, ऊर्जा बचत एक सामूहिक जिम्मेदारी है। लेकिन यह जिम्मेदारी तभी प्रभावी होगी जब यह “सिर्फ आम आदमी के लिए” न रहकर “सबके लिए समान नियम” बन जाए। तभी प्रधानमंत्री की अपील एक सच्चे जनआंदोलन का रूप ले सकेगी और देश ऊर्जा संकट से मजबूती के साथ बाहर निकल पाएगा।

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